जेंडर विमर्श

यह कैसा समाज, जो बेटी का हक दबा लेने की वकालत करता है?

लेखक, व्यंगकार मुकेश नेमा की यह छोटी सी टिप्पणी यह सोचने के लिए मजबूर कर देती है कि कैसे समाज ने बेटियों के हक को दबा लेने को सामान्य बना दिया है और किस तरह से लड़कियों के दिमाग की भी कंडीशनिंग कर दी जाती है।

मुकेश नेमा

लडकियों को कुछ नही चाहिये …वे केवल स्नेह ,प्रेम और आदर से ही प्रसन्न हैं। आपने हज़ारों बार सुनी होगी ये बात , और आमतौर पर किसी लड़की या महिला से ही सुनी होगी ! आईये आज इसी पर सोचें।

पहली बात मै इसी विचार से असहमत हूँ।किसी लड़के ने यह कभी क्यों नही कहा कि उसे कुछ नही चाहिए ,जो है वह सब बहन को दे दिया जाए , वह केवल आदर ,स्नेह से ही कभी संतोष क्यों नही कर लेता ? अपनी बहन को छोड़िये अपनी ब्याहता बेटी को कुछ देने मे जी कलपता है उसका। कुछ देता भी है तो अहसान सा करता है ,देता है तो उपहार की तरह देता है। सोच कर देखिये ये आदर प्रेम वाली गठरी लड़की के सिर पर ही क्यों लदी है ? विडम्बना यह कि लड़कियाँ इस बोझ को सदियों से ख़ुशी ख़ुशी लादे भी घूम रही है ! वह भी अपनी ही चाहना के नाम पर।

इसमें चाहने की कोई गुंजाईश ही नही है। पिता की सम्पत्ति मे हर संतान का वैधानिक भाग होता है और समय आने पर हर संतान को यह अनिवार्यत: मिलना ही चाहिए। पर हमारे यहां व्यवहार मे ऐसा कभी नही होता। लड़के सहज रूप से पिता की संपत्ति पर काबिज हो जाते है और लड़कियां प्रायः प्रतिकार नही करती।

वो उसे सहज मानती है ,चुप रहती है। वो आदर भर को पर्याप्त मानती है। दरअसल हमारी लड़कियों के दिमाग़ मे यह केवल आदर प्रेम सम्मान वाला षड्यंत्रकारी विचार पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने ही भर दिया है।

यही समझना है लड़कियों को। पिता की सम्पत्ति मे से अपना विधिक भाग लेने मे ग्लानि जैसा कुछ है नही। भाई देने मे आनाकानी करे तो लड़कर लें। लड़के पेतृक सम्पत्ति मे अपने भाग के लिये अपने भाईयों से लड़ते है या नही ? हिंदुस्तान की अदालतों मे आधी मुक़दमे बाज़ी इसी वजह से हैं। आप क्यों नही कर सकती ऐसा ? अपने अधिकार के लिये आप नही लड़ेगी तो कौन लड़ेगा ?

अब वही रोना। लोग क्या कहेंगे ? थूकेगा समाज। भाई और मायका छूट जायेगा। तो ऐसे भाई जो निसंकोच बहनो की ज़मीन जायदाद ,वाजिब हिस्सा दबा जाते है उनका आप करेगी भी क्या ? लोगों को भाड मे जाने दीजिए, आपके पास अपनी आर्थिक हैसियत होगी तो यही आपको लाईन मे लग कर सलाम करेंगे। और बेटी का हिस्सा दबा लेने की वकालत करने वाला समाज तो वैसे भी थूकने लायक है।

मुकेश नेमा हिंदी के जाने-माने व्यंगकार हैं, वे सोशल मीडिया पर भी नियमित लिखते हैं। अपनी पोती 'इरा' के जन्म पर उन्होंने डायरी लिखना शुरू किया, जो 'इत्तू सी इरा' के नाम से प्रकाशित हुई है, जिसमें छोटी-छोटी बातों को मोहक अंदाज़ में लिखा है। इसकी अगली कड़ी 'इतराती इरा' के नाम से प्रकाशित हो चुकी है। इसके अलावा 'बैठे ठाले', 'फुरसतिये' और 'तुम्हारी हँसी सदानीरा' के नाम से उनके संग्रह प्रकाशित हुए हैं। 

How did this make you feel?
🌸
Stay in the loop

Get the latest stories on women's rights in India — straight to your inbox.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Share via
Copy link