स्त्री की देह, उसकी इच्छाएं और समाज के नैतिक पहरे
अनामिका चक्रवर्ती अनु
जहां इन दिनों औरतें इस क्षेत्र में थोड़ा खुलकर सामने आई हैं, उनके अंदर झिझक थोड़ी कम हुई है, अपना मनचाहा साथी पाकर उनसे शारीरिक सुख का आनंद भी लेती हैं। लेकिन शारीरिक सुख पाने के लिए वे मर्दों को नहीं तलाशतीं, कुछ स्त्रियां ऐसा करती होंगी, लेकिन इसके पीछे भी उनके अपने कई निजी कारण होते होंगे। हमारे समाज में इस विषय को हमेशा अनैतिक रूप से देखा गया है, स्त्रियों के चरित्र से जोड़कर देखा गया है। और पुरुष सत्ता की दुनिया में स्त्रियों द्वारा यह सवाल भी उठा है कि क्या नैतिकता सिर्फ स्त्रियों के लिए है?
सवाल अपनी जगह सही है, लेकिन आखिर कब तक? और क्यों ऐसे सवालों की जरूरत पड़ती है?
जहां दुनिया इतनी आगे बढ़ गई है, इस विषय को लेकर भी लोग खुले तौर पर बात करने लगे हैं, इसके बावजूद आज भी समाज के हजारों-लाखों घरों में आम स्त्रियों की स्थिति यही है कि एक उम्र के बाद पति के साथ सोना, अपनी इच्छाओं की बात करना, उन्हें खुद में शर्मिंदगी के कटघरे में खड़ा करता है। आखिर ऐसी मानसिकता किसने बनाई और क्यों बनाई? समाज क्यों भूल जाता है कि स्त्रियां केवल बच्चे पैदा करने की कोई मशीन नहीं, बिस्तर पर पुरुष की मर्जी अनुसार उन्हें सुख देने का कोई खिलौना नहीं। वे भी जीती-जागती एक इंसान हैं, संपूर्ण इच्छाओं और कामनाओं से भरी हुई।
आज भी देश में हजारों शादियां लंबी उम्र के अंतर में होती हैं। ऐसे में एक उम्र के बाद पुरुष अपनी जवान स्त्रियों के बारे में क्या सोचता है, इस बात से ही पता चलता है कि वह अपनी उम्र के हिसाब से ही अपनी मर्जी, अपनी इच्छाओं के अनुसार स्त्रियों को भी आंकते हैं। वे भूल जाते हैं कि उनकी इच्छाएं खत्म होने से स्त्रियों की इच्छाएं खत्म नहीं हो सकतीं, क्योंकि वे दो अलग-अलग उम्र के इंसान हैं।
अब जबकि हर सोशल साइट पर, हर तरफ लिखा जा रहा है, पढ़ा जा रहा है- लेकिन कितने दिन? फिर कोई नया विषय आ जाएगा और फिर हर तरफ उसका हो-हल्ला होने लगेगा। सबसे पहले तो यही बता दूं कि इसे पढ़ने वाले बहुत से लोग ये भी कहेंगे कि इस पर लिखा ही क्यों, कुछ और नहीं मिला लिखने को। जबकि मजेदार बात ये रहेगी कि इसे सब पढ़ेंगे। बल्कि पढ़ना ही चाहिए और पढ़कर अपनी राय भी रखनी चाहिए। अब जब हर तरह के विषय, विचारों और इच्छाओं पर बातें होने लगी हैं, तो ये भी क्यों नहीं? देखा जाए तो इस विषय को लेकर सबसे बड़ा पाखंड हमारे ही समाज में है और इसके दुष्परिणाम कई रूपों में हमारे समाज, घर, परिवार और रिश्तों पर निरंतर पड़ रहे हैं।
चरम सुख क्या है?
लेकिन उससे पहले कि आखिर चरम सुख की परिभाषा है क्या?
जब कोई चीज अपने चरम पर पहुंच जाती है, तब वहां से वह खत्म हो जाती है। कोई इच्छा, चाह सबसे मुक्त हो जाती है, मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। लेकिन यह चरम सुख हर बार संभोग करते हुए शुरू से शुरू होता है। हर बार संतुष्टि की वही मांग होती है। एक बार मन भरपेट भोजन की तृप्ति या संतुष्टि के बाद भी दोबारा उतनी ही भूख लगती है और जब तक जीवन है, भूख लगती रहेगी- हर बार पूरी होकर भी।
इस आंकड़े को और अधिक रूप में भी देखा जा सकता है कि भारतीय महिलाएं संतुष्ट नहीं हैं। ये अलग बात है कि वे इससे लोकलाज से बचने के लिए इंकार भी करती हों, या तो कुछ समझ ही नहीं पातीं कि वे उस सुख से वंचित हैं, या ये कि यह भी एक सुख की चीज है। ऑर्गेज्म शारीरिक सुख, आनंद और खुशी की उत्तेजना से भरी वह भावना है, जो सेक्स या संभोग करते हुए दोनों पार्टनर को मिलनी चाहिए या मिलती है।
ऑर्गेज्म यौन उत्तेजना का चरम है। अधिकतर पुरुष स्त्री को उस चरम सुख से वंचित रखता है, क्योंकि वह इस सुख को केवल स्वयं के लिए महसूस करता है- जाने या अंजाने ही सही- और स्त्रियां इस बारे में बोलना पाप समझती हैं या जानती ही नहीं। अधिकतर स्त्रियां इसे केवल पति को सुख देने का कर्तव्य मान लेती हैं और अपनी उठती कामनाओं को चुपचाप दबा जाती हैं।
स्त्रियों को कितनी स्वतंत्रता
लेकिन प्रश्न यह है कि आखिर ऐसा है क्यों?
हम जिस सामाजिक संस्था में रहते हैं, यहां हमारी नैतिक जिम्मेदारियां हमारे जीवन के हर एक जगह दखल देती हैं। या यह कह लीजिए कि हमारे जीवन की सामाजिक और मानसिक गतिविधियों पर नैतिकता के नियमों का शासन है। लेकिन इसकी जरूरत से हम इंकार नहीं कर सकते, क्योंकि यही नैतिकता हमें एक परिवार और सुगठित समाज प्रदान करती है। हमारी संस्कृति और सभ्यता को सुचारू रूप से चलाती है।
लेकिन इन सबके बीच स्त्रियों की हर तरह की स्वतंत्रता की डोर पुरुषों ने अपने हाथ में ले रखी है और वे इसका अपने मनमाफिक और सहूलियत से इस्तेमाल करते हैं। स्त्रियों की सभी तरह की स्वतंत्रता के बीच उनके शारीरिक सुख की चाह को सबसे अधिक दबाया गया। यहां तक कि उस बारे में बोलना भी उनके चरित्र से जोड़ दिया गया, जिसका असर आज हम परिवारों में, समाज में एक विकृत रूप की तरह देख रहे हैं। आखिर कितने पुरुष अपने सेक्स पार्टनर के साथ सहवास को एक आनंद के रूप में लेते हुए अपने साथी को अपनी हर इच्छा जाहिर करने की सहजता और स्वतंत्रता देते हैं? कितने पुरुष?
सच यह है कि वे इसे सही मानते ही नहीं। वे स्वयं स्खलित होने तक ही स्त्रियों पर अपना आनंद दिखाते-जताते हैं। अधिकतर स्त्रियां पुरुष की मांग अनुसार सपोर्ट करती हैं, अपनी इच्छा और अधिक सुख पाने की चाह के अनुसार नहीं। और अगर कभी स्त्री ने अपनी इच्छा जाहिर कर भी दी, तो पुरुष उसे संदेह की दृष्टि से देखने लगता है। बहुत जरूरी है इसके मनोवैज्ञानिक पहलुओं को समझना, इसके मन, मस्तिष्क और शरीर पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव को समझना। मानसिक तनाव का भी यह एक बड़ा कारण होता है स्त्रियों के साथ।
इसे संगीत की तरह समझिए, शोर की तरह नहीं।
लेकिन क्यों देखता है पुरुष? क्यों उसे एक सुख की प्राकृतिक प्रकृति पर संदेह होने लगता है?
क्या इच्छाएं स्त्री और पुरुष के लिए अलग-अलग बनी हैं?
क्या स्त्री-पुरुष की जीभ में स्वाद लेने या उसकी चाह अलग-अलग होती है?
क्या स्त्री-पुरुष की ग्रंथियां एक ही चीज के लिए अलग-अलग होती हैं?
नहीं, बिल्कुल भी नहीं।
हां, स्त्रियां ऑर्गेज्म की तलाश नहीं करतीं, लेकिन चाह रखती हैं और उसे दबा जाती हैं। क्योंकि ऐसी स्त्रियों को समाज ने चरित्रहीन माना है, समाज ने अनैतिक माना है। जबकि पुरुष भी इससे बच नहीं पाए। उन्हें भी लंपट और चरित्रहीन माना गया है, लेकिन पुरुष की प्रकृति इस मामले में बेपरवाह है। तभी तो पुरुष एक ही बार में कई औरतों से खुल्लम-खुल्ला संबंध बनाकर भी लज्जित नहीं होता और उसे अपने पौरुष पर गर्व होता है। अक्सर वे इसके चर्चे भी बड़े मजे लेकर करते हैं।
स्त्रियां कहां जाएं, किसके पास जाएं?
सवाल अब भी वहीं है- क्या करें स्त्रियां? कहां जाएं? किसके पास जाएं? और क्या गारंटी है कि कोई दूसरा उसे ऑर्गेज्म दे सकेगा? इस तरह तो एक के बाद एक यही सिलसिला चलता रहेगा और अंत में एक मानसिक रोगी की तरह हो जाएगा। और जाना पड़े ही क्यों?
सांसारिक व्यस्तता, जरूरतों और हर पल भागम-भाग की जिंदगी के बीच में ऑर्गेज्म एक दवा भी है और जहर भी। और यही कारण है लेट नाइट पार्टियों में शराब, शबाब और… छोटी-छोटी बच्चियां भी इसकी गिरफ्त में आती जा रही हैं। लड़कों में शीघ्रपतन जैसी समस्या आम हो चली है। शादी के बाद बच्चे न होने का भी यह एक बड़ा कारण है। शादियां जल्द-जल्द टूटने की कगार पर खड़ी हो जाती हैं।
पार्टनर अपनी असंतुष्टि का समाधान आपस में खोजने की बजाय गलत हाथों में चले जाते हैं, जिसका अधिक नुकसान स्त्रियों को ही उठाना होता है। और बलात्कार जैसे घृणित कर्म भी कहीं हद तक इसी का नतीजा हैं। जहां यह कई तनावों से मुक्त कर मनुष्य को रीफ्रेश करती है, वहीं इसके पूरे न होने पर इसका सीधा नकारात्मक प्रभाव हर काम पर पड़ता है। स्त्रियां जानती हैं कि यह सुख इतना आसान नहीं, इसलिए वे अपना ध्यान दूसरी चीजों में लगाती हैं, जिसमें अध्यात्म सबसे अधिक है।
और कुछ इस सुख को पाने के लिए एक क्षणिक मुलाकात पर भी आसानी से सहवास कर लेती हैं, लेकिन यह सुख नहीं, क्षणिक आनंद होता है- कुछ समय का रिलैक्सेशन। फिर दोबारा इसकी प्यास और चाह अधिक तीव्रता के साथ उठती है। और यही कारण है कि स्त्रियां किसी के भी संपर्क में थोड़ा प्यार और अपनापन पाकर आसानी से सबकुछ सौंप देती हैं, जिसका परिणाम अक्सर उन स्त्रियों को ‘चरित्रहीन’ के नाम के साथ मिलता है। ये एक ऐसा ड्रग है, जो इस खोज में एक बार निकल गया, वो वापसी नहीं कर पाता और समाज उसे हमेशा गलत नजरों से ही देखता है।
जरूरी क्या है?
सबसे जरूरी है कि पुरुष साथी इस बात को समझे और अपनी पार्टनर को वह सहजता प्रदान करे, जिससे वे खुल सकें।
एक बूढ़ी महिला से पूछने पर, जिसके दस बच्चे हैं, उन्होंने बताया :
“हमें तो कभी समझ भी नहीं आया कई बार कि कब हुआ। हम आधी नींद में होते थे और हमारा आदमी आता, करता और चला जाता। ऐसे ही बच्चे कब पेट में आ जाते, पता ही नहीं चलता। कभी होश में भी रहते तो घूंघट रहता चेहरे पर।” क्या बोलें? ऐसी ही कितनी महिलाएं ढेर बच्चे पैदा करके भी इस सुख का आनंद तक नहीं ले सकीं। तो इसका जिम्मेदार कौन है?
स्त्री केवल पुरुष को स्खलित करने का एक टूल या पात्र नहीं है। वे जीती-जागती आपकी तरह ही एक इंसान हैं। उसकी भी कामनाएं आपकी कामनाओं की तरह तृप्त होने के लिए तीव्र होती हैं। उन्हें समझिए और उन्हें उस सुख की अनुभूति लेने के लिए उन्मुक्त कीजिए। यही वो चरम सुख बन जाएगा, जिसके लिए कभी शरीर भटकता है, कभी मन भटकता है भीतर ही भीतर। और इस तरह प्रेम और भी मजबूत होगा।
हां, सब सुख का अपना अलग-अलग आनंद होता है। रोटी की भूख जैसे शरीर नहीं मिटा सकता, वैसे ही शरीर की भूख रोटी नहीं मिटा सकती। ऐसे उदाहरण एकदम बकवास हैं कि भूखे पेट कुछ नहीं सूझता। रोजमर्रा की सारी परिस्थितियां अलग-अलग होती हैं। वरना कोई गरीब दिनभर कड़ी मेहनत कर थका-मांदा कभी इस तरफ सोचता ही नहीं, लेकिन वो इसे अपनी थकान मिटाने का सबसे अच्छा विकल्प भी मानता है- केवल सुख और आनंद ही नहीं।
क्योंकि गरीब से गरीब, रोटी के लिए कड़कती धूप, बारिश और ठंड में कांपने वाले लोग भी सहवास के आनंद की सुखद अनुभूति का अनुभव करते हैं। इसलिए चाहे स्त्री हो या पुरुष, दोनों के लिए इधर-उधर भटकने से अच्छा है कि वे एक-दूसरे की कामनाओं और जरूरतों को समझें। और कोई समस्या है तो काउंसलर से मिलें या अपने किसी ऐसे मित्र से, जो इसके बारे में सही सलाह दे सके।
शारीरिक सुख पाप नहीं प्रकृति है
ऑर्गेज्म एक तलाश को एक सुख में तब्दील कीजिए।
स्त्रियों को चरित्रहीन कहने से पहले अपनी पौरुषहीनता पर गौर कीजिए।
मालिक नहीं, मनचाहा साथी बनिए।
आनंद लेना नहीं, देना भी सीखिए।
ध्यान रहे, स्त्री की योनि में आप पेशाब करने नहीं गए हैं, अपनी कामनाओं को स्रावित करने गए हैं। इसलिए स्त्रियों को भी स्त्रावित होने तक का सब्र रखिए। उन्हें स्पर्श प्रेम से करें, मन से करें, वासना से नहीं। शारीरिक सुख कोई पाप नहीं, यह प्रकृति है। अन्य इच्छाओं की तरह यह भी एक प्राकृतिक इच्छा ही होती है।
कल्पना कीजिए, अगर यह प्राकृतिक इच्छा इंसान के भीतर से मर जाए, तो यह दुनिया कैसी रहेगी? हमारी सारी अनुभूतियां एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। एक अनुभूति के समाप्त होते ही दूसरी अनुभूतियां भी धीरे-धीरे समाप्त होने लगती हैं और हम केवल एक हाड़-मांस के पुतले बनकर रह जाएंगे।
इसीलिए इन इच्छाओं पर रोक लगाना या इसके लिए नकारात्मक विचार करना, इसे पाप कहना- सबसे पहले छोड़ना पड़ेगा।
हर पुरुष अपने लिए एक सुख देने वाली, कामुकता से भरी हुई पत्नी और प्रेमिका चाहता है, तो उसे यह भी सोचने की जरूरत है कि स्त्रियों की भी यही चाह रहती होगी। सुख और आनंद की अनुभूति से संतुष्ट होना इस दुनिया में कौन नहीं चाहता? पुरुष अपनी यौन इच्छाओं और कामुकता की चाहत के लिए कई बार स्त्रियों को कुंठा की भावना से भर देते हैं। जब भी पुरुष अपनी स्त्री या प्रेमिका को छोड़ अन्य किसी स्त्री के पास जाता है, तो स्त्रियों के मन में एक हीन भावना घर करती है कि शायद उनमें कहीं कोई कमी है।
जबकि इस स्त्री को कोई अन्य पुरुष और भी अधिक रूप से अपने आनंद में शामिल करता है। और प्रश्न यही है कि पुरुष अपने सुख में स्त्री को शामिल तो करता है, लेकिन उसके सुख में स्वयं शामिल नहीं होता। पुरुष को परस्पर सुख देने और लेने की परिभाषा ठीक से समझ नहीं आती। इसके आगे भी जीवन में सुख है। यही सुख सब सुख का अंत नहीं। अपनी अतिरिक्त कामनाओं को संयमित करना भी सीखिए। क्योंकि भूख चाहे कितनी भी हो, इंसान का मांस तो नहीं खाना चाहिए न।
जीवन, मन और शारीरिक सुख की चाह से जुड़ी हर इच्छा, हर कामना को पूरा करने का स्त्रियों का भी उतना ही अधिकार है जितना पुरुष का। भले ही स्त्रियां जानती हैं हर चाह को बांधना, परन्तु पुरुष भी समझे उनकी चाहना।
नोट : इस बारे में मेरी हर उम्र और कई तरह के अलग-अलग तबकों की महिलाओं से भी बात हुई है। उनके विचार सुने हैं, उनकी समस्याएं और उनके दुख भी सुने। बहुत ही भयावह और दुखद स्थितियां हैं हमारे समाज में इस विषय पर।
अनामिका चक्रवर्ती अनु का जन्म 11 फरवरी को मध्य प्रदेश में हुआ। वर्तमान में वे छत्तीसगढ़ के मनेंद्रगढ़ शहर में निवासरत हैं। वे स्वतंत्र लेखन से जुड़ी हुई हैं और देश की विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताएं, कहानियां और लेख प्रकाशित होते रहे हैं। साहित्य और संवेदनशील सामाजिक विषयों पर उनकी विशेष पकड़ मानी जाती है। उनके रचनात्मक कार्यों में गीतों का एल्बम 'प्रतिति', हिंदी फिल्म के लिए एक गीत, कई साझा संग्रह, आत्मकथ्य संस्मरण संग्रह तथा भावना प्रकाशन से प्रकाशित काव्य संग्रह 'एक अरसे बाद' प्रमुख हैं। उनकी कविताएं वेब पत्रिकाओं में भी निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। दूरदर्शन और आकाशवाणी से उनकी कविताओं का प्रसारण हो चुका है। उनकी रचनाओं का अंग्रेजी, उर्दू, मराठी, बंगाली और गुजराती भाषाओं में अनुवाद भी किया गया है। विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक मंचों से वे काव्य पाठ कर चुकी हैं तथा साहित्यिक क्षेत्र में अनेक महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल कर चुकी हैं।
