मैं वापस आऊँगा : जब मोहब्बत और बिछड़ना साथ चलते हैं
चंचल सिंह साक्षी
चंचल सिंह साक्षी हिंदी की संवेदनशील युवा रचनाकार हैं। उनकी रचनाएँ हिन्दवी, कथाक्रम, ककसाड़, अमर उजाला और प्रभात ख़बर जैसी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। साझा कहानी-संग्रह ‘मत तोड़ो चटकाय’ की सह-लेखिका और साहित्यिक मंच ‘द रचयिता’ की संस्थापक रहीं चंचल की लेखनी प्रेम, प्रकृति और सामाजिक सरोकारों की संवेदनशील अभिव्यक्ति है। वे पेशे से ग्राफ़िक डिज़ाइनर हैं। सुभारती यूनिवर्सिटी, मेरठ से मास्टर्स के बाद वर्तमान में वे आईआईटी पटना से एमबीए कर रही हैं।
प्रस्तुत आलेख में उन्होंने इम्तियाज़ अली की फिल्म ‘मैं वापस आऊँगा’ को प्रेम और विभाजन की कहानी से आगे बढ़कर स्मृतियों, विस्थापन और अपनी मिट्टी से जुड़े गहरे भावों की यात्रा के रूप में देखा है। फिल्म के दृश्य, संगीत और पात्रों के माध्यम से यह लेख सिनेमा के बहाने मनुष्य के भीतर की उन अधूरी तलाशों और भावनाओं को टटोलता है, जो समय के साथ भी समाप्त नहीं होतीं।
असल जीवन में जिया का सामना बहुत कम किया होगा आपने। एक ऐसी बेपरवाह लड़की, जो बहाने बनाती है ताकि वह अपने प्रिय को मिलने का मौका दे सके।
यह फिल्म पार्टीशन (विभाजन) के ऊपर बनाया जरूर गया है, लेकिन उसकी जड़ें आज तक फैली हुई हैं। आज़ादी और बटवारा से लेकर आज तक, जब खुद दिलजीत दोसांझ और विराट कोहली जैसे चेहरे देश की बिगड़ी हालत को तौबा कर विदेश में घोंसले बना रहे—को बाकायदा प्रदर्शित करती है।
रिफ्यूजी के दर्द के साथ-साथ आज के हम जैसे तमाम लोगों के जीवन में चल रहे उस सवाल पर फोकस करती है कि हम यहां क्यों हैं? तमाम गाड़ी-बंगला, सुख-सुविधाओं के बीच भी मन क्यों उदास रहता है? हमें किसकी तलाश है?
इम्तियाज़ अपनी फिल्मों के जरिए हमें बखूबी अपने आप से ही थोड़ा और करीब से मिलवाने में सफल रहे हैं। उनकी लिखी एक फिल्म ने जो रूहानी एहसास करवाया, उसके लिए शब्द कम पड़ जाते हैं, नाम था लैला मजनू। मोहित चौहान की आवाज़ में वो गीत “लैला, लैला” ऐसी गूंजती है, जैसे चंबा की वादियों में स्वयं मोहित वो गा रहे हैं और लैला ना जाने किस धुंध में खो गई है।
इम्तियाज़ की फिल्मों में संगीत की बहुत सुंदर जगह होती है। ‘मैं वापस आऊँगा’ में बहुत आउट ऑफ द बॉक्स नहीं, लेकिन मधुर संगीत और कहानी के हिसाब से गीत है। जैसे “तुम हो पास मेरे”, “तेरे पास मै”, “कहाँ से हो लायी ऐसी शोख अदाएं”—इन गीत को बार-बार सुना जा सकता है।
इस फिल्म में एक जगह है—टूटी हुई किसी महल या घर में जाती हुए सीढ़ियां, कच्ची मिट्टी की सीढ़ियाँ। जिसके साथ में लगके वो पहाड़ी फूलों का पेड़ ऐसे खड़ा है, जैसे अपने महबूब को एकटक देखे जा रहा हो और वो उसके सामने खिलखिला के हंस रही है। ये वही जगह है, जहां पर जिया और किनू के मासूम एहसास मोहब्बत की अंगड़ाई भरता है।
इसी जगह पर बाद में एक हमला के बाद किनु आकर सो जाता है। उसी खूबसूरत अहसास को गले लगाए, जब जिया उसके साथ होती थी। जीवन भी तो ऐसा ही है ना, नहीं? तमाम हमलों और दुश्वारियों को भुलाने के लिए आप भी कीनू की तरह दो पल आंख बंद कीजिए और अपनी जिया को याद करके उस पल में खो जाइये, क्योंकि जीवन की मुश्किलात तो एक के बाद एक आते रहेंगे।
फिल्म का यूं तो हर दृश्य में बहुत कुछ है, जो प्रभावित करती है, लेकिन मुझे एक दृश्य की विशेष ध्यान है। खेतों में साइकिल पर कीनू चल रहा होता है। जिया को उसके साथ नहीं बैठना, वो अकेले साइकिल लेके भाग जाती है। पीछे-पीछे कीनू दौड़ता है।
थोड़ी देर बाद जिया लौटती है, साइकिल फेंकते हुए सीधे कीनू के कूद जाती है। दरअसल, हमलावर उधर से आ रहे होते हैं और उसे बचाने के लिए वो ऐसा करती है। लेकिन थोड़ी देर में खुद को संभालते हुए वो पूछती है—
“मैंने सोचा था एक-दो साल लगाऊंगी आपको हाँ बोलने में, लेकिन हालात को देखते हुए मैंने फैसला बदल दिया है। अब मै आपको आसानी से मिल रही हूं, तो कहीं आप मुझे कम कीमती तो नहीं समझेंगे?”
ये सवाल दरअसल प्रेम संबंधों में पड़े सभी के साइकोलॉजी पर एक दस्तक है कि प्रेमिकाएं प्रेम में वशीभूत होकर खुद को आपके हवाले कर देती है, किसी भी सूरत में उतनी ही स्नेह और आदर की हकदार होनी चाहिए, जितनी की आप उसके लिए सात समुद्र और हिमालय की ऊंचाई लांघे।
इस कहानी में दिलजीत का होना लगता नहीं कि वो फिल्म में किसी और किरदार को निभा रहा, बल्कि खुद दिलजीत ही है। वो असल में भी अब भारत की नागरिकता छोड़ दिया है और इसमें भी एक ऐसा ही किरदार निभा रहा, निर्वैर का। वापस भारत आकर उसे बहुत कुछ नए सिरे से देखने का मौका मिलता है और उसका नजरिया कैसे बदलता है, ये सब दिलचस्प है।
नसीरुद्दीन शाह हमेशा से अपनी कमाल एक्टिंग के लिए जाने जाते है। इसमें वे और गहरे उतर गए है। एक रिफ्यूजी के दर्द को अपने भीतर संभाले उन्होंने पूरी उम्र गुजारनी पड़ी, पर अंत जब करीब है, तो उन्हें कुछ बातें, कुछ यादें ऐसे खींचती है कि वे तड़प उठते हैं।
उनकी यादों में क्या खलिश है, उसी को जानने और तलाशने में ये फिल्म कल-आज को बहुत बेहतरीन तरीके से बुनता है। फिल्म के अंतिम दृश्य आते-आते आंखें छलक जाती है और हम थोड़ी देर बैठे रह जाते हैं।
लेकिन इस फिल्म में सिर्फ बंटवारे का दर्द नहीं है, वर्तमान की कहानी और एक नई मोहब्बत की दास्तां भी है। वो दर्द भी है, जब अपने बेहतरी की खातिर लोग घर छोड़कर दूसरे देश में चले तो जाते हैं, फिर कैसी बेचैनी का सामना करना पड़ता है।
वो हिचकी भी है, जब हमारी असल जमीन याद करती है तो हमें भरपूर आती है। फिल्म की कहानी 1947 और 2026 के दोहरी पटरी पर समतल चलती है और ट्रांजीशन बहुत बढ़िया होता है, जिसका आधार है सीनियर गेरीवाल यानी नसीरुद्दीन शाह।
लेकिन इम्तियाज़ की अन्य फिल्मों की बात करे तो जब वी मेट, रॉकस्टार या लैला मजनू (लेखक के तौर पर) बेहद कमाल फिल्में रही है। इस फिल्म की संगीत पक्ष और ओवरऑल एग्जीक्यूशन एकदम वैसा तो नहीं है। तब भी आज-कल की फिल्मों से तुलना करें तो बेहद उम्दा है।
कोरियन ड्रामा में सिंगर ही एक्टर और एक्टर ही सिंगर होता है, इस फिल्म में भी दिलजीत और वेदांग की आवाज़ में गाने है, जो इस फिल्म के मुख्य किरदार हैं।
फिल्म में पार्टीशन के वक्त का कुछ ऐसे दृश्य भी है, जो हमने केवल सुना था। एक जगह प्रेग्नेंट स्त्री के पेट चाकू से घोंप देने का दृश्य है, जिसे देखने की मेरी हिम्मत नहीं हुई। लड़कियों का गला एक-एक करके काट दिया जाता है, ताकि दरिंदों के हवाले होने से पहले वे मर जाये।
जब भारत से वापस गई ट्रेन को डेड बॉडी से अटा पड़ा दिखाया जाता है, वहां एक सवाल उठा मन में कि बटवारा के समय क्या सभी लोग (हिन्दू, मुसलमान, सिख) इतने ही खूंखार हो गए थे, या इम्तियाज ने अपने कला को विवादों से बचाने के लिए उस तरफ वालों के कहर और दरिंदगी पर बराबर का तड़का लगाया है?
दिलजीत के जरिए बटवारे में हुई हड़बड़ी और गड़बड़ी को स्टैंड-अप के जरिये बहुत सुंदरता से प्रस्तुत किया गया है। ए. आर. रहमान की संगीत में जादू तो है ही और इसे हमें छू लेने जैसे अनुभव कराने के लिए वेदांग रैना की वो आवाज़—“कहाँ से हो लायी ऐसी शोख अदाएं”—उफ़, क्या ही सुंदर है।
बाकी मोहित मेरे प्रिय सिंगर है और एक गीत के बाद फहीम भी अच्छे लगने लगे हैं। दिलजीत के गाने भी बहुत सुंदर है।
इस फिल्म में काम करने वाले—वेदांग रैना, शरवरी, दिलजीत दोसांझ, रजत कपूर, नसीरुद्दीन शाह एवं तमाम कलाकारों सहित इम्तियाज़ अली को बहुत बधाई।
अंत में बस इतना ही कहना है—एक सिनेमा प्रेमी होने के नाते इम्तियाज़ अली से और भी उम्मीदें हैं कि वे ऐसी ही संवेदनशील और दिल को छूने वाली फिल्में बनाते रहें, ताकि नफरत के बीच भी प्रेम की कहानियाँ जिंदा रहें।
