‘माँ, मैं सबके सामने नहीं रोया’ : भारतीय विज्ञापनों में गढ़ी जाती मर्दानगी
नीलिमा शर्मा
नीलिमा शर्मा इस लेख में एक साधारण डिटॉल विज्ञापन के जरिए ‘मर्दानगी’ की सामाजिक परिभाषा पर सवाल उठाती हैं। वे बताती हैं कि ‘न रोने’ की सीख कैसे पुरुषों को उनकी स्वाभाविक संवेदनाओं से धीरे-धीरे दूर करती चली जाती है।
टेलीविजन के पर्दे पर हाल ही में एक विज्ञापन दिखाया जा रहा है, जिसमें एक मासूम बच्चा है, जिसे फुटबॉल खेलते खेलते चोट लग जाती हैं फिर उसकी मासूमियत यह भुला देती हैं विज्ञापन किस वस्तु का है, बस नजर आता हैं तो वह बच्चा उसकी चाल, उसके हाव भाव और बोलती भीगी आँखें। वह एक मिनट का विज्ञापन केवल एक व्यावसायिक दृश्य नहीं, बल्कि पुरुष (चाहे किसी भी उम्र का हो) मनोविज्ञान की एक गहरी चीर-फाड़ है। अब देखिए…. दृश्य की शुरुआत एक धूल भरे खेल के मैदान से होती है, जहाँ एक छोटा लड़का फुटबॉल खेलते हुए अचानक ज़मीन पर गिर पड़ता है। गिरने की आवाज़ और घुटने से रिसता खून साफ़ बता रहा है कि चोट गहरी है। शारीरिक पीड़ा इतनी तीव्र है कि किसी भी साधारण बच्चे की चीख निकल जाती, लेकिन वह बच्चा कुछ और ही करने की कोशिश कर रहा है। वह खड़ा होता है, अपने चेहरे की मांसपेशियों को सख़्त करता है और दर्द से कांपते अपने पैरों को ज़बरदस्ती ‘सीधा’ करके चलने का प्रयास करता है। वह लंगड़ा नहीं रहा, वह अपनी चाल को स्वाभाविक दिखाने का ढोंग कर रहा है ताकि मैदान में मौजूद दूसरे लड़के उसे ‘कमजोर’ न समझ लें। पूरे रास्ते वह बच्चा एक सन्नाटे को ओढ़कर घर पहुँचता है। उसकी आँखों के कोर भीगे हैं, लेकिन आँसू टपके नहीं हैं। जैसे ही वह घर की दहलीज पार करता है और सब परिचितों के प्रश्नों का आसानी से जवाब देते हुए अपनी माँ के सामने पहुँचता है, उसके भीतर का सारा बांध ढह जाता है। भीगी आंखों से अपनी चोट दिखाता बच्चा माँ की गोद में सिर छिपाते ही वह फफक-फफक कर रो पड़ता है और सुबकते हुए एक ऐसा वाक्य बोलता है जो इस पूरे लेख की आधारशिला है…. “माँ, मैं सबके सामने नहीं रोया।”
यह मासूम वाक्य दरअसल उस ‘मर्दानगी के प्रशिक्षण’ का पहला प्रमाण पत्र है, जो हमारा समाज हर लड़के को पालने में ही थमा देता है। यहीं से उस यात्रा की शुरुआत होती है जहाँ एक ‘इंसान’ को धीरे-धीरे ‘पत्थर’ में तब्दील कर दिया जाता है। पुरुष होने की यह पहली शर्त है कि तुम्हें अपनी पीड़ा का प्रदर्शन वर्जित है। तुम्हें अपनी चाल सीधी रखनी होगी, चाहे तुम्हारे भीतर की हड्डियाँ टूट रही हों या मन लहूलुहान हो, यानि मर्द को दर्द नहीं होता I
जैसे-जैसे उम्र का पहिया घूमता है, ऐसा ही हर बच्चा बड़ा होता है और समाज की नज़रों में एक ‘पुरुष’ की मुकम्मल परिभाषा बनने की ओर अग्रसर होता है। लेकिन विडंबना देखिए, जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही उसकी ‘खैरियत’ पूछने वाले हाथ पीछे खिंचने लगते हैं और उसकी ‘हैसियत’ नापने वाले तराजू बाहर निकल आते हैं। एक पुरुष के लिए जवानी का अर्थ प्रेम या स्वप्न नहीं, बल्कि ‘उपयोगिता’ की परीक्षा बन जाता है। अब उससे कोई यह नहीं पूछता कि “आज तुम उदास क्यों हो?” या “तुम्हारे मन के किसी कोने में कोई डर तो नहीं?” सवाल सिर्फ एक होता है…”तुम कितना कमा रहे हो?” या “तुम्हारा भविष्य क्या है?”
भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में सहनशीलता को सदैव एक उच्च गुण माना गया है। रामायण, महाभारत और लोककथाओं में आदर्श चरित्र वही है जो पीड़ा को सहते हुए भी संतुलित बना रहता है। ऐसे में यह विज्ञापन उसी परंपरा का आधुनिक विस्तार प्रतीत होता है, जहाँ “न रोना” एक प्रकार की नैतिक शक्ति के रूप में स्थापित किया जाता है। बचपन से ही बच्चों को यह संदेश दिया जाता है कि आँसू कमजोरी का प्रतीक हैं और सच्चा साहस वही है जो बिना शिकायत सब सह जाए। परिणामस्वरूप, भावनाओं को दबाने की प्रवृत्ति एक सामाजिक आदत बनती चली जाती है।
साहित्य, जो समाज का दर्पण भी है और मार्गदर्शक भी, इस प्रवृत्ति को कई बार प्रश्नांकित करता है। आधुनिक हिंदी साहित्य में संवेदनशीलता को मनुष्य होने का मूल गुण माना गया है। लेखकों ने बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि पीड़ा को व्यक्त करना, उसे शब्द देना, दरअसल आत्मस्वीकृति का एक साहसिक रूप है। इस दृष्टि से देखा जाए तो “न रोने” का आदर्श कहीं-न-कहीं मनुष्य को उसकी स्वाभाविक भावनाओं से दूर करता है और एक ऐसी कठोरता को जन्म देता है, जो भीतर ही भीतर टूटन को जन्म देती है।
साहित्यिक दृष्टिकोण से देखें तो हिंदी साहित्य के कालजयी पात्रों ने इस द्वंद्व को बखूबी जीया है। प्रेमचंद के ‘गोदान’ का होरी याद आता है, जो अपनी पूरी उम्र केवल इसलिए तिल-तिल कर जला देता है कि वह समाज की नज़रों में एक ‘मर्यादित पुरुष’ बना रहे। होरी की त्रासदी यह नहीं थी कि वह गरीब था, उसकी त्रासदी यह थी कि वह अपनी पीड़ा किसी से साझा नहीं कर सका। वह एक स्तंभ की तरह खड़ा रहा, जबकि भीतर से उसे दीमक चाट रही थी। हिंदी साहित्य में ‘मुक्तिबोध’ की कविताओं का वह ‘अंधेरे में’ भटकता पात्र दरअसल आज के पुरुष की मानसिक स्थिति का सटीक चित्रण है। वह अपनी ‘अस्मिता’ की तलाश में है, लेकिन चारों ओर से दबाव उसे तोड़ रहे हैं। अज्ञेय की कविताओं में भी वह ‘अकेला पुरुष’ दिखाई देता है जो अपनी स्वतंत्रता और सामाजिक दायित्वों के बीच पिस रहा है। समाज ने पुरुष को ‘शक्ति’ का पर्याय तो माना, लेकिन उसे ‘शांति’ का अधिकार नहीं दिया।
आज का आधुनिक पुरुष भी एक ‘शहरी होरी’ ही है, जो ईएमआई, कैरियर की दौड़ और पारिवारिक उम्मीदों के बोझ तले दबा हुआ है, पर चेहरे पर वह ‘सीधी चाल’ का मुखौटा लगाए घूम रहा है।समाज ने पुरुषत्व को एक ऐसे किले के रूप में विकसित किया है जहाँ प्रवेश तो सम्मानजनक है, लेकिन वहाँ से बाहर निकलना वर्जित है। यदि कोई पुरुष अपनी असुरक्षाओं के बारे में बात करता है, तो उसे ‘बुजदिल’ कहा जाता है। यदि वह रोता है, तो उसे ‘औरतों जैसा’ कहकर अपमानित किया जाता है। यह तुलनात्मक अपमान दरअसल उस पुरुष को भीतर से मार देता है। उसे बताया जाता है कि उसकी जिम्मेदारी केवल ‘प्रदाता’ की है। वह एक एटीएम मशीन है, वह एक ढाल है, वह एक रक्षक है… लेकिन वह एक संवेदनशील मनुष्य भी हो सकता है, इस बात को समाज ने पूरी तरह विस्मृत कर दिया है।
मध्यमवर्गीय परिवारों में यह स्थिति और भी विकट है। एक लड़का जब अपनी पढ़ाई पूरी करता है, तो उसके सिर पर केवल अपनी ही नहीं, बल्कि माता-पिता की वृद्धावस्था, बहन की शादी और छोटे भाइयों के भविष्य का जुआ रख दिया जाता है। इस जिम्मेदारी के बोझ तले उसकी अपनी पसंद, उसके अपने शौक और उसके अपने सपने कहीं दबकर दम तोड़ देते हैं। वह चाहकर भी यह नहीं कह सकता कि उसे इस दौड़ से थकान हो रही है। उसे तो बस भागना है, क्योंकि ठहरना उसके लिए एक ‘सामाजिक मृत्यु’ के समान है।
जब वह पुरुष इस अंधी दौड़ में सफल होता है, तो सब उसके पीछे चलते हैं। लेकिन ज़रा सोचिए, यदि वह किसी मोड़ पर असफल हो जाए? यदि वह उन तय मानकों से पीछे रह जाए जो समाज ने उसके लिए गढ़े हैं? तब शुरू होता है ‘आलोचना और तंज’ का वह अंतहीन सिलसिला जो उसे आत्म-संदेह के अंधेरे कुएँ में धकेल देता है। “तुमने किया ही क्या है?”, “फलां का बेटा देखो कहाँ पहुँच गया”, “तुमसे तो इतनी उम्मीदें थीं”…ये वाक्य नहीं, बल्कि वे नश्तर हैं जो उसके आत्म-सम्मान को छलनी कर देते हैं।
यहाँ एक गहरा मनोवैज्ञानिक पहलू ‘खालीपन’ का है। पुरुष अक्सर अपने अकेलेपन को साझा नहीं कर पाते। एक उम्र के बाद उनके मित्र भी कम हो जाते हैं और जो बचते हैं, उनसे भी संवाद केवल राजनीति, खेल या व्यापार तक सीमित रहता है। दिल की बात कहने का कोई मंच उनके पास नहीं होता। वे अपने भीतर एक ऐसा संसार बना लेते हैं जहाँ केवल वे और उनका आत्म-संदेह वास करता है। वे रातों को जागकर अपनी विफलता का हिसाब लगाते हैं और सुबह फिर वही ‘सीधी चाल’ वाला चेहरा लेकर दुनिया के सामने निकल जाते हैं।
हम अक्सर नारीवाद की बात करते हैं, जो बेहद ज़रूरी है, लेकिन हमें एक ‘स्वस्थ पुरुष विमर्श’ की भी उतनी ही आवश्यकता है। जब तक हम पुरुषों को यह आज़ादी नहीं देंगे कि वे अपनी कमजोरी को स्वीकार कर सकें, तब तक हम एक हिंसक और कुंठित समाज का निर्माण करते रहेंगे। वह पुरुष जो अपनी भावनाओं को व्यक्त नहीं कर पाता, अक्सर वह भीतर से गुस्सैल या चिड़चिड़ा हो जाता है। उसका यह व्यवहार दरअसल उसकी दबी हुई पीड़ा का ही एक विकृत रूप है।
विज्ञापन का वह बच्चा जब अंत में कहता है कि “मैं सबके सामने नहीं रोया”, तो वह जीत की घोषणा नहीं कर रहा होता, बल्कि वह अपनी सहजता के खो जाने की खबर सुना रहा होता है। वह बच्चा अब कभी सहज नहीं रह पाएगा। उसे पता चल गया है कि दुनिया को उसकी ‘मुस्कान’ से मतलब है, उसके ‘आँसुओं’ से नहीं। यही वह बिंदु है जहाँ से एक संवेदनशील लड़का एक निष्ठुर मशीन बनने की प्रक्रिया शुरू करता है।
हमें अपने समाज की जड़ों में खाद की तरह ‘संवेदना’ डालनी होगी। हमें बेटों को यह सिखाना होगा कि रोना कमजोरी नहीं, बल्कि हृदय की शुद्धता है। हमें पुरुषों की ‘सैलरी’ से पहले उनकी ‘मुस्कान’ की चिंता करनी होगी। एक पुरुष की असली हैसियत यह नहीं होनी चाहिए कि उसके पास कितनी गाड़ियाँ या बंगले हैं, बल्कि यह होनी चाहिए कि वह अपने परिवार और मित्रों के बीच कितना ‘सहज’ और ‘मुखर’ रह पाता है।
आज का पुरुष विमर्श केवल अधिकारों की बात नहीं है, बल्कि ‘मानवीय अस्तित्व’ की वापसी की मांग है। वह पुरुष जो समाज के बनाए मानकों के नीचे दबकर अपनी पहचान खो चुका है, उसे फिर से यह याद दिलाने की ज़रूरत है कि वह सबसे पहले एक मनुष्य है। उसकी मन:स्थिति का सम्मान होना चाहिए। उसकी चुप्पी का अर्थ उसकी सहमति या मजबूती नहीं, बल्कि उसकी बेबसी भी हो सकती है।
साहित्यकार धर्मवीर भारती ने ‘अंधा युग’ में युद्ध के बाद की जो विभीषिका दिखाई है, वैसी ही एक मानसिक विभीषिका आज के ‘सफल’ पुरुष के भीतर चल रही है। वह युद्ध जीत चुका है, उसके पास धन है, पद है, हैसियत है, लेकिन वह भीतर से हार चुका है क्योंकि उसके पास अपनी ‘खैरियत’ बताने वाला कोई कान नहीं है।
डिटॉल वाला बच्चा हमारे सामने एक द्वंद्व प्रस्तुत करता है कि वह एक तरफ तो हमें दृढ़ता ओर आत्मसंयम का पाठ पढ़ा रहा हैं तो दूसरों तरफ अपनी ही संवेदनाओं का चाहे अनजाने में ही दमन कर रहा हैं I सामाजिक ओर साहित्यिक दृष्टि से यह आवश्यक हैं कि हम इस प्रतीक को संतुलित रूप में समझे,जहाँ साहस और संवेदनशीलता दोनों को समान महत्व दिया जाए I
निष्कर्ष के रूप में यह कहना आवश्यक है कि पुरुष के हिस्से में आने वाली आलोचना, तंज और आत्म-संदेह को खत्म करने का एकमात्र रास्ता ‘संवाद’ है। हमें उस विज्ञापन वाले बच्चे को फिर से यह यकीन दिलाना होगा कि माँ की गोद की तरह यह दुनिया भी उसके आँसुओं को स्वीकार कर सकती है। हमें हैसियत के पैमानों को तोड़कर खैरियत के नए सेतु बनाने होंगे। तभी वह पुरुष, जो एक उम्र के बाद सिर्फ एक संसाधन बनकर रह गया है, फिर से एक सजीव और हंसता-खेलता इंसान बन पाएगा। उसकी चाल ‘सीधी’ हो या न हो, उसके मन का रास्ता सीधा होना चाहिए, जहाँ से वह अपनी भावनाओं को बिना किसी डर के बाहर ला सके।

नीलिमा शर्मा देहरादून/मुजफ्फरनगर से जुड़ी एक सक्रिय साहित्यकार और संपादक हैं, पिछले दिनों उनका नया उपन्यास 'सुर' प्रकाशित हुआ है। जो पुरवाई पत्रिका में उपसंपादक के रूप में कार्यरत हैं। उनका एकल कहानी संग्रह “कोई खुशबू उदास करती है” तथा कविता संग्रह “शनिवार के इंतजार में” प्रकाशित हो चुके हैं। वे मुठ्ठी भर अक्षर, लुकाछिपी, खुसरो दरिया प्रेम का, मृगतृष्णा, तन पिंजरा मन बांवरा और पुरवाई कथामाला (भाग 1 व 2) जैसी कृतियों के संपादन से भी जुड़ी रही हैं। डिजिटल साहित्य के क्षेत्र में उन्होंने तेरह लेखिकाओं के साथ सहलेखन करते हुए प्रथम उपन्यास की अवधारणा और संपादन किया। इसके अतिरिक्त, पुरस्कृत उपन्यास 'हाशिए के हक' में भी उन्होंने चार लेखिकाओं के साथ सहलेखन एवं संपादन का महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनसे मोबाइल नंबर 8510801365 या ईमेल neavy41@gmail.com के माध्यम से संपर्क किया जा सकता है।
