साहित्य अकादेमी सम्मान और ममता कालिया की बेबाक दुनिया
हाल ही में हिंदी की महत्वपूर्ण लेखिका ममता कालिया को साहित्य अकादेमी सम्मान दिए जाने की घोषणा हुई है। यह सम्मान केवल एक लेखक की उपलब्धि नहीं है, बल्कि उस लेखन परंपरा की भी पहचान है जिसने हिंदी साहित्य में स्त्री के अनुभव, संघर्ष और आत्मसम्मान को नई भाषा दी।
ममता कालिया का लेखन पढ़ते हुए यह जल्दी समझ में आ जाता है कि वे उन लेखिकाओं में नहीं हैं जो किसी तयशुदा खांचे में फिट हो जाएँ। वे न तो परंपरा को पूरी तरह खारिज करती हैं और न ही आधुनिकता को अंधे उत्साह से स्वीकार करती हैं। उनके लेखन और जीवन दोनों में एक खास तरह की व्यावहारिक समझ दिखाई देती है—जहाँ स्वतंत्रता का मतलब अकेलापन नहीं, बल्कि बराबरी के साथ जीना है।
साधारण जीवन से निकली असाधारण दृष्टि
ममता कालिया का जन्म 1940 में वृंदावन में हुआ। उनके पिता विद्वान और शिक्षित व्यक्ति थे, जिनका स्थानांतरण अलग-अलग शहरों में होता रहता था। इस कारण बचपन से ही ममता को नए शहर, नए स्कूल और नए माहौल का सामना करना पड़ा।
एक घटना वे अक्सर याद करती हैं। पिता ने एक बार उन्हें फीस के पैसे देकर कहा कि वे खुद जाकर नए स्कूल में अपना दाखिला करा लें। छोटी उम्र की लड़की के लिए यह काम आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने हिम्मत की, स्कूल पहुँचीं, इंटरव्यू दिया और अपना एडमिशन खुद कराया।
यह घटना मामूली लग सकती है, लेकिन इसी ने उन्हें यह समझ दी कि जीवन में कई दरवाजे हमें खुद खोलने पड़ते हैं। बाद के वर्षों में उनका आत्मविश्वास और स्वतंत्र सोच शायद यहीं से मजबूत हुई।
‘पिंक फेमिनिज़्म’ की अवधारणा
ममता कालिया खुद को अक्सर ‘पिंक फेमिनिस्ट’ कहती रही हैं। उनका मानना है कि स्त्री की स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं है कि समाज से पुरुषों को बाहर कर दिया जाए या परिवार की संस्था को नकार दिया जाए।
उनकी दृष्टि में असली सवाल बराबरी का है। वे कहती हैं कि समाज में रहना है तो परिवार भी रहेगा, रिश्ते भी रहेंगे और पुरुष भी रहेंगे—लेकिन इसके साथ स्त्री की आवाज भी उतनी ही स्पष्ट और मजबूत होनी चाहिए।
यह सोच उनके जीवन में भी दिखाई देती है। उन्होंने विश्वविद्यालयों में पढ़ाया, लेखन किया और परिवार भी संभाला। वे इस बात पर जोर देती रही हैं कि स्त्री को अवसर मिलने का इंतजार नहीं करना चाहिए, बल्कि अपनी क्षमता से उसे हासिल करना चाहिए।
घरेलू ‘हाँ-जी’ संस्कृति पर सवाल
ममता कालिया के लेखन में एक बात बार-बार सामने आती है- घर के भीतर की चुप्पी। उन्होंने अपने आसपास देखा कि बहुत सी महिलाएँ जीवन भर केवल “हाँ-जी” कहती रहती हैं।
ब्रज की एक कहावत वे अक्सर याद करती हैं—
“जाई गाँव में रहना, हाँ-जी हाँ-जी कहना।”
इस संस्कृति में स्त्री की अपनी इच्छा, असहमति और सोच धीरे-धीरे गायब हो जाती है। ममता कालिया को यह स्वीकार नहीं था। वे मानती हैं कि स्त्री को अपनी बात कहने की आदत डालनी चाहिए, चाहे वह घर के भीतर हो या समाज में। अगर हर बात पर सहमति ही दी जाए तो धीरे-धीरे व्यक्ति की पहचान खत्म हो जाती है।
विवाह और साझेदारी की यथार्थवादी समझ
ममता कालिया की एक प्रसिद्ध तुलना है। वे अपने अनूठे हास्यबोध का परिचय देते हुए कहती हैं कि पति कुछ-कुछ खरबूजे जैसा है। जब तक उसे काटकर न देखें, तब तक यह पता नहीं चलता कि वह मीठा है या नहीं। इस हल्की-फुल्की टिप्पणी के पीछे गहरी समझ है। उनका कहना है कि विवाह एक सामाजिक संस्था है, लेकिन उसका वास्तविक रूप रोजमर्रा के जीवन में ही सामने आता है।
उनका अपना विवाह लेखक रविन्द्र कालिया से हुआ, जो हिंदी साहित्य की एक बड़ी हस्ती रहे। दोनों का संबंध अक्सर एक दोस्ताना साझेदारी की तरह देखा जाता है। कहा जाता है कि जब ममता कालिया पुरुषों की आलोचना करती हुई कहानियाँ लिखती थीं, तो रविन्द्र कालिया हँसते हुए कहते थे—“वह औसत पुरुषों के बारे में लिखती हैं, मैं औसत नहीं हूँ।”
इस तरह का आत्मविश्वास और सहजता ही शायद उनके रिश्ते की खासियत थी।
लेखन की दुनिया में अलग आवाज
ममता कालिया की कहानियाँ और उपन्यास अक्सर शहरों के मध्यवर्गीय जीवन से निकलते हैं। उनकी भाषा सरल, सीधी और बातचीत जैसी होती है। उनकी रचनाओं में स्त्री पात्र अक्सर किसी बड़े आंदोलन की नेता नहीं होतीं। वे सामान्य जीवन जीने वाली महिलाएँ होती हैं—नौकरी करती हुई, घर संभालती हुई, अपने भीतर छोटे-छोटे विरोध और इच्छाएँ लिए हुए। यही कारण है कि उनके पात्र पाठकों को अपने आसपास के लोग लगते हैं। वे जीवन की छोटी-छोटी स्थितियों में छिपे असमानता और दबाव को सामने लाती हैं।
स्वतंत्रता का असली अर्थ
ममता कालिया की सोच का सबसे महत्वपूर्ण पहलू शायद यह है कि वे स्वतंत्रता को किसी नारे की तरह नहीं देखतीं। उनके लिए स्वतंत्रता एक अभ्यास है—अपने फैसले खुद लेना, अपनी आवाज बनाए रखना और अपनी क्षमता पर भरोसा करना। वे मानती हैं कि जीवन में रिश्ते जरूरी हैं, लेकिन रिश्तों के भीतर भी व्यक्ति की पहचान बची रहनी चाहिए। उनकी रचनाएँ हमें यह सोचने के लिए मजबूर करती हैं कि हम रोजमर्रा के जीवन में कितनी बार केवल आदत से “हाँ” कह देते हैं, जबकि मन में असहमति होती है।
एक महत्वपूर्ण मान्यता
साहित्य अकादेमी सम्मान की घोषणा ममता कालिया के लंबे साहित्यिक सफर की एक महत्वपूर्ण स्वीकृति है। पिछले कई दशकों से उन्होंने हिंदी साहित्य में स्त्री अनुभव को सरल और ईमानदार भाषा में दर्ज किया है। उनकी खासियत यह है कि वे बड़े सिद्धांतों की जगह जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं से अपने विचार बनाती हैं। शायद यही कारण है कि उनका लेखन आज भी पाठकों को अपना-सा लगता है।
ममता कालिया का जीवन से यह भ यह याद दिलाती है कि स्वतंत्रता कोई उपहार नहीं होती। उसे धीरे-धीरे, अपने फैसलों और अपने साहस से हासिल करना पड़ता है। और जब वह मिलती है, तो उसमें कठोरता नहीं, बल्कि एक तरह की सहजता और आत्मविश्वास होता है।

बहुत सुंदर और ममता कालिया जी को अनेक बधाई 💐💐