साहित्य

कुछ पेड़ मेरे भीतर भी हैं

सुमन पाण्डेय

चित्रकला और डिज़ाइन की दुनिया से आने वाली सुमन अपने अनुभवों को केवल देखती नहीं, उन्हें भीतर तक महसूस करती हैं। मूलतः वाराणसी (उत्तर प्रदेश) की निवासी सुमन पांडेय ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से पेंटिंग ऑनर्स में स्नातक तथा बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झाँसी से पेंटिंग में परास्नातक की शिक्षा प्राप्त की है। उन्होंने टेक्सटाइल डिज़ाइन में डिप्लोमा और वनस्थली विद्यापीठ से पारंपरिक वस्त्राकल्प विषय में पीएच.डी. की उपाधि अर्जित की है। वर्तमान में वे कला और डिज़ाइन शिक्षा से जुड़ी हैं।

प्रस्तुत लेख में वे लेखन को सीखने की एक सतत प्रक्रिया के रूप में देखती हैं और वृक्षों के रूपक के माध्यम से धैर्य, निरंतरता, संवेदना तथा पर्यावरण के प्रति हमारी जिम्मेदारियों पर विचार करती हैं। यह रचना केवल वृक्षों की नहीं, बल्कि उन मानवीय मूल्यों की भी बात करती है जिनके बिना न प्रकृति बच सकती है और न ही जीवन की ऋतुएँ।


कोई पूछे कि मैं लिखती क्यों हूँ? क्या मुझे लिखना बहुत पसंद है? तो शायद मेरा उत्तर होगा : केवल पसंद होना किसी कार्य को जीवन भर करते रहने के लिए पर्याप्त नहीं होता। क्योंकि बहुत प्रिय चीज़ भी यदि निरंतर करनी पड़े, तो कभी-कभी वही बोझ और ऊब में बदल जाती है।

एक ड्रॉइंग अध्यापिका होने के नाते मैंने यह बात अपने विद्यार्थियों से सीखी है। डिज़ाइन शिक्षा में लगभग हर छात्र ड्रॉइंग और स्केचिंग के सहारे प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण करता है। वही ड्रॉइंग, जो कभी उसका सपना होती है, प्रवेश के बाद धीरे-धीरे सबसे कठिन और अप्रिय कार्य लगने लगती है। और यदि शिक्षक ने “Re-do” कह दिया, तो जैसे प्रिय कला अचानक दंड में बदल जाती है। आज की पीढ़ी में तो कई विद्यार्थी इस पर नाराज़ भी हो जाते हैं।

इन नाराज़ विद्यार्थियों ने मुझे एक गहरी बात सिखाई, सीखना केवल पाठ्यक्रम या संस्थागत प्रक्रिया नहीं है। सीखना स्वेच्छा, निरंतरता और समर्पण की साधना है। मेरा लिखना भी दरअसल मेरा सीखना है। मैं हर दिन इसलिए लिख रही हूँ क्योंकि मैं अभी भी लिखना सीख रही हूँ। जैसे एक बीज सीखता है मिट्टी में सोना। फिर वह अपने स्वप्न को छोड़, दोनों बाँहें फैलाकर मिट्टी के भीतर से उठना सीखता है।

फिर पत्तियों के रूप में अपना पहला परिचय बनाता है।

धीरे-धीरे पौधा बनता है। पर पौधा जितना ऊपर बढ़ता है, उससे कहीं अधिक श्रम उसकी जड़ें करती हैं, गहराइयों से जुड़े रहने के लिए। एक निश्चित ऊँचाई के बाद तना और शाखाएँ घनी होती हैं। और फिर वही वृक्ष किसी पथिक को छाया देता है, किसी नभचर को आश्रय, किसी भूखे को फल, किसी रोगी को औषधि, और किसी ठिठुरती रात को ईंधन।

भारतीय सिनेमा और लोक स्मृतियों में भी वृक्ष केवल प्रकृति नहीं, भावनाओं के साक्षी रहे हैं। “नदिया के किनारे, आज उसी अमवा के तले…” जैसे गीतों को सुनते हुए अक्सर लगता है कि प्रेम केवल दो लोगों के बीच नहीं था, उसके मौन साक्षी वे आम के वृक्ष भी रहे होंगे, जिनकी छाँव में किसी ने पहली बार प्रतीक्षा सीखी होगी। कितना सुखद और निश्छल प्रेम रहा होगा उन लोगों का, जिनके साथ कोई वृक्ष उम्र भर खड़ा रहा।

और जीवन केवल मधुरता ही नहीं देता। कभी-कभी वह नीम-सा कड़वा भी होता है।

तभी शायद किसी ने गाया होगा “मुख की बात सुने हर कोई, दिल के दर्द को जाने कौन…” यह पंक्ति केवल एक गीत नहीं, मनुष्य के भीतर की उस चुप पीड़ा का स्वर है जिसे दुनिया सुनती कम, सहने की सलाह अधिक देती है। शायद इसी कारण कला, गीत, लेखन और वृक्ष सब हमें एक जैसी सीख देते हैं, कि बने रहना, भीतर से जीवित बने रहना, सबसे कठिन साधना है। और शायद इसी कारण मैं अब यह समझ पाई हूँ कि रुचि केवल आरम्भ कराती है, पर किसी कार्य में बने रहने की शक्ति अभ्यास, धैर्य और समर्पण देते हैं। मेरा लिखना ही मुझे लिखना सिखा रहा है जैसे वृक्ष हर ऋतु में खड़े रहकर, चुपचाप वृक्ष होना सीखता है।

तभी मन में एक बात आई कि यदि वृक्ष न हों, तो ऋतुएँ भी कहाँ ऋतुएँ रह पाएँगी। बिन पेड़ों के न पतझड़ संभव है, न बसंत।

वृक्षों ने मुझे केवल बने रहना नहीं सिखाया, उन्होंने यह भी सिखाया कि सूचना के साथ संवेदना का होना कितना आवश्यक है। एक दिन मैं अपनी नन्हीं मित्र रूवी के साथ एक बेल का पौधा लगा रही थी। हम दोनों उसे देखने नियमित जाते थे, ताकि देखभाल की आदत बनी रहे। उस छोटे-से पौधे के साथ हमारा एक अपनापन जुड़ गया था। पर एक दिन जाकर देखा पौधा गायब था। पता करने पर मालूम हुआ कि कुछ छोटे बच्चे उसे उखाड़कर ले गए, क्योंकि उनके स्कूल में अगले दिन Plantation Day था और सबको एक पौधा लेकर आना था। उस क्षण पहली बार लगा कि हम बच्चों को वृक्ष लगाने का महत्व तो सिखा रहे हैं, पर शायद यह बताना भूल रहे हैं कि पौधे मिलते कहाँ हैं। पौधे किसी और के लगाए हुए सपनों को उखाड़कर नहीं लाए जाते, वे नर्सरी से खरीदे जाते हैं, प्रेम और जिम्मेदारी से लगाए जाते हैं।

उस दिन हम दोनों बहुत आहत हुए। फिर कुछ दिनों बाद हमने कई और पौधे लगाए और उनके चारों ओर गार्ड भी लगाए। यह लिखते हुए मुझे Chandan Pandey चंदन पांडेय जी की कहानी संग्रह मुहर की कहानी “नीम का पौधा” याद आती है। कहानी में रोली अपने हिस्से की संवेदना से एक नीम का पौधा बचाना चाहती है, पर लाख प्रयासों के बाद भी वह पौधा लोगों के पैरों तले कुचलकर मिट्टी में मिल जाता है। उसे धरती पर बसने की जगह नहीं मिलती।

ठीक वैसे ही जैसे “मुरब्बा” फिल्म में मर्तबान से गिरा हुआ मुरब्बा जिसे रौंद दिया जाता है।वह केवल एक मुरब्बा नहीं, स्मृति, श्रम और अपनत्व के कुचले जाने का दृश्य बन जाता है।शायद यही हमारे समय की सबसे बड़ी विडंबना है। हम वृक्षारोपण के उत्सव तो बना रहे हैं, पर वृक्षों के लिए जगह कम करते जा रहे हैं। हम पौधे बाँट रहे हैं, पर उनके लिए ज़मीन, सुरक्षा और धैर्य नहीं। यह लेख दरअसल पेड़ लगाने से अधिक, पेड़ों को बचाए रखने की एक छोटी-सी याद है। एक विनम्र स्मरण कि वृक्ष केवल पर्यावरण का विषय नहीं, संवेदना का विषय भी हैं।

क्योंकि एक वृक्ष केवल वृक्ष नहीं बनना चाहता वह उन ऋतुओं को बचाए रखना चाहता है जिन्हें हम उसके सहारे जीते हैं।

How did this make you feel?
🌸
Stay in the loop

Get the latest stories on women's rights in India — straight to your inbox.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Share via
Copy link