कविता मलहोत्रा : हिंदी साहित्य में संस्मरण विधा का जन्म भारतेंदु युग में हुआ। अपने जन्मकाल में यह गौण विधा रही। हिंदी के आरंभिक संस्मरण पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। हिंदी संस्मरण विधा का पल्लवन ‘सरस्वती’ पत्रिका के माध्यम से हुआ। इनके अतिरिक्त ‘विशाल भारत’, ‘माधुरी’, ‘चांद’, ‘हंस’, ‘युवक’, ‘वीणा’ आदि पत्रिकाओं में संस्मरण प्रकाशित होने लगे। स्वतंत्र कृति के रूप में बालमुकुंद गुप्त कृत ‘हरिऔध जी के संस्मरण’ (1907) नामक कृति का उल्लेख मिलता है। हिंदी में संस्मरण विधा को प्रतिष्ठित करने का श्रेय पंडित पद्म सिंह शर्मा को है। उनकी कृति ‘पद्म पराग’ (1929) ने संस्मरण विधा को स्वतंत्र पहचान दी। महादेवी वर्मा ने ‘अतीत के चलचित्र’ (1941), ‘स्मृति की रेखाएं’ (1943), ‘पथ के साथी’ (1956), ‘मेरा परिवार’ (1972) कृतियों से हिंदी के संस्मरण साहित्य को समृद्ध किया।
किसी भी साहित्यिक विधा में शिल्प को लेखक की विशिष्ट लेखन शैली के तौर पर देखा जा सकता है। गद्य और पद्य दोनों हो रूपों में अपने विचारों को एक विशेष संरचना में ढाल कर संप्रेषित करना शिल्प है। एक ही विषय पर अनेक लेखक अपने विचारों को भिन्न-भिन्न प्रकार से व्यक्त करते हैं, इस तरह समान विषय होते हुए भी लेखकीय विशिष्टता को उनके शिल्प के माध्यम से समझा जा सकता है। प्रस्तुत लेख में संस्मरण के विभिन्न तत्त्वों जैसे विषय वस्तु, स्मृति, आत्मीयता, तथ्यात्मकता आदि के अनुसार महादेवी वर्मा के संस्मरण शिल्प की विशिष्टताएँ रेखांकित करना अपेक्षित है, क्या इन तत्त्वों के अतिरिक्त भी महादेवी के संस्मरण-शिल्प की अन्य विशेषताएँ हैं?
अतीत के चलचित्र’ और ‘स्मृति की रेखाएं’ में ज़्यादातर पात्रों की जीवन-कथा या तो दु:खद रही है या फिर संघर्षमय।
अपने जीवन के बीते हुए समय को याद करना मनुष्य का सहज स्वभाव है। अतीत के प्रति मानव मन में अद्भुत गहरा आकर्षण है, क्योंकि कभी-कभी अतीत वर्तमान को प्रभावित करता है। इसी आकर्षण के कारण मनुष्य की जिज्ञासु वृत्ति उसे अपने अतीत को जानने और खोजने के लिए प्रेरित करती है। अज्ञात अतीत को जानने की ललक ने मनुष्य को इतिहासकार बनाया, वहीं ज्ञात अतीत के बारंबार चिंतन तथा मनन से रचनात्मक ऊर्जा लेकर मनुष्य ने लेखन की विभिन्न विधाओं को समृद्ध किया है। इस प्रकार मनुष्य के अनुभवों से उत्पन्न स्मृति उसकी रचनात्मकता को आधार देती है। ये स्मृतियां मनुष्य के वर्तमान तथा अतीत के बीच सेतु का कार्य करती हैं। रचनाकार के लेखन के लिए ये स्मृतियां कच्चे माल की तरह होती है। इस संदर्भ में कमलेश्वर ने लिखा है- “स्मृति अतीतजीवी हो सकती है, पर वह अतीतमुखी नहीं हो सकती- वह आंतरिक अनुभव की प्रगाढ़ आधारभूमि तैयार करती रहती है और अतीत से वर्तमान को और वर्तमान से भविष्य को जोड़ती जाती है, यानी भविष्य की रचनात्मक और वैचारिक अस्मिता को स्वरूप देती है।”1
संस्मरण किसी घटना, व्यक्ति, कालखंड से संबंधित संस्मरण अपने समय का इतिहास भी बताते हैं और प्रामाणिक दस्तावेज़ भी माने जाते हैं। इस तरह संस्मरण इतिहास को सहेजते हैं। इस संदर्भ में अमेरिकी लेखक जी. थॉमस कौज़र संस्मरण लेखन को लेखक के ‘मैं’ (अब) से ‘मैं’ (तब) की यात्रा मानते हैं।2 वे संस्मरण का महत्त्व बताते हैं- “यदि घटनाओं को दोबारा याद न किया जाए, वे विस्मृत हो जातीं हैं। संस्मरण इन्हें आने वाली पीढ़ियों के लिए सहेजने का कार्य करते हैं।”3
लेखक की स्मृति पर छाप छोड़ने वाले व्यक्ति या विषय संस्मरण की विषय वस्तु का रूप लेते हैं। विषय वस्तु लेखक के यथार्थ का हिस्सा होती है। लेखक इसे संस्मरण के रूप में व्यक्त कर पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करता है। इसके लिए लेखक ऐसे प्रसंगों का चयन करता है, जिन्होंने लेखक को प्रभावित किया है और रचना के रूप में वे पाठक को भी प्रभावित करें। इस सन्दर्भ में कामेश्वर शरण सहाय ने लिखा हैं— “संस्मरण की वस्तु चुनते समय लेखक वैसे ही प्रसंगों, संपर्कों, भौगोलिक वृत्तों, दशाओं-दृश्यों, स्थितियों या घटना-व्यापारों का चयन करता है, जो न केवल उसकी स्मृति को मथें, बल्कि प्रस्तुत होकर दूसरे की स्मृति को भी उद्बुद्ध करें।”4
महादेवी के संस्मरण केवल व्यक्ति और उनसे संबंधित घटनाओं की स्मृति भर नहीं हैं, पहले वे संस्मृत का रेखाचित्र बनाती हैं, फिर आत्मीयता से उसमें रंग भरती हैं।
महादेवी के संस्मरण की विषय वस्तु हैं- उनके साहित्यिक साथी, उनके संपर्क में आए सामान्य जन और उनके पालतू पशु-पक्षी। संस्मरण की विषय वस्तु पर केन्द्रित रहते हुए महादेवी तत्कालीन समाज और व्यवस्था की खामियों की और भी संकेत करती हैं, जैसे- परिवार, समाज, साहित्यिक संस्थाएँ आदि।
स्मृतियां संस्मरण के लिए कच्चे माल की तरह हैं, ये संस्मरण के ढाँचे का निर्माण करती हैं। समय बीतने के साथ कुछ स्मृतियां अधिक तीव्र हो जाती हैं, कुछ मंद पड़ जाती हैं और कुछ पर भावनाओं और विचारों का आवरण चढ़ जाता है। नरेंद्र मोहन स्मृति की विशेषता बताते हैं- “स्मृतियों का यह स्वभाव है कि वे किसी तारतम्य में नहीं आतीं। एक के बाद एक चली आती हैं और कभी एक-दूसरे में गुत्थमगुत्था।”5
किसी भी घटना, व्यक्ति या स्थान विशेष में व्यतीत समय रचनाकार की स्मृति में दर्ज हो जाता है। संस्मृत के प्रति रचनाकार की प्रतिक्रिया भी उसकी स्मृति का हिस्सा बन जाती है। रचनाकार अपने व्यक्तित्व और दृष्टिकोण के अनुसार इस स्मृतियों का उपयोग करता है। मानव स्मृति में दैनिक जीवन के कार्यकलाप और विशिष्ट घटनाएं- सभी कुछ संचित होता जाता है। संस्मरणकार अपने स्मृति कोष से ऐसी घटनाओं का चुनाव करता है, जिनकी संवेदना से पाठक जुड़ सके।
मनुष्य दैनिक जीवन में विभिन्न क्रियाएं संपन्न करता है, इनसे अनुभव प्राप्त करता है। इन अनुभवों से वह कुछ निष्कर्ष निकलता है। ये निष्कर्ष मानव स्मृति में संचित हो जाते हैं। मनुष्य इन निष्कर्षों का यथास्थान, यथासमय उपयोग करता है। संचित अनुभव मनुष्य के मस्तिष्क में अतीत का निर्माण करते हैं। मनुष्य अतीत के अनुभवों का वर्तमान में प्रयोग करने के लिए उन निष्कर्षों का पुनः स्मरण करता है, वर्तमान के विचार और अनुभूतियों का इसमें मिश्रण करता है। वह वर्तमान क्रियाओं का योग कर नई स्मृति का निर्माण करता है। इस प्रकार वर्तमान स्मृति को प्रभावित करता है।
स्मृति की इन विशेषताओं को महादेवी के संस्मरणों में देखा जा सकता है। बाल्यकाल का सहायक रामा, विद्यार्थी जीवन में मिली मारवाड़ी भाभी और सखी बिंदा, पालतू पशु निक्की, रोज़ी और रानी- ये सभी उनकी स्मृतियों में सदैव रहे और संस्मरण के रूप में पाठकों के सामने आए।
भावनाओं और स्मृति का गहरा संबंध है। इसलिए भावनाओं के अतिरेक से प्राप्त अनुभव मानव मन पर गहरे से अंकित हो जाते हैं। सुखद और दु:खद दोनों ही स्थितियां भावनाओं का चरम है। इनसे प्राप्त सकारात्मक और नकारात्मक अनुभव मानव स्मृति पर गहरा प्रभाव अंकित करते हैं। ‘अतीत के चलचित्र’ और ‘स्मृति की रेखाएं’ में ज़्यादातर पात्रों की जीवन-कथा या तो दु:खद रही है या फिर संघर्षमय।
रचनाकार अपने संस्मरण में विषयवस्तु के साथ अपने आत्मीय संबंध को व्यक्त करता है। विषय वस्तु के प्रति आत्मीय भाव के कारण ही वह विषय वस्तु पर संस्मरण लिखने को प्रवृत्त होता है। संस्मरण में आत्मीयता सूक्ष्म रूप होनी चाहिए, ताकि विषय वस्तु ही संस्मरण का मुख्य आकर्षण बनी रहे।
संस्मरण वास्तविक व्यक्तियों, स्थानों और घटनाओं से संबंधित यथार्थ का चित्रण है, अतः वे तथ्यात्मक होते हैं। इसीलिए संस्मरण साहित्य के साथ इतिहास को भी समृद्ध करते हैं। संस्मरण इतिहास की तरह विवरणात्मक नहीं होते, उनमें तथ्यों के साथ रचनाकार को प्रभावित करने वाली मानवीय संवेदनाओं का समावेश होता है।
महादेवी के संस्मरण केवल व्यक्ति और उनसे संबंधित घटनाओं की स्मृति भर नहीं हैं, पहले वे संस्मृत का रेखाचित्र बनाती हैं, फिर आत्मीयता से उसमें रंग भरती हैं। संस्मृत के मानसिक धरातल पर उतर कर उनके स्वभाव का गहन विश्लेषण करती हैं। उनके संस्मरणों को रेखाचित्रात्मक संस्मरण की श्रेणी में रखा गया है।
महादेवी के संस्मरण-शिल्प की ये विशेषताएँ संस्मृत पात्रों को उनके जीवन का ही हिस्सा बने रहने नहीं देतीं, बल्कि पाठकों के मर्म को भी स्पर्श करती हैं। यही उनकी संस्मरण विधा की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
संदर्भ सूची
- कमलेश्वर (2006), जो मैंने जिया, राजपाल एंड संस, नई दिल्ली।
- जी. थॉमस कौज़र (2011), मेमॉयर: एन इंट्रोडक्शन, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, न्यूयॉर्क।
- कामेश्वर शरण सहाय (1982), हिंदी का संस्मरण साहित्य, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी।
- नरेंद्र मोहन (2010), विभाजन की त्रासदी: भारतीय कथादृष्टि, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली।
- अशोक मिश्र (2017), ‘भूमिका’, बहुवचन, अंक 54–55 (जुलाई–दिसंबर)।
- डेनियल एल. शैक्टर (2004), हाउ द माइंड फॉरगेट्स एंड रिमेम्बर्स: द सेवेन सिन्स ऑफ मेमोरी, रूपा एंड कंपनी, नई दिल्ली।
- महादेवी वर्मा (1956), पथ के साथी, भारती भंडार-लीडर प्रेस, इलाहाबाद।
- महादेवी वर्मा (1986), मेरा परिवार, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद।
कविता मल्होत्रा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में शोधार्थी हैं। उनकी शैक्षणिक रुचि हिंदी साहित्य, विशेष रूप से संस्मरण साहित्य और स्त्री लेखन के अध्ययन में केंद्रित है। वे हिंदी साहित्य की विधागत संरचनाओं, स्मृति और संवेदना के अंतर्संबंधों पर शोध कार्य कर रही हैं। उनसे ई-मेल के माध्यम से संपर्क किया जा सकता है: kavitamalhotra16@gmail.com