कमलिनी नागराजन दत्त को मैं दूरदर्शन के केंद्र निर्माण केंद्र की निदेशक के रूप में कम और अपने कवि मित्र श्री कुबेर दत्त की पत्नी के रूप में अधिक जानता हूँ। वे तमिलभाषी हैं, लेकिन उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी भाषा और साहित्य की स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की है तथा हिंदीभाषी उत्तर भारतीय कुबेर दत्त से प्रेम-विवाह किया है। तमिल और हिंदी के अलावा अंग्रेज़ी और संस्कृत भाषाओं पर भी उनका अच्छा अधिकार है। इनके अलावा बांग्ला, मराठी, कन्नड़, मलयालम आदि के साहित्य से भी वे अच्छी तरह परिचित हैं। हालाँकि वे नृत्य और संगीत की साधना को समर्पित हैं, लेकिन ज्ञान का शायद ही कोई क्षेत्र हो, जिसमें उनकी रुचि और गति न हो।
कमलिनी मूलतः नृत्यकला को समर्पित कलाकार हैं। उन्होंने चार वर्ष की उम्र में भरतनाट्यम सीखना शुरू किया और सात वर्ष की उम्र में अपनी पहली नृत्य प्रस्तुति दी। बाद में उन्होंने कुचिपुड़ी और ओडिशी नृत्य भी सीखे। आठवें दशक के आरंभ में उन्होंने अनेक उत्सवों और समारोहों में अपने नृत्य प्रस्तुत किए और कलाविदों तथा सामान्य दर्शकों की प्रशंसा प्राप्त की। इक्कीस वर्ष की उम्र से उन्होंने दूरदर्शन में काम करना शुरू किया और संचार माध्यमों की सर्जनात्मकता को सैद्धांतिक तथा व्यावहारिक दोनों स्तरों पर समझा। इससे संबंधित विशेष प्रशिक्षण के लिए वे 1984 में नीदरलैंड और 1989 में कुआलालंपुर गईं। दूरदर्शन में अब तक के लगभग पच्चीस वर्षीय कार्यकाल में उन्होंने एक हजार से अधिक कार्यक्रमों का निर्माण किया है, जो कलात्मक गुणवत्ता और सौंदर्यात्मक स्तरीयता के लिए सराहे गए हैं। उन्होंने अनेक संगोष्ठियों और कार्यशालाओं में नृत्य, संगीत और संस्कृति से संबंधित विद्वत्तापूर्ण प्रपत्र भी प्रस्तुत किए हैं।
पिछले कुछ वर्षों से आर्थराइटिस रोग से पीड़ित होने के कारण उनका अपना नृत्य बंद हो गया है, किंतु दूरदर्शन के लिए निर्मित उनके नृत्य और संगीत के कार्यक्रमों से उनकी सर्जनात्मक प्रतिभा और कलात्मक दक्षता निरंतर सामने आ रही है। एलोपैथिक चिकित्सा से लाभ न होते देख वे आयुर्वेदिक चिकित्सा की शरण में गईं। पहले दिल्ली के एक आयुर्वेदिक चिकित्सालय में रहकर इलाज कराया, फिर केरल जाकर कोट्टक्कल की आयुर्वेदशाला में। उन दिनों की कमलिनी दत्त की अनेक सुंदर और मार्मिक छवियाँ कुबेर दत्त के कविता-संग्रह ‘केरल प्रवास’ की कविताओं में अंकित हैं। उनमें से एक कविता में यह मर्मस्पर्शी दृश्य चित्रित हुआ है कि आयुर्वेदशाला की केरल की परिचारिका पद्मावती कमलिनी के शरीर की मालिश कर रही है। कमलिनी असह्य पीड़ा से रो रही हैं। पद्मावती उनका मन बहलाने के लिए उनसे गीत सुनाने का अनुरोध करती है—
दीदी गीत सुनाओ
तमिल गीत सुनाओ
हिंदी गीत सुनाओ
फिर हम सुनाएगा
मलयाली गीत
दीदी अभिनय करके दिखाएगा
कौन-सा डांस करेगा दीदी
भरतनाट्यम? कथकली? ओडिसी? मोहिनी अट्टम?
दीदी छोटा बच्चा है
दीदी रोना
पाँच मिनट और
पेन बिल्कुल नहीं
तुम गाना सुनाओ प्लीज़
सुनाओ न दीदी
और कमलिनी दो सौ वर्ष पूर्व के मलयाली कवि इरायिमन तम्पी द्वारा शिशु स्वाति तिरुनाल के जन्म पर रची गई लोरी गाकर सुनाती हैं। मैं कल्पना करता हूँ, वह क्षण कैसा अद्भुत रहा होगा। असह्य पीड़ा से रोती हुई कमलिनी और मलयाली पद्मावती, जो अपनी टूटी-फूटी हिंदी में तमिल या हिंदी में गीत सुनाने का अनुरोध कर रही है, ताकि कमलिनी का मन बहल जाए और वे थोड़ी देर के लिए अपनी पीड़ा को भूल जाएँ। और कमलिनी गीत गाती हैं—लेकिन तमिल या हिंदी का नहीं, बल्कि पद्मावती की अपनी भाषा मलयालम का गीत। और कितना सुंदर गीत—दो सौ वर्ष पहले रची गई एक लोरी, लेकिन ऐसी कि जिसे केरल की माताएँ अपने बच्चों के लिए आज भी गाती हैं।
बहुत दिनों से चाहता था कि कभी उनसे बातचीत करूँ और उसे रिकॉर्ड करूँ, लेकिन मुझे मालूम नहीं था कि मीडिया की धाकड़ ‘पर्सनैलिटी’ होने के बावजूद वे अपने बारे में बोलने में इतना संकोच करेंगी। कई बार इंटरव्यू के लिए दिन और समय निश्चित हुआ, लेकिन कमलिनी किसी-न-किसी बहाने टालती रहीं। अंततः यह जो ‘इंटरव्यू’ उनसे लिया जा सका, वह किसी एक दिन की एक बैठक का नहीं, बल्कि 1996 में लगभग पूरे वर्ष किए गए अनुरोधपूर्ण प्रयासों का परिणाम है।
रमेश उपाध्याय :
कमलिनी जी, मैं नृत्य और संगीत के ज्ञान से वंचित उन लोगों में से हूँ, जो नृत्य देखना और संगीत सुनना तो पसंद करते हैं, लेकिन उसे समझ नहीं पाते। फिर भी आपने देखा होगा कि हमारे देश के लोग अज्ञान, अशिक्षा और अपने परिवेश में फैली हुई तमाम अपसंस्कृति के बावजूद कलाओं से प्रेम और कलाकारों का आदर करते हैं। क्या आप ऐसे लोगों को अपने बारे में, अपनी कला के बारे में, उससे संबंधित अनुभवों, विचारों और चिंताओं के बारे में बताना पसंद करेंगी?
कमलिनी दत्त :
कलाओं से प्रेम और कलाकारों का आदर हमारे देश की बहुत पुरानी परंपरा है। इसका कारण कोई विशेष सांस्कृतिक चेतना या वैचारिक ज्ञान नहीं, बल्कि यह है कि कलाएँ यहाँ की जीवन-धारा का अभिन्न अंग हैं। जिस बड़े जन-समूह को हम अज्ञान और अशिक्षा से घिरा हुआ मानते हैं, हमारे ज्ञान का मूल सूत्र तो उन्हीं के हाथ में है। भारतीय कलाओं की विशेषता यही है कि वे जीवन के अन्यान्य तत्त्वों से मूलतः जुड़ी हुई हैं और निरंतर गतिमान जीवन-धारा से ही सिंचित और विकसित होती आई हैं। इनके बाह्य स्वरूप का निर्माण जहाँ क्षेत्रीय विशेषताओं में हुआ है, वहीं आंतरिक स्वरूप का आधार यहाँ का समूह-दर्शन और अध्यात्म है। जिन्हें हम अशिक्षित और अज्ञानी कहते हैं, उनके अनुभवजनित ज्ञान के सामने मुझे अनेक बार अपनी लघुता का अहसास हुआ है। निरक्षर कबीर के ज्ञान की तुलना किस महान विचारक की मीमांसा से कर सकते हैं? आजकल की स्कूल-शिक्षा और पाश्चात्य शैली के शहरीकरण ने हमें अपने जीवन-स्रोतों से काट दिया है, इसलिए शिक्षित होकर भी हम अपने ही देश के बारे में नहीं जानते। कलाएँ भी इस नई शिक्षा का शिकार होती जा रही हैं। कलाकार के रूप में जब मैं जनपदों में सक्रिय थी, तब मैंने यह अनुभव किया कि कला का अपना स्थान महानगरों के बड़े भव्य सभागारों में नहीं है। जनपदों में जब-जब भी कला-प्रस्तुति का मौका मिला, मैंने पाया कि मेरी कला और अधिक समृद्ध हुई है।
रमेश उपाध्याय :
ऐसे कुछ अनुभव बताएँगी?
कमलिनी दत्त :
हाँ, ज़रूर। सन् 1965 की बात है। मैं किशोरी थी। दिल्ली और आसपास के इलाकों में खूब प्रस्तुतियाँ करती थी। उस साल बुलंदशहर के पशु-मेले से जुड़े सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भरतनाट्यम प्रस्तुत करने का निमंत्रण आया। मैं कुछ आशंकित थी कि दक्षिण की संस्कृति से अपरिचित इस क्षेत्र के किसानों को मेरी प्रस्तुति कैसे अच्छी लग सकती है। मेरे गुरु और माता-पिता भी इस आशंका से मुक्त नहीं थे। क्षेत्रीय प्रस्तुतियों के बाद रात के करीब ग्यारह बजे मैं मंच पर गई। पारंपरिक गणेश-वंदना से लेकर तिल्लाना तक कुल आठ रचनाएँ मैंने प्रस्तुत कीं। चार-पाँच हज़ार से भी ज़्यादा दर्शक मंत्रमुग्ध-से बैठे रहे। न भाषा उनकी, न संगीत उनका, फिर भी वह क्या चीज़ थी, जो उन्हें बाँधे रही? यही नहीं, जब मैं प्रणाम करके मंच से उतर चुकी थी, तब कुछ किसानों ने एक तमिल पदम् को फिर से करने का अनुरोध किया। इसे आप क्या कहेंगे? मेरे विचार से मनुष्य की सहज संवेदनाएँ ही नृत्यकला की भावभूमि हैं। सहज संवेदनाओं को तरंगित करने वाली कोई भी प्रस्तुति अपना प्रभाव छोड़े बिना नहीं रह सकती।
रमेश उपाध्याय :
कोई और अनुभव?
कमलिनी दत्त :
सन् 1981 में बाबा नागपाल जी ने छतरपुर मंदिर में कात्यायनी की सन्निधि में नृत्यार्पण करने का आदेश मुझे दिया। उस समय मंदिर इतना विशाल नहीं था। बस, कात्यायनी मंदिर बन चुका था और साथ लगे हुए मैदान में अस्थायी पंडाल बनाकर संगीत के कार्यक्रमों का आयोजन होता था। नृत्य इस मंदिर में पहली बार होने वाला था। मैंने पूरी श्रद्धा से माँ की भक्ति के संस्कृत और हिंदी के पद चुनकर कार्यक्रम संजोया था। माँ के भक्तगण दर्शक के रूप में बैठे हुए थे—गुर्जर और जाट किसान, जिन्होंने इससे पहले शास्त्रीय नृत्य कभी नहीं देखा था। यह कार्यक्रम मेरा सबसे अधिक सफल कार्यक्रम था। उन अज्ञानी और अशिक्षित किसानों के रूप में मुझे सर्वश्रेष्ठ दर्शक मिले। आज भी उस मंदिर में मेरी बेटी दोनों नवरात्रों में नृत्य-सेवा करती है।
रमेश उपाध्याय :
मैंने अज्ञान और अशिक्षा के साथ-साथ अपसंस्कृति की भी बात की थी, जो लगातार फैल रही है या फैलायी जा रही है…
कमलिनी दत्त :
उसके बारे में ऐसा है कि हमारे देश के शासक वर्ग ने कभी कोई सांस्कृतिक नीति नहीं बनाई। एक ऐसा देश, जो कुछ ही समय पहले सांस्कृतिक पुनर्जागरण से गुज़रा हो और जिसे अपने आत्म-गौरव को पुनः पहचानने में संघर्ष करना पड़ा हो, उसे बिना किसी नीति-निर्देश के यूँ ही छोड़ देना अत्यंत खेदजनक है। यहाँ तक कि सूचना-माध्यमों को भी सही दिशा-निर्देश नहीं मिल पाया। इसमें असंतुलित शिक्षा-प्रणाली का भी हाथ है। शहरी शिक्षा अपनी जड़ों से कटती चली गई, जिसमें अधिकांश शिक्षित वर्ग अपनी संस्कृति के प्रति उदासीन हो गया। दूसरी ओर इस महादेश का बहुत बड़ा वर्ग, जो गाँवों में रहता है, शिक्षा के अभाव में और बदलते हुए सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य में अपनी अस्मिता केवल रूढ़िवादी जीवन-दृष्टि में खोजता रहा। आधुनिकीकरण की चकाचौंध से कुछ दूर तक वह दिग्भ्रमित भी हो बैठा। आधुनिकता का अर्थ पश्चिमीकरण होकर रह गया।
इधर पिछले पाँच वर्षों में उपग्रह के माध्यम में जो आकाश-युद्ध शुरू हुआ है, उसने अपसंस्कृति को बहुत तेज़ी से फैलाने में मदद की है। बाज़ारवाद ने जीवन-मूल्यों को तहस-नहस कर दिया है। धनार्जन ही एकमात्र मूल्य और ध्येय रह गया है। ऐसे में संस्कृति, विचारशील कलाओं और अध्यात्म की ज़मीन पर खड़ी जीवन-शैली का हाशिये पर चला जाना स्वाभाविक ही है। विश्वगुरु विश्व के सामने हाथ पसार रहा है। अपनी झोली के रत्न फेंककर काँच के मनकों के लिए दौड़ रहा है।
लेकिन अब भी बहुत नहीं बिगड़ा है। पाँच हज़ार वर्ष से भी पहले से बनी-संवरी भारतीयता इतनी जल्दी समाप्त होने वाली नहीं है। देश के कर्णधार अभी भी चेत जाएँ, कलाकार अपनी-अपनी संकीर्णताओं से बाहर निकलें, विचारक और बौद्धिक एकजुट हो जाएँ, तो मूल रूप से सरल भारतीय जनता को सही दिशा देने में और पुनः एक सांस्कृतिक नवजागरण लाने में निश्चय ही सफल होंगे। इस देश के लिए बनाई जाने वाली ज़रूरी नीतियों में एक सुविचारित सांस्कृतिक नीति को प्राथमिकता मिलना अत्यंत आवश्यक है।
रमेश उपाध्याय :
आप सही कह रही हैं, लेकिन इस प्रश्न पर हम बाद में आएँगे। पहले आप अपने बारे में कुछ बताएँ। अपने बचपन, परिवार, परिवेश और प्रारंभिक शिक्षा आदि के बारे में कुछ बताएँ।
कमलिनी दत्त :
दक्षिण भारत में तमिलनाडु के एक प्राचीन नगर तंजाऊर में हमारा पुश्तैनी घर है। इस नगर से कोई तीस किलोमीटर दूर, तंजाऊर ज़िले में ही, मंगुड़ी गाँव हमारे पूर्वजों का गाँव है। तंजाऊर कलाओं की नगरी है। चोल साम्राज्य की यह राजधानी रही। अपने मंदिरों के लिए सदियों से मशहूर है। कावेरी नदी की घाटी में स्थित यह प्रांत पूरे वर्ष हरा-भरा रहता है। इसे तमिलनाडु का ‘राइस बाउल’ (धान का कटोरा) भी कहते हैं। बहुत उपजाऊ ज़मीन होने के कारण यह प्रांत धन-धान्य से भरपूर रहा है। प्राकृतिक संपदा, परिश्रमी लोग और राजनीतिक स्थिरता—इन सबने मिलकर यहाँ कला के विकसित होने के लिए अनुकूल वातावरण बनाया।
कर्नाटक संगीत की तीन महान विभूतियाँ, जिन्हें त्रिमूर्ति के रूप में सभी जानते हैं—त्यागराज, मुथुस्वामी दीक्षितर और श्यामा शास्त्री—यहीं पैदा हुईं। यहीं इन्होंने कला-साधना की। सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दी के कलाप्रेमी मराठा राजाओं ने भी यहाँ की संस्कृति को समृद्ध किया। तंजाऊर भरतनाट्यम की भी केंद्रीय भूमि है। आज भरतनाट्यम के नाम से जिस बानी-शैली को हम जानते हैं, उसे चार भाइयों ने मानकीकृत किया—चिन्नैया, पोनैया, शिवानंदम और वडिवेलु—जो ‘तंजाऊर क्वार्टेट’ (तंजाऊर चतुष्टय) के नाम से सुविख्यात हुए। इन्हीं के घराने की मेरी प्रथम गुरु श्रीमती लक्ष्मीकांतम् थीं।
रमेश उपाध्याय :
क्या आपके परिवार में नृत्य और संगीत की परंपरा पहले से चली आ रही थी?
कमलिनी दत्त :
मेरे पिता वेदाध्ययन करने वाले ब्राह्मण परिवार के थे। अध्ययन-अध्यापन में प्रवृत्त इस परिवार में कला के प्रति विशेष आदर नहीं था। कर्नाटक संगीत का प्रशिक्षण अपने बच्चों को अवश्य दिलवाते थे, लेकिन उसका उद्देश्य कला-साधना को बहुत गंभीरता से लेना नहीं था। अध्यात्म के लिए संगीत एक आवश्यक तत्त्व है—उनके लिए संगीत की इतनी ही उपादेयता थी। मेरी माँ भी एक सुशिक्षित परिवार की थीं—सी.वी. रमन और सी.वी. चंद्रशेखर जैसे वैज्ञानिकों के परिवार की। उनमें संगीत और नृत्य के प्रति बहुत अधिक सम्मान था, पर जीवन-समर्पण की सीमा तक नहीं। उन्होंने मेरे शैशवकाल में ही नृत्यकला के बीज मुझमें देख लिए थे, इसलिए परिवार के मूक विरोध के बावजूद चार वर्ष की आयु में ही मुझे प्रशिक्षण के लिए श्रीमती लक्ष्मीकांतम् के संरक्षण में छोड़ दिया।
रमेश उपाध्याय :
उनके यहाँ?
कमलिनी दत्त :
नहीं, रहती तो मैं अपने घर पर ही थी, उनसे नृत्य सीखने जाती थी। पर यूँ समझिए कि मेरे अगले तीन वर्ष नृत्यकला के साथ सोते-जागते बीते। सुबह उठते ही माँ मुझे प्रशिक्षण-शाला में जाने के लिए तैयार कर देती थीं। आठ बजे से बारह बजे तक अभ्यास। घर लौटकर स्नान और भोजन के बाद माँ से ही गणित, अंग्रेज़ी और तमिल का अध्ययन। फिर सायंकाल चार बजे से सात बजे तक नृत्य-अभ्यास। यही क्रम रहता था उन दिनों। इतनी कम उम्र की बच्ची के लिए यह नित्यक्रम बहुत कठिन था, लेकिन उस समय मुझे यह सब सामान्य ही लगता था। और मुझे बहुत बचपन से ही आभास था कि मैं नृत्य के लिए बनी हूँ।
रमेश उपाध्याय :
आपने कहा कि परिवार के अन्य सदस्यों ने आपकी माँ के इस निर्णय का मूक विरोध किया। वह क्यों?
कमलिनी दत्त :
हमारा कुटुंब मध्यम आय वाला था और उस आय पर निर्भर सदस्य कई थे, इसलिए गुज़ारा भी मुश्किल से होता था। केवल अत्यंत आवश्यक चीज़ों पर ही ख़र्च किया जाता था। मेरे पिता उन दिनों श्रीलंका की राजधानी कोलंबो में भेजे हुए थे, उनसे ही कुछ अतिरिक्त आय आती थी। ऐसे में मेरी कला-साधना पर पैसा ख़र्च करना सबको अखरता था। 1957 में मेरी गुरु ने मेरे माता-पिता के सामने अरंगेट्रम (रंगप्रवेश) का प्रस्ताव रखा। माता-पिता को आश्चर्य हुआ—सात वर्ष की भी पूरी नहीं हुई, उसका रंगप्रवेश! उन दिनों रंगप्रवेश एक बहुत बड़े अनुष्ठान और उत्सव की तरह होता था। जब मेरी गुरु ने मेरे इस योग्य होने का विवरण दिया, तो माता-पिता राज़ी हो गए। मगर समस्या धन की थी। इतना ख़र्च क्या परिवार के लिए संभव था? मगर मेरी माँ ने इसे चुनौती के रूप में लिया। उनके त्याग के सामने मैं आज भी नतमस्तक हूँ। अपने पास जो कुछ था—विवाह में मिली कीमती साड़ियाँ, चाँदी के बर्तन, सोने के आभूषण—वह सब उन्होंने इस महोत्सव में लगा दिया।
रमेश उपाध्याय :
अच्छा? रंगप्रवेश इतना भारी आयोजन होता है?
कमलिनी दत्त :
जी, कन्या के विवाह की तरह। मद्रास के सर्वश्रेष्ठ पोशाक-निर्माता अमर ज्योति एंड संस के यहाँ मेरी छह पोशाकें बनीं। सारे आभूषण भी वहीं खरीदे गए। एक निश्चित मुहूर्त में वेदोक्त रीति से नूपुर-पूजा हुई। वह 24 नवंबर 1957 का दिन था। समारोह में तंजाऊर जनपद के सभी वरिष्ठ गुरु उपस्थित थे। असल में रंगप्रवेश से पहले इस कठिन परीक्षा में सफल होना अनिवार्य था। उनके सामने नृत्य कराने के बाद ही मेरी गुरु को अपनी शिष्या का रंगप्रवेश कराने की अनुमति मिलती थी। उनके अनुमोदन से मेरा अरंगेट्रम 1 दिसंबर 1957 को तंजाऊर के रामनाथ चेट्टियार हॉल में हुआ। पूरे तीन घंटे के आयोजन में मैंने चौदह नृत्य-प्रस्तुतियाँ कीं। उन दिनों भरतनाट्यम की पारंपरिक प्रस्तुतियों के अलावा इन आयोजनों में ‘ओरिएंटल डान्सेज़’ भी शामिल किए जाते थे। अतः मेरे रंगप्रवेश में दक्षिण भारत के पहाड़ों में रहने वाली कुरवा जनजाति का नृत्य ‘कुरत्ति’ और एक सपेरा-नृत्य भी शामिल था। मद्रास से संगीत और नृत्य के प्रसिद्ध विद्वान और आचार्य प्रोफेसर एस. संधभूर्ति को विशेष रूप से आयोजन की अध्यक्षता के लिए सपत्नीक आमंत्रित किया गया था। उन्होंने मेरा नृत्य देखकर जो कहा—वह अगर मैं बताऊँ तो शायद आपको लगे कि आत्म-प्रशंसा कर रही हूँ…
रमेश उपाध्याय :
दिल्ली आने पर आपकी नृत्य-शिक्षा कैसे आगे बढ़ी?
कमलिनी दत्त :
दिल्ली आने पर मेरे माता-पिता के सामने सबसे बड़ी समस्या मेरे लिए एक बेहतर गुरु खोजने की थी। मुझे एक तमिल स्कूल में पाँचवीं कक्षा में दाख़िला दिया गया। शाम को मैं रोज़ाना नृत्याभ्यास करती थी। माँ गाती थीं और मैं सोलह तालों का अभ्यास करती थी। यह इसलिए कि किसी भी कला की तरह नृत्य भी अभ्यास के बिना बहुत शीघ्र खोया जा सकता है। यह क्रम तब तक निर्विघ्न चलता रहा, जब तक सिक्किम के महान गुरु श्री रामस्वामी पिल्लै का सान्निध्य मुझे प्राप्त नहीं हुआ। वे दिल्ली के जापानी कला संगम में नृत्याचार्य बने और तंजाऊर के श्री गणपति अप्पर ने, जो श्रीमती लक्ष्मीकांतम् के संरक्षक थे, उनके दिल्ली आने की सूचना देते हुए हमें हिदायत दी कि हम उनसे मिलें, क्योंकि मेरी कला-साधना ताता गुरु की देख-रेख में सुचारु रूप से हो सकती है।
रमेश उपाध्याय :
ताता गुरु?
कमलिनी दत्त :
श्री रामस्वामी पिल्लै—हम उन्हें ताता कहते थे—वे मेरे गुरु ही नहीं, हमारे घर के सर्वाधिक आदरणीय व्यक्ति भी बन गए। वे केवल नृत्याचार्य ही नहीं, बड़े ज्ञानी व्यक्ति भी थे। उनके ज्ञान की रोशनी ने हमारे पूरे परिवार को आलोकित किया। उनका हमारे घर आना किसी समारोह से कम नहीं होता था। घर का हर सदस्य उनकी सुख-सुविधा का ध्यान रखने के लिए तत्पर रहता था। नृत्य-अभ्यास के समय को छोड़कर शेष समय हम ताता के समीप बैठकर तमिल साहित्य, संतों की जीवनियाँ, मंदिरों का माहात्म्य आदि सुनते थे और साथ-साथ जीवन-संबंधी ऐसी बहुत सारी बातें भी, जो एक मूल्याश्रित जीवन जीने को प्रेरित करती थीं।
उनसे हमने बहुत कुछ सीखा, लेकिन यह सीखना-सिखाना कोई सचेत प्रयास नहीं था। न वे सिखाने के लिए सिखाते थे, न हम सीखने के लिए सीखते थे। उद्देश्य तो ताता का सान्निध्य-लाभ ही था। कब वे बताते चले गए और कब हम सोखते चले गए, हमें नहीं मालूम। पर इतना ज़रूर था कि हमारे घर का छोटे-से-छोटा और बड़े-से-बड़ा निर्णय भी ताता से पूछे बिना नहीं लिया जाता था। गर्मी की छुट्टियाँ ताता के साथ दक्षिण के मंदिरों की यात्रा में बीतती थीं। गाँव-गाँव के छोटे-बड़े सभी मंदिरों में ताता हमें ले जाते थे। उस समय खेल-खेल में पता नहीं चला कि वे यात्राएँ कितनी ज्ञानवर्धक थीं, लेकिन बाद में कर्म-क्षेत्र में आने के बाद महसूस हुआ कि स्कूली शिक्षा के साथ ही यह जो शिक्षा हमें मिली, वह कितनी अधिक महत्त्वपूर्ण थी। इस तरह मुझे ताता से उनके जीवन-पर्यंत नृत्यकला ही नहीं, एक संपूर्ण जीवन-दृष्टि भी मिली, जो मेरी अपनी जीवन-यात्रा के लिए पाथेय बनी।
रमेश उपाध्याय :
उस जीवन-दृष्टि को तनिक स्पष्ट करेंगी?
कमलिनी दत्त :
ताता एक बहुत ही ‘जीनियस’ गुरु थे। उनमें अन्य गुरुओं की-सी संकीर्णता और शिष्य को लेकर पज़ेसिवनेस कभी नहीं थी। जैसे अक्सर देखा जाता है कि गुरु अपनी बानी या शैली के अलावा अन्य घरानों की कला के प्रति कटु आलोचना का रुख अपनाते हैं—ताता के यहाँ इसका बिल्कुल अभाव था। वे तमिल की एक उक्ति बार-बार दोहराते थे—“जो सीखा है, वह मुट्ठी बराबर; जो नहीं सीखा है, वह पृथ्वी बराबर।” वे अपने ज्ञान को बहुत सीमित बताते थे और हमें प्रेरित करते थे कि जहाँ से भी और जिससे भी संभव हो, जो सीखने योग्य है, सीखो।
जो लोग कला-साधना का इस्तेमाल अन्य लाभों के लिए करते हैं, उनके वे कटु आलोचक थे। नृत्य को वे ईश्वर की उपासना का सशक्त माध्यम मानते थे और यह मानते थे कि इस राह में जितना आगे बढ़ो, उतना ही विनम्र होते जाना आवश्यक है। अहंकार यदि ज़रा-सा भी आ गया तो समझो कि कला की देवी तुमसे दूर चली जाएगी। सच्चा कलाकार अत्यंत संवेदनशील, सहदय, करुणामय, विनम्र और सहनशील होता है। उसका आत्मालोचक होना आवश्यक है। जीवन के अन्यान्य अनुभवों से तपकर कला सोने की तरह निखरती है। सौंदर्य और आध्यात्म की खोज के लिए कला कलाकार के हाथ का दीपक है। कलाकार को कला में श्रेष्ठ होने के साथ-साथ एक बहुत अच्छा इंसान होना भी उतना ही आवश्यक है।
रमेश उपाध्याय :
कमलिनी जी, मैं देखता हूँ कि हमारे देश के आधुनिक लेखक अध्यात्म से दूर हो गए हैं, जबकि कलाकारों में आध्यात्मिकता अब भी पाई जाती है। मसलन आप एक आधुनिक दृष्टि-संपन्न और अत्यंत जागरूक महिला होते हुए भी परम धार्मिक और शिव-उपासक हैं…
कमलिनी दत्त :
हमारे परिवार में नृत्य का सबसे महत्त्वपूर्ण स्थान था और मुझे सभी प्रकार से यह महसूस कराया गया कि नृत्य का अभ्यास मेरे लिए परम धर्म है। इस प्रकार की धारणा के लिए मेरे माता-पिता को विरोधों का भी सामना करना पड़ा, लेकिन वे इस प्रकार की शिक्षा का महत्त्व अच्छी तरह जान चुके थे। आज भी उनका दृढ़ विश्वास है कि हमारा परिवार जिन भयंकर त्रासदियों से गुज़रा, उनसे यदि बाहर निकल पाया तो उसके पीछे नृत्य के माध्यम से शिव की उपासना ही है।
हमारे परिवार में नृत्य प्राथमिक था, शेष सब द्वितीयक। एलुरु में जब मैं कुचिपुड़ी नृत्य सीखने के लिए गई, तब मेरे पिता मेरी दोनों बहनों और भाई की देखभाल के लिए दिल्ली रुक गए और माँ मेरे साथ गईं। हमारे पास इतना धन नहीं था कि पूरे प्रशिक्षण का ख़र्च साथ ले जा सकें। केवल एक माह का ख़र्च लेकर हम चल पड़े। बहुत किफ़ायत से ख़र्च करने के बाद भी हमारे पास जो कुछ था, वह डेढ़ महीने से अधिक न चल सका। इधर पिताजी को पत्र भेजने में देर हो गई और फिर हमारी डाक-व्यवस्था तो सर्वविदित है। परदेस में उधार भी नहीं किया जा सकता था। माँ ने एक वक्त का भोजन करना शुरू किया और मेरे अभ्यास में किसी प्रकार का व्यवधान न आने दिया। फिर एक सप्ताह के बाद वे निराहार रहने लगीं। केवल दिन में दो केले खाती थीं। स्थिति तब सुधरी जब दिल्ली से मनीऑर्डर आया। अन्य अवसरों पर भी जिसे अत्यावश्यक माना जाता है, उसे भी त्यागकर नृत्य की सेवा मेरे माता-पिता ने की। क्या ऐसी सेवा और साधना गहरे आध्यात्मिक भाव के बिना संभव है?
रमेश उपाध्याय :
आप तमिलभाषी हैं, लेकिन आपने हिंदी में एम.ए. किया है।
कमलिनी दत्त :
जी हाँ, मैं तमिलभाषी हूँ। मेरी मातृभाषा तमिल है, जिस पर मुझे बहुत गर्व है। यह भाषा अति प्राचीन होने के साथ-साथ एक गौरवशाली संस्कृति की वाहिका भी है। लेकिन तमिल की स्कूली शिक्षा मुझे नहीं मिली। मेरी माँ ने ही इस भाषा और इसके विपुल साहित्य से मेरा परिचय कराया।
रमेश उपाध्याय :
लेकिन आपने बताया कि जब आप दिल्ली आईं तो आपको एक तमिल स्कूल में दाख़िल कराया गया?
कमलिनी दत्त :
तमिल स्कूल में पढ़ने के बावजूद मैंने हिंदी भाषा और साहित्य को ही चुना, क्योंकि घर में तमिल पढ़ सकती थी, हिंदी नहीं। हिंदी के साथ-साथ संस्कृत का अध्ययन भी किया—स्कूल में भी, लेकिन स्कूल से अधिक घर में। अध्यात्म समझाते समय माँ संस्कृत के मूल ग्रंथों से पढ़कर व्याख्या करती थीं, जिससे संस्कृत का मेरा ज्ञान गहन होता गया। भाषाओं के अध्ययन का मेरी कला-साधना के साथ गहरा संबंध है। आठवीं कक्षा के बाद जब विज्ञान और कला के बीच चुनाव का समय आया, तो विज्ञान में रुचि होने के बावजूद मैंने कला को चुना, क्योंकि नृत्याभ्यास में साहित्य का बहुत महत्त्व है—ख़ासकर भक्ति साहित्य का। साहित्य की बारीकियों को समझने के लिए उसका विधिवत अध्ययन आवश्यक था। भाषा और साहित्य का सांगोपांग अध्ययन करने के लिए ही मैंने ग्रेजुएशन के लिए हिंदी भाषा और साहित्य को चुना। संस्कृत और अंग्रेज़ी का विशेष अध्ययन भी मैं साथ-साथ करती रही। प्राचीन भाषाओं में संस्कृत और तमिल तथा आधुनिक भाषाओं में हिंदी का ज्ञान होने के कारण इनसे संबंधित अन्य भाषाओं—जैसे बांग्ला, मराठी, कन्नड़, तेलुगु और मलयालम—के साहित्य की कुछ रचनाओं को भी मैंने नृत्य में अभिव्यक्त किया है।
रमेश उपाध्याय :
आप उत्तर और दक्षिण भारत से समान रूप से जुड़ी हुई हैं। कला, साहित्य और संस्कृति की दृष्टि से उत्तर और दक्षिण में जो भिन्नताएँ हैं—और जो समानताएँ हैं—उन्हें आप एक कलाकार की दृष्टि से कैसे देखती हैं?
कमलिनी दत्त :
रमेश जी, दक्षिण मेरा पितृगृह है और उत्तर मेरा कर्मक्षेत्र। जब मेरा परिवार दक्षिण से उत्तर आया, तब दिल्ली में रहने के बावजूद उत्तर की संस्कृति से मेरा परोक्ष संबंध ही रहा। हमारी दिनचर्या दक्षिण भारतीय शैली की ही होती थी। उत्सव-पर्व भी तमिल रीति से मनाए जाते थे और हमारा सामाजिक-सांस्कृतिक दायरा भी दाक्षिणात्यों के बीच ही रहा। अड़ोस-पड़ोस में सभी प्रांतों के लोग रहते थे, लेकिन स्कूल की तमिल संस्था के कारण उत्तर की संस्कृति से मेरा निकट का परिचय कर्मक्षेत्र में आने के बाद ही हुआ—पहले दूरदर्शन में और फिर कुबेर से विवाह के बाद। मोटे तौर पर कहूँ तो उत्तर-दक्षिण की संस्कृति में मुझे कोई मूलभूत भेद नहीं दिखाई दिया। कुछ शैलीगत और रीतिगत वैविध्य अवश्य है। हाँ, संगीत और नृत्य के प्रति दृष्टिकोण में बहुत अंतर है। कुछ प्राचीन पद्धतियाँ और अनुष्ठान दक्षिण में अभी भी मूल रूप से सुरक्षित हैं, जबकि उत्तर में वे डाइल्यूट हो गए हैं। लेकिन इसी कारण दक्षिण कुछ संकीर्णताओं में जकड़ा हुआ है और उत्तर मुझे अधिक उदार प्रतीत हुआ है। वैसे भारतीय मन तो एक ही है। यदि मैं नितांत व्यक्तिगत प्रभाव को महत्त्व दूँ तो कहूँगी कि उत्तर से दक्षिण का सौंदर्य और दक्षिण से उत्तर का माधुर्य मुझे अधिक स्पष्ट दिखाई पड़ा।
I rediscovered the Southern culture in the context of North and could recognize the Northern culture in the context of South.
रमेश उपाध्याय :
आपने कुबेर दत्त से विवाह किया है, जो उत्तर भारतीय हैं। यह एक व्यक्तिगत-सा प्रश्न है, फिर भी मैं जानना चाहता हूँ कि उत्तर-दक्षिण के इस संगम का आपका अनुभव कैसा रहा?
कमलिनी दत्त :
यह उत्तर-दक्षिण का संगम दो परिवारों का है, दो संवेदनशील हृदयों का है, दो सृजनधर्मी व्यक्तित्वों का है—जिसमें हर पल, हर क्षण, हर अनुभव एक नई सीख, नई समझ और नई सोच लेकर आया।
Every event of our life has been a new learning experience.
इसने हम दोनों को ही नहीं, हमारे दोनों परिवारों के सभी सदस्यों को भी अधिक उदारता और एक-दूसरे की संस्कृति के प्रति अधिक सम्मान से भर दिया है। शुरू-शुरू में कठिनाइयाँ अवश्य आईं, लेकिन जिस संबंध की आधारशिला प्रेम हो, उसमें समस्याएँ भी आसानी से सुलझ जाती हैं। एक गुण जो कुबेर और मुझमें समान रूप से है, उसे मैं रेखांकित करना चाहूँगी—We are strong in our convictions. इसीलिए ‘एक दूजे के लिए’ फ़िल्म से हमारी कहानी का अंत दुखांत नहीं है। इस संबंध का सुपरिणाम है—हमारी बेटी।
रमेश उपाध्याय :
मैंने आपको बहुत कष्ट दिया, कमलिनी जी, लेकिन मेरा ख़याल है कि यह बातचीत बहुत सार्थक रही। आपको बहुत-बहुत धन्यवाद।
यह साक्षात्कार पहल पत्रिका से साभार है, इस पत्रिका के लिए रमेश उपाध्याय ने कमलिनी दत्त से बात की थी।