साहित्य

ललन चतुर्वेदी की ‘क्रीत दासी’ तथा अन्य कविताएं

ललन चतुर्वेदी समकालीन हिंदी साहित्य के एक महत्वपूर्ण और धारदार व्यंग्यकार व कवि के रूप में पहचाने जाते हैं, जिनकी रचनाओं में समाज, राजनीति और मानवीय विडंबनाओं पर तीखी और सार्थक चोट दिखाई देती है। उनकी काव्य-भाषा सरल, संवादधर्मी और प्रभावशाली है, जिसके माध्यम से वे आम आदमी के जीवन, उसकी छोटी-छोटी समस्याओं, संघर्षों और बदलते सामाजिक यथार्थ को सामने लाते हैं। विशेष रूप से डिजिटल युग में बदलते मानवीय संबंधों, ‘बौद्धिकता’ के आडंबर और सामाजिक विसंगतियों को वे व्यंग्य के माध्यम से उजागर करते हैं।

उनकी कविताएँ- जैसे ‘लड़की’, ‘बाघ’, ‘स्मृतियाँ’, ‘बकरी और हत्यारा’, ‘पढ़े-लिखे होने का मतलब’, ‘ईश्वर की डायरी’, ‘दुनिया डिजिटल है’ और ‘मैं मिट्टी का बना हूँ’- समकालीन जीवन की गहरी समझ और संवेदनशील दृष्टि का परिचय देती हैं। कविता के अतिरिक्त वे ‘ललन चतुर्वेदी के बेला’ के माध्यम से भी समसामयिक विषयों पर तीखा और विचारोत्तेजक व्यंग्य प्रस्तुत करते हैं, जो उन्हें अपने समय का सजग और प्रतिबद्ध रचनाकार सिद्ध करता है। मेरा रंग में प्रस्तुत है उनकी कुछ स्त्री विषयक कविताएं।

क्रीत दासी

आज से पैंतालीस साल पहले
वह पैंतालीस रुपए की साड़ी में विदा हुई थी
उन दिनों ब्राइडल मेकअप का समय नहीं था
लहंगा तो उस समय भी महंगा ही रहा होगा
बनारसी साड़ी का सपना देखना तो मानो अपराध ही था
ढोलना भी बमुश्किल चांदी का ही चढ़ा था
पिता का अरमान जरूर रहा होगा कि बेटी को वह सब मिले जो उसे वह दे नहीं पाया
पर कुछ निरर्थक पिता रोते हुए विदा हो जाते हैं
वे बेटियों से भी अधिक रोते हैं विदाई के बाद
आंखें मिलाकर नहीं कर पाते जीवन भर अपनी ही संतति से संवाद

दुःख जिसके भाग्य में आता है
वह बैठ जाता है उसके आंगन में हाथ-पैर तोड़कर
आखिर कहां जाएं अपाहिज दुःख

ब्याह के बाद वह अपने घर की हो चुकी थी बड़ी बहू
व्यंग्य में लोग आंखें मारते हुए कहते थे उसे मालकिन
उस सीधे-सपाट के दुःख पर कौन करे यकीन
भिनसरवा से शुरू हो जाता था उसका रूटीन
चूल्हा-चौका, झाड़ू-बहारू, दाल-रोटी, साग-भात
ऊपर से सास-ननद के ताने अनपढ़-गंवार

चिट्ठी चलने पर भी न हो सकी थी उसकी पढ़ाई
सबसे बड़ा हुनर उस समय था कढ़ाई-बुनाई
एक ही किताब के लिए भाई-बहन में होती थी छीना-झपटी
हारकर जाना छोड़ दिया स्कूल

बेटी तो पराए घर की होती है
गंगा नहा लो जल्दी से कर दो हाथ पीले
यही सुनते-सुनते एक दिन वह पराए घर की हो गई

कहने को तो स्त्री ब्याही जाती है एक पुरुष से

लेकिन पूरा घर ही बन जाता है उसका मालिक-मुख्तार
दो दिनों के लिए आया अतिथि भी उसे देता है नसीहतें हजार

कितनी भी हो उसे हारी-बीमारी
पर कौन समझता है उसकी लाचारी
तपती हुई देह लेकर रोटी पर रोटी बेलती है
आंचल से लोर पोंछती है
किस्मत उससे कुछ इस तरह खेलती है

जब मन किया तो पति-परमेश्वर
लगा देते हैं दो-चार थप्पड़
अधिक मत किया करो चूं-चप्पड़
औरत हो! कम खाओ, गम खाओ
ज़रूरत हो तो आधी रात चूल्हा जलाओ
जलावन नहीं तो खुद को झोंको
पहले सुन लो, बीच में मत टोको—
माई-बाबू जी देवता हैं
और मेरी बहनें हैं देवियां
इनके बारे में कभी मत मुंह खोलो
और समय पर होना चाहिए नाश्ता-कलेवा
पति-परिवार की सेवा में ही है मेवा
आखिरी सांस तक अदहन की तरह उबलते रहो
जो बना-बनाया है सांचा, उसी में ढलते रहो

इस तपस्या के भरम में अहिवात का सुख फलता रहा
रोज लाल सिंदूर से मांग भरती रही
पति के लिए सात सोमवारी जो करती रही
बड़की दीदी घर की बड़की बहू
जीवन भर दासी का जीवन जीती रही

एक दिन जिस घर में आई थी उसकी डोली
उसी घर से उसकी उठेगी अर्थी
लोग उसकी तारीफ के कसीदे पढ़ते हुए
जमकर खाएंगे पूरी-जलेबी, मिष्टान्न
पंडित जी दक्षिणा लेकर लगाएंगे जयकारे
जय हो यजमान! जय हो यजमान!

जीवन का युद्ध लड़ते हुए वह एक दिन चढ़ जाएगी फांसी
उसे शहीद का दर्जा कौन देगा, वह तो है क्रीत दासी।


आखिर, उसकी गलती क्या है?

पता चला
सोलह तारीख को वह सगुन का चूल्हा उठाएगी
करेगी सोलहों श्रृंगार
सत्रह को कराएगी रुद्राभिषेक
अठारह को मेंहदी रचाएगी
उन्नीस को करेगी पूजा मटकोर
हल्दी-संगीत भी करवाएगी धूमधाम से

वह नहीं मानेगी किसी की सलाह
दुल्हे के गले में डालेगी जयमाल
सोने की अंगूठी पहनाएगी
बोलती है ससुराल में यदि मारेगा कोई ताना
तो धरेगी लक्ष्मीबाई का बाना
सबको खिलवाएगी जेल का खाना

कहती है— नहीं पढ़ाओ मुझे सादगी का पाठ
अपनी मेहनत की कमाई पर करती हूं ठाठ
मां-बाप के मरने से सपने नहीं मरते
अनाथ हूं तो क्या रोती रहूं माथ पर रख हाथ
गांव की औरतें मुंहामुंही करती हैं एक ही बात
इतना मुंहजोर किसी को बेटी न दे भोलानाथ!


स्त्री शाम की प्रतीक्षा करती है

खिड़की से बाट जोह रही है एक जोड़ी आंखें
इसमें प्रेयसी वाली प्रतीक्षा का चुलबुलापन नहीं है
वह बिल्कुल एकटक देख रही है सड़क की ओर
जो उसके घर की तरफ आती है

दिन भर की थकन के बाद वह सुस्ताने के लिए नहीं बैठी है
वह इसलिए बैठी है कि साथ में बैठकर पिए एक कप चाय
वह जानती है उस पुरुष की थकान
जो लौट रहा है दिन भर झेलकर तमाम तरह के झंझावात

जैसे ही मुड़ते हैं उस पुरुष के पांव
उसके मन की आंखें मुस्करा उठती हैं
खोलकर झट से किवाड़
नज़रें उठाए बिना
वह सीधे करती है रसोई का रुख
छू-मंतर हो जाती है
दिन भर की उसकी थकान
वह इस तरह मेज पर रखती है चाय
जैसे गंगा से निकली हो कोई सद्यस्नाता।

संपर्क : 202, असीमलता अपार्टमेंट,
मानसरोवर इन्क्लेव, हटिया,रांची 834003
Email: lalancsb@gmail.com
Mob: 9431582801

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