Walkabout : फिल्म जो आपको असहज भी करेगी और बाँधे भी रखेगी
सुषमा गुप्ता :
वॉकअबाउट’ (1971) निकोलस रोएग द्वारा निर्देशित एक प्रसिद्ध सर्वाइवल ड्रामा फिल्म है। यह कहानी ऑस्ट्रेलिया के आउटबैक (रेगिस्तान) में फंसे दो श्वेत शहरी बच्चों (जेनी एगटर और ल्यूक रोएग) की है, जिन्हें एक आदिवासी किशोर (डेविड गुल्पिलिल) सहारा देता है। एडवर्ड बॉन्ड ने इसकी पटकथा लिखी है, जो जेम्स वैंस मार्शल के 1959 के उपन्यास पर आधारित है। कहानी दो श्वेत स्कूली बच्चों के इर्द-गिर्द घूमती है, जिन्हें ऑस्ट्रेलिया के सुदूर इलाकों में अकेले छोड़ दिया जाता हैऔर उनकी मुलाकात एक आदिवासी किशोर लड़के से होती है जो उन्हें जीवित रहने में मदद करता है।
इस फिल्म में कुछ है ऐसा जो आपको बहुत परेशान करेगा और वह परेशान करना सिर्फ छिपकली गिरगिट और दूसरे रेंगने वाले जीवों के क्लोज शॉट नहीं है। हालाँकि वह बेहद खूबसूरत है और उतने ही ज्यादा क्रीपिंग भी। इतने क्रीपिंग के पेट में अजीब सी बेचैनी होती है और जब उनका शिकार करके उन्हें जिस तरह से काटा पीटा जा रहा है तब वोमिट सेंसेशन भी होता है।
इस सबका पिक्चराइजेशन ऐसा है कि दिल दिमाग पर असर करता है और स्क्रीन से नज़र हटाने पर मजबूर करता है पर मैं ठीक-ठीक नहीं बता सकती कि इसमें इतना ऐसा क्या ग्रीपिंग है कि शुरू करने के बाद आप छोड़ नहीं सकते। कम से कम मैं नहीं छोड़ पाई। हो सकता है बहुत लोगों ने छोड़ भी दी हो। कुछ मेरे अंदर एक कीड़ा भी है यह जानने का कि आखिर यह दुनिया की ग्रेटेस्ट मूवीज़ में से एक क्यों है! पूरी देख चुकने के बाद जो बेचैनी है मेरे अंदर शायद यही वजह रही होगी! अच्छा साहित्य हो या अच्छा सिनेमा गहरे तक आपको बेचैन करता ही है।
अगर आप फिल्म देखने वाले हैं तो आगे कहानी है इसलिए अपने रिस्क पर पढें।
फिल्म शुरू होती है ऑस्ट्रेलिया के हाई राइज़ अपार्टमेंट से। एक फैमिली है जिसमें कुछ अजीब उदासी है। क्या, यह नहीं समझ में आता। पिता अपने दोनों बच्चों को, 14 साल की बेटी और 6 साल के लड़के को कहीं पिकनिक के बहाने बहुत दूर सुनसान में ले जाता है और उनकी हत्या करने की कोशिश करता है। लड़की अपने भाई को लेकर वहाँ से बचकर भाग जाती है। पिता खुद को गोली मार लेता है और कार को आग लगा लेता है। लड़की के पास पिकनिक के नाम पर जो थोड़ा बहुत सामान है और एक रेडियो है, उसी को लेकर वह धूप रेत भूख प्यास में भटकती रहती है। साँप बिच्छू गिरगिट छिपकलियों इन सबके इतने क्लोज़ शॉट है कि दिल धक-धक करने लगता है कि अब क्या होगा, अब क्या होगा।
उस तपते रेगिस्तान में जब बिल्कुल मरणासन्न हालत में वो दोनों पहुँच जाते हैं, तब एक आदिवासी लड़का इन दोनों को मिलता है, जो इनकी जान बचाता है। एक अलग तरह का बीहड़पन है यहाँ से फिल्म में। एक रॉ ब्यूटी जो बेहद खूबसूरत है। वह उन दोनों को इस तरह के रेगिस्तान और जंगल में सरवाइव करना सीखाता है। उसके सहारे वह दोनों फिर से जी उठते हैं। छोटा भाई चुलबुला है, हमेशा कुछ ना कुछ बोलता रहता है। जहाँ लड़की उस आदिवासी लड़के की एक भी बात समझ नहीं पाती और ना ही वह समझने का प्रयत्न करती है, वहीं वह छोटा लड़का इशारों से उस आदिवासी लड़के से कम्युनिकेट कर लेता है।
वह उसके साथ खुश है आदिवासी लड़का भी उनके साथ खुश लगता है। यहाँ तक कि जब जलती धूप से छोटे बच्चे की खाल बुरी तरह जल जाती है वह उसका जंगली तरीकों से उपचार भी करता है। वह लगातार उनका मार्गदर्शक बना हुआ है। कुछ यहाँ पर बहुत सर्रियल सा है। समझ नहीं आता सच में घट भी रही है या वहम है! हालाँकि मुझे लगता है वह घट ही रहा होता है। जैसे दो बार ऐसा होता है कि वो तीनों सिविलाइज्ड लोगों के बहुत ही पास से गुज़र जाते हैं जो रेगिस्तानी इलाकों में कुछ सर्वे के लिए या किसी काम के लिए है। पर बच्चे उन लोगों को देख नहीं पाते और वह आदिवासी लड़का भी जैसे यह नहीं समझता कि वह उन्हें बताएँ कि तुम्हारे लोग मिल गए हैं। वह बस वहाँ से गुज़र जाते हैं।
जब आप अंत तक पहुँचते हैं आप स्तब्ध रह जाते हैं। वह लड़का एक शिकार कर रहा है अचानक से पीछे से एक जीप बेहद तेज़ गति से आती है शिकारियों की, जो उसे लगभग धकेलती हुई निकल जाती है। वह भौंचक्का देखता रहता है कि किस तरह वह अपनी बंदूक से जानवरों को लगातार मार रहे हैं। उन जानवरों को जिन्हें मारने के लिए उसे कड़ी मेहनत करनी पड़ती है, जिन्हें पकड़ने के लिए उसे अपनी जान पर खेलना पड़ता है, उन्हें वह इतनी आसानी से एक के बाद एक धराशाई किए जा रहे हैं ।वहाँ ऐसा लगता है जैसे लड़के का मन टूटा है। वह लौट कर आता है उस लड़की के पास। उस समय लड़की बिना कपड़ों के है। वह उसे देखकर घबराती है और जल्दी-जल्दी कपड़े पहनना शुरू करती है। वह इस बात पर जैसे हर्ट होता है।
फिल्म में बार-बार ऐसा प्रतीत होता है कि दोनों एक दूसरे को अफेक्शन से देख रहे हैं। कम से कम आदिवासी लड़का तो देख ही रहा होता है। लड़की के एक्सप्रेशन कभी भी क्लियर नहीं है कि वह उसे देखते हुए क्या सोच रही है। दोनों ही टीनएज में हैं। हार्मोनल बदलाव भी उन दोनों को महसूस हो ही रहे हैं। अंत में वह लड़का खुद को रंग-बिरंगे पेंट से सजाता है और पूरी रात उस लड़की को रिझाने के लिए भावुक हो नृत्य करता है। पर लड़की उस से डर रही है। जैसे उस लड़की को उसमें कोई दिलचस्पी नहीं है।
अगले दिन सुबह उसका छोटा भाई कहता है, वह आदीवासी लड़का कहीं नहीं है। वह हमें छोड़कर चला गया पर उसने मुझे कल सड़क दिखाई थी। लड़की कहती है उसका काम हमें सिर्फ सड़क तक पहुँचाना ही था। चला गया तो जाने दो। वह अपने परिवार के पास वापस गया होगा। हम सड़क की तरफ चलते हैं। फिर भी छोटा लड़का उसको आसपास ढूंढ़ता है और आकर अपनी बहन को कहता है कि वह मर गया है। वह कहती है तुम्हें कैसे पता! वह बोलता है कि मैं उसको अपनी याद के लिए, अपना पैन देना चाहता था पर उसने नहीं लिया। लड़की अपने भाई के पीछे जाती है तो देखती है कि लड़का पेड़ से लटका हुआ है। उसने आत्महत्या कर ली है। उसने अपना पूरा बदन सजा रखा है, जो सूरज की किरणों में चमक रहा है। उस पर अब मक्खियाँ बैठ रही हैं।
आपके ज़ेहन में कौंधते हैं, फिल्म में पहले दिखाए गए अनगिनत दृश्य। उसकी अब वही दुर्गति होगी, जो रास्ते भर मरे हुए जानवरों की कटी-फटी लाशों पर दुनिया जहाँ के कीड़े रेंगने से दिखाई गई हैं। उनकी हड्डियाँ, खोपड़ियाँ वह सब दिखाया गया है। मुझे सिहरन होती है। बहुत गहरी तकलीफ भी। पर वह लड़की सिर्फ एक बार कुछ पल के लिए उसके सीने पर हाथ रखती है और लगता ही नहीं कि जैसे उसे कोई बहुत खास फर्क पड़ा। वह उसके बाद अपने भाई को लेकर सड़क की तरफ निकल जाती है।
अंत में अब वह लड़की एक शादीशुदा औरत है। एक अपार्टमेंट में है, उसी में जहाँ से फिल्म शुरू हुई थी। उसका पति ऑफिस पॉलिटिक्स की बात कर रहा है पर वह जंगल में बिताया हुआ वह समय सोच रही है जब वह तीनों निर्वस्त्र हो पानी में नहा रहे थे और आदिवासी लड़का तब उसके सामने चट्टान पर चढ़ सीना चौड़ा करके खड़ा उसे रिझा रहा था।
वह अब बेहद उदास दिखती है।
यह दिल तोड़ देने वाली एक उदास प्रेम कहानी थी शायद.. या ज़िंदगी की निर्मम सच्चाई थी जो महानगर के खोखलेपन से उठकर जंगल के निर्मलता में खुश थी..या एक झलक भी थी इंसान के लालच की जो बिना किसी ज़रूरत के शिकार पर निकला है।
या यह सबकुछ थी।
जितनी आसानी से मैंने यहाँ कहानी लिखी है ऐसा लग रहा है, देखने में यह बिल्कुल आसान नहीं है। फिल्म बार-बार आँखें बंद करने पर मजबूर करती है। घबराहट देती है और जैसा कि मैंने पहले भी कहा, वोमिट सेंसेशन भी देती है। इसके बावजूद मेरे लिए इसे बीच में बंद करना नामुमकिन था। इस कहानी में अंडर करंट कुछ है, दिमाग की परतों को उधेड़ता हुआ। शायद वही सर्रियलिज्म जो मुझे हमेशा से गहरे तक बांधता रहा है। शायद वही बीहड़पन, वही रॉनेस जो दिमाग की गुंजलों में मेरे बिंधी है।
खैर यह फिल्म हर किसी के लिए नहीं है पर जिसको भा जाए उसके लिए इसके बहुत सारे इंटरप्रिटेशन हो सकते हैं। जो मैंने लिखा है उस से बहुत-बहुत अलग भी। यही शायद इस फिल्म की सबसे बड़ी खूबसूरती है।
कान फिल्म समारोह में यह फिल्म प्रतिष्ठित ‘पाल्म डी ओर’ जो उस समय का Grand Prix था के लिए नामांकित की गई थी। वैलाडोलिड अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह 1972, इस फिल्म ने ‘अवार्ड ऑफ द सिटी ऑफ वैलाडोलिड’ जीता था।
यह फिल्म ऑस्ट्रेलियन न्यू वेव सिनेमा की पहली महत्वपूर्ण फिल्मों में से एक मानी जाती है।
सुषमा गुप्ता समकालीन हिंदी साहित्य की सक्रिय लेखिका हैं, जो कहानी, उपन्यास और कविता के माध्यम से मानवीय संबंधों, मध्यवर्गीय जीवन और स्त्री अनुभवों की सूक्ष्म परतों को अभिव्यक्त करती हैं। उनकी प्रमुख कृतियों में तुम्हारी पीठ पर लिखा मेरा नाम, मन विचित्र बुद्धि चरित्र, कितराह और तलब उल्लेखनीय हैं, जिनका प्रकाशन हिंद युग्म से हुआ है। उनकी रचनाओं में जीवन के साधारण अनुभवों को संवेदनशील और आत्मीय भाषा में प्रस्तुत करने की विशेषता दिखाई देती है, जिसके कारण उनका लेखन पाठकों से गहरा संवाद स्थापित करता है।
