Accused Review : एक फिल्म, तीन नज़रिए
Accused एक मेडिकल ड्रामा है, जिसकी कहानी लंदन के एक अस्पताल में काम करने वाली एक बेहद काबिल भारतीय महिला सर्जन के इर्द-गिर्द घूमती है। वह अपने काम में सख्त और परफेक्शनिस्ट है, इसलिए जूनियर डॉक्टरों में उससे एक दूरी और हल्की नाराज़गी भी रहती है। उसकी निजी जिंदगी में वह अपनी जूनियर महिला साथी के साथ रिश्ते में है, जबकि उसका अतीत भी कुछ पुराने रिश्तों से जुड़ा हुआ है।
कहानी तब मोड़ लेती है जब उस पर एक गुमनाम यौन उत्पीड़न का आरोप लगता है। अस्पताल का एचआर विभाग मामले की जांच शुरू करता है, जिसमें उसके सहयोगियों, पुराने रिश्तों और पेशेवर व्यवहार सभी को खंगाला जाता है। इस बीच उसके निजी रिश्तों में भी तनाव आ जाता है और संदेह की स्थिति बनती है।
जांच आगे बढ़ने पर धीरे-धीरे यह सामने आता है कि आरोप के पीछे अस्पताल की अंदरूनी राजनीति और प्रतिस्पर्धा का हाथ है। अंत में सच्चाई सामने आती है। फिल्म इसी प्रक्रिया के जरिए कार्यस्थल की राजनीति, रिश्तों और आरोपों के असर को दिखाती है।
सोशल मीडिया से इस फ़िल्म पर की गई तीन अलग-अलग टिप्पणियां।
महत्वाकांक्षा बनाम प्रेम
तिथि दानी की टिप्पणी
एक घंटे 47 मिनट की यह फिल्म है। इसमें समानांतर दो मुद्दे हैं, एक तो महत्वाकांक्षा और स्वार्थ का, दूसरा प्रेम के चुनाव के लिए होने वाले आंतरिक संघर्ष का। इसकी कहानी समलैंगिक जोड़े के साथ के अलावा अस्पताल की पृष्ठभूमि में है। हालांकि विषय नया नहीं है, वहां सब इसे आसानी से स्वीकार किए हुए हैं। मैंने अब तक कोई हिंदी फिल्म या कोई वेब सीरीज जो बिना लाउड हुए बहुत कोमलता से निजी महत्वाकांक्षा और प्रेम के बीच चुनाव के द्वंद्व जैसे एक महत्वपूर्ण मुद्दे को उठाती हो, नहीं देखी। यह एक भिन्न किस्म का ट्रीटमेंट है।
कोंकणा सेन शर्मा और प्रतिभा राँटा (लापता लेडीज़ की कलाकार) मुख्य भूमिका में है। कोंकणा सेन तो पहले से सहज अभिनय के लिए प्रसिद्ध अभिनेत्री हैं, लेकिन प्रतिभा यहां अपने सशक्त अभिनय से एक बार फिर चौंकाती हैं क्योंकि वे यहां एक आधुनिक लड़की का किरदार हैं, जो पढ़ी लिखी है डॉक्टर है, अपने अधिकार जानती हैं लेकिन प्रेम में है। उनकी अभिव्यक्ति में जो आत्मविश्वास झलकता है उसे देखकर लगता ही नहीं कि वह फिल्म इंडस्ट्री में नई हैं।
फिल्म में अनोखी बात यह है कि यहां एक दूसरे को पाने के लिए कोई संघर्ष नहीं है ना एक दूसरे से ना ही समाज से और परिवार से। फिल्म के एक दृश्य में कोंकणा कहती हैं- “मुझे यह पोजीशन नहीं चाहिए, ये पावर जो हाथ से फिसल कर सर पर चढ़ जाए। मेरे डीन बनने के रीजन सब गलत थे मुझे नहीं लगता है मैं अब भी रेडी हूं for this position, I have a lot of work to do.”
दरअसल यहां पर वह एक समस्या से सफलतापूर्वक जूझने के बाद अस्पताल प्रबंधन की प्रमुख से यह बात कहती हैं । यहां आत्म-अवलोकन भी है और गहन अनुभूति भी। वे यह संदेश देती हैं कि सफलता के चरम पर पहुंचकर अक्सर स्वार्थ और लालच इंसान पर हावी हो जाता है लेकिन इनके चंगुल से बाहर आना संभव है जब आप इनके मायाजाल को समझ कर खुद को इससे बाहर निकाल सकें।
फिल्म जब अंत तक पहुंचती है तब एक बार फिर कोंकणा का एक ख़ूबसूरत डायलॉग है- “मैंने ना हमेशा खुद को सबसे ऊपर रखा है, मेरे सारे डिसीजंस में सिर्फ़ मैं है, I mean मुझे डीन बनना था मुझे रीलोकेट करना था and I realised तुम्हारे decision में हमेशा ‘हम’ होता है”।
रिश्तों की लंबी उम्र तय करने के लिए यह रिलाइजेशन अति आवश्यक है जो इस दौर में कम होता जा रहा है। यह फिल्म दर्शकों में इस भावना के रोपण में सक्षम हुई है।अनुभूति कश्यप का निर्देशन है। सीमा अग्रवाल और यश केसवानी की पटकथा है। यह फिल्म हर तरह से देखे जाने लायक है और नेटफ्लिक्स पर उपलब्ध है।
एक आरोप… और कई सच
रंजू भाटिया की टिप्पणी
नेटफ्लिक्स पर अभी आई “Accused” दो वजहों से देखी। पहली वजह- कोंकणा सेनशर्मा। उनका अभिनय मुझे हमेशा खींच लेता है। इस फिल्म में भी उन्होंने अपने किरदार की मजबूती, अहंकार, घबराहट और अपने अभिनय को बहुत बारीकी से जिया है। स्क्रीन पर उनकी मौजूदगी ही फिल्म को संभाले रहती है। उन्होंने डॉ. गीतिका के अहंकार, दबंग व्यक्तित्व और बढ़ती घबराहट को अपनी आंखों और बॉडी लैंग्वेज से जीवंत कर दिया है।
मेरठ से लंदन पहुँची एक शांत और सौम्य पत्नी के रूप में प्रतिभा ने टूटे हुए भरोसे के दर्द को बेहतरीन ढंग से निभाया है। अनुभूति कश्यप के निर्देशन में बनी यह फिल्म #MeToo आंदोलन के बाद के हालात को एक नए नजरिए से बताती है। सोशल मीडिया किस तरह से हमारी जिंदगी पर असर डाल रहा है यह इस फिल्म में साफ दिखता है। आजकल का दौर अजीब है…एक आरोप, एक पोस्ट, एक हैशटैग… और किसी की पूरी ज़िंदगी कटघरे में खड़ी हो जाती है।
लेकिन अगर पूरी ईमानदारी से बात करूँ… तो कहानी उतनी बांधने वाली नहीं लगी। विषय गंभीर था, पर उसकी पकड़ थोड़ी ढीली महसूस हुई। क्लाइमेक्स भी जैसे जल्दी में समेट दिया गया। जहाँ तक समलैंगिक रिश्ते को दिखाने की बात है- यह मेरा निजी विचार है कि कहानी को बिना इस एंगल के भी मजबूती से कहा जा सकता था। हर दर्शक का अपना नजरिया होता है, और मेरा मानना है कि कई बार मुद्दा इतना मजबूत होता है कि उसे इस तरह की अलग कहानी या इस तरह के चरित्रों की ज़रूरत नहीं होती।
दूसरी और बेहद खास वजह — मेरी भांजी Himani Bhatia
इस फिल्म की कॉस्ट्यूम डिजाइनर वही है… और सच मानिए, किरदारों का व्यक्तित्व उनके कपड़ों में साफ झलकता है। पावरफुल पैंटसूट… सादगी भरा लुक… हर फ्रेम में एक सोच दिखाई देती है। हिमानी ने पात्रों के स्वभाव के अनुसार उनके पहनावे को जो रूप दिया है, वह काबिले-तारीफ है। चाहे वह कोंकणा का पावरफुल ‘पैंटसूट’ लुक हो जो उनकी महत्वाकांक्षा दिखाता है, या मीरा की सादगी हिमानी के डिजाइन फिल्म के तनाव और माहौल को और भी सजीव बनाते हैं। पर्दे पर उसकी यह रचनात्मकता देख कर बहुत खुशी होती है।
फिल्म मेरे लिए अभिनय और अपनापन की वजह से देखी गई। कहानी ने बहुत देर तक नहीं पकड़ा…पर कुछ चेहरे और कुछ फ्रेम याद रह जाते हैं। बाकी…सच क्या है, यह हर दर्शक अपनी नजर से तय करता है।कुल मिलाकर, फिल्म बुरी नहीं है… पर बहुत ज़्यादा प्रभाव छोड़ जाए, ऐसा भी नहीं लगा। हाँ, अभिनय और कॉस्ट्यूम ज़रूर याद रह जाते हैं। कभी-कभी हम फिल्म कहानी के लिए नहीं, किसी कलाकार के लिए देखते हैं… और कभी-कभी अपने किसी अपने के होने की वजह से भी…
फिल्म कम, दिलचस्प ‘इंडियन टेकओवर’ ज्यादा
संजय कबीर की टिप्पणी
पिक्चर लंदन में सिचुएट कर रही है। एक अस्पताल है। एक भारतीय महिला यहां की बहुत ही काबिल डाक्टर है। सर्जन है। काबिल है लेकिन काम में सख्त है। जब कोई भी केस बिगड़ जाता है तो उसे बुलाया जाता है। गलती करने वालों को डांट भी देती है। जूनियर अंग्रेज डाक्टर चिढ़ते हैं।
काबिल महिला डाक्टर लेस्बियन हैं। उनकी पार्टनर भी एक भारतीय महिला है जो कि जूनियर डाक्टर हैं। इस महिला डाक्टर से अपने प्रेम प्रस्ताव को लगातार प्रस्तुत करने वाले दोस्त एक जूनियर डाक्टर हैं। और ये भी भारतीय हैं। काबिल महिला डाक्टर की पूर्व प्रेमिका भले एक गोरी औरत है। लेकिन, वो भारतीयता से ओतप्रोत होकर भारतीयों को भाने वाला रेस्तरां चलाती है। हमारी सबसे काबिल वाली महिला डाक्टर पर एक गुमनाम संदेश से सेक्सुअल हैरेसमेंट की शिकायत होती है। अब एचआर उसे बुलाती है। ये एचआर भी एक भारतीय महिला है। फिर पूरे मामले की जांच होती है। जांच करने वाला खुर्राट भी एक भारतीय हैं।
काबिल महिला डाक्टर की एक पूर्व से भी पूर्व प्रेमिका से भी बात होती है। यह भी एक भारतीय महिला है। वहीं, दूसरी तरफ काबिल भारतीय डाक्टर की जो फिलहाल की पार्टनर है, यानी जूनियर टाइप की महिला डाक्टर, उसे रिश्तों पर संदेह होने लगता है। वो सोचती है कि काबिल महिला डाक्टर फिर से अपनी पूर्व प्रेमिका (गोरी वाली) के करीब हो गई है। इसके चलते वो एक प्राईवेट जासूस हायर करती है। मजे की बात यह है कि यह प्राईवेट जासूस भी भारतीय या पाकिस्तानी है।
अंत में निकलता है कि काबिल महिला डाक्टर की छवि खराब करके उससे प्रमोशन छीनने की कोशिश एक अन्य सीनियर अंग्रेज डाक्टर साब कर रहे थे। एक जूनियर अंग्रेज लड़की जाने-अनजाने मोहरा बन जाती है और जूनियर अंग्रेज डाक्टर साब जिनको डांट पड़ी थी, वे भी काबिल महिला डाक्टर के खिलाफ रहते हैं। अंत में सब ठीक हो जाता है। आरोप साबित नहीं होते हैं। झूठे और गुमनाम आरोप लगाने वाला गोरे डाक्टर की पोल खुल जाती है।
ऋषि सुनक के बाद इस फिल्म को देखकर लगा कि हम भारतीय इंग्लैंड से अच्छा बदला ले रहे हैं। हर प्रभावशाली पद अब हमारा है। अब सवाल है कि मैंने यह पिक्चर क्यों देखी? मैंने इसलिए देखी कि इसमें काबिल महिला डाक्टर का रोल करने वाली अभिनेत्री का अभिनय मैं पसंद करता रहा हूं। मुझे लगा कि शायद कहानी में भी कुछ नयापन होगा।
मुझे पता है कि और लोग भी इस फिल्म के शिकार जरूर बने होंगे…
