केतन यादव की कविता ‘माँ का पूर्व प्रेम’
केतन यादव
समकालीन हिंदी कविता में नई पीढ़ी के कवियों के बीच केतन यादव अपनी संवेदनशील और आत्मीय कविताओं के लिए पहचाने जा रहे हैं। उनकी कविताओं में घर-परिवार, स्मृति, प्रेम, स्त्री की मौन दुनिया और छोटे-छोटे घरेलू दृश्यों के भीतर छिपी भावनात्मक बेचैनियों को बेहद सादगी से दर्ज किया जाता है। उनकी रचनाओं में हिंदी साहित्य की गंभीर परंपरा का असर भी दिखाई देता है, लेकिन भाषा बनावटी नहीं बल्कि सहज और बातचीत के करीब रहती है।
‘माँ का पूर्व प्रेम’ ऐसी ही कविता है, जिसमें एक बेटे की नजर से माँ के भीतर दबे हुए उस अतीत को देखने की कोशिश है। यह कविता केवल माँ की उदासी नहीं, बल्कि स्त्रियों के उन अधूरे और अनकहे हिस्सों की भी कविता है, जो परिवार की जिम्मेदारियों के पीछे धीरे-धीरे छिप जाते हैं।
माँ का पूर्व प्रेम
कपड़े इस्तरी करते समय जलने पर वह चिहुँकती नहीं
सीटकिनी बंद करते समय चोट लगने पर भी तुरंत काम में लग जाती
अक्सर हमारे या पिता के गुस्से को भी वह
एक अप्रत्याशित शांति से टाल जाती है
और बेहद उकता उठने के बाद भी उसे गुस्सा नहीं आता
इस तरह अब उसके धीरज पर एक विवशतापूर्ण शक होता है
दुकान पर पिता जब मैरून साड़ी चुन लेते तो वह
अपने हाथ में थामी फिरोजी साड़ी को वहीं तुरंत छोड़ देती
तमाम रोमानी जीवंत क्षणों में
वह एक क्षणिक गुलाबी मुस्कान के बाद बेहद गंभीर हो जाती
पौधों में पानी देते वक्त मोगरे के पास ठहर जाती
और अखबार में केवल क्रिकेट के पेज पर रुकती
जिससे उसका कोई संबंध नहीं
फिर उसके अकेलेपन की उदासी का संबंध किससे है?
कितनी चौकन्नी सजग निगाह चाहिए होती है प्रतिबद्धता के लिए
देह का स्पर्श विस्मृत भी हो जाए पर मन का छुआ कहाँ जाएगा
वह आस-पास की अलगनी पर सूखते कपड़ों में कोई याद बनकर
उभर जाएगा किसी डिलीट किए हुए फोटो और मैसेजेस के बाद भी
अब जब प्रेमिका और पत्नी के अतीत को
अपने अतीत के साथ में सहज बाँट चुका हूँ तब
मैं अब उसकी उदासी के द्वार पर जाना चाहता
मेरे भीतर प्रेम माँ ने बोया और माँ के भीतर ?
पिता जितनी सहजता से अतीत के प्रेम प्रसंग सुना लेते थे
माँ कहाँ कभी बीते कल में मुड़ पाई
आज अचानक वो दिखाई दी पिता को
ऐसी सभी कहानियों पर माँ चुप ही रही
उसे किसी वर्तमान में किसी अतीत से मानों फर्क नहीं पड़ता ।
( एक चरवाहे का गीत ‘ संग्रह से )
केतन यादव वर्तमान में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में शोध छात्र हैं। उनकी कविताएं और लेख आलोचना, समालोचन, तद्भव, पक्षधर, वागर्थ, कृतिबहुमत, साखी, समकालीन जनमत, समावर्तन, वनमाली और समय के साखी सहित विभिन्न पत्रिकाओं एवं वेब माध्यमों पर प्रकाशित हो चुके हैं।
