अन्ना करेनिना : परंपरा, स्वतंत्रता और स्त्री की त्रासदी
आदित्य
अन्ना करेनिना की कहानी इतनी लोकप्रिय है, इस कहानी पर इतनी फ़िल्में बनी हैं, इतनी चर्चाएँ हुई हैं कि इस किताब को पढ़े बिना भी आप इसकी कहानी जानते हैं। ऐसे में किताब के बारे में एक पूर्वाग्रह भी बन जाता है।
यह किताब सिर्फ़ अन्ना के बारे में नहीं है। यह किताब असल में पारिवारिक जीवन की नैतिकताओं, उसके विरोधाभास और जीवन में आस्था-अनास्था के द्वंद्व की किताब है। यह कहानी सिर्फ़ अन्ना की कहानी नहीं है बल्कि अन्ना और ल्योविन की कहानी है। यह कहानी स्वयं टॉल्सटॉय की कहानी है और उनके अपने नैतिक द्वंद्वों की कहानी है, उनके अपने जीवन और दार्शनिक निष्कर्षों की कहानी है।
दो तरह की पारिवारिक नैतिकताओं का संघर्ष है — उनमें से एक विजयी होता है और एक पराजित। एक मूल्य है पारंपरिक ईसाई परिवार और दूसरा मूल्य है स्वतंत्रता का मूल्य, परिवार के पारंपरिक बंधनों का निषेध। इस संघर्ष में टॉल्सटॉय का उद्देश्य पारंपरिक मूल्यों का संरक्षण है। इस किताब को लिखने के पीछे टॉल्सटॉय का उद्देश्य कहीं न कहीं इन दो विरोधी मूल्यों को एक-दूसरे के समानांतर खड़ा करके गैर-पारंपरिक स्वतंत्र मूल्यों पर कड़ी फटकार लगाने का था।
लेकिन किताब का प्रभाव उल्टा है। पाठक अन्ना के साथ सहानुभूति महसूस करता है। अन्ना सिर्फ़ अपने जुनून का शिकार नहीं है — उसकी यंत्रणाओं के व्यवस्थित सामाजिक कारण हैं। सेंट पीटर्सबर्ग का पितृसत्तात्मक समाज उसके प्रेमी काउंट व्रोंस्की को तो स्वीकार कर लेता है लेकिन अन्ना के हिस्से आता है तिरस्कार और अपमान। अन्ना और व्रोंस्की के अफेयर में समाज अन्ना को ही खलनायक मानता है। यहाँ तक कि अन्ना की आत्महत्या के बाद भी व्रोंस्की के साथ समाज सहानुभूति ही दिखाता है।
अन्ना की यातनाओं को स्त्री-अधिकारों के आलोक में देखने पर लगता है कि बस कुछ पारदर्शी नियम-क़ानून होते तो अन्ना एक बेहतर जीवन का रास्ता तलाश पाती।
अन्ना का पति एलेक्सी अलेक्ज़ेंड्रोविच भी एक क्रूर और तानाशाही प्रवृत्ति का व्यक्ति है। असल में अन्ना के विचलन का कारण भी एलेक्सी ही है क्योंकि वह प्रेम-भावना से च्युत पुरुष है। उसके भीतर की मनुष्यता कुछ थोड़े समय के लिए सिर्फ़ तभी जागती है जब अन्ना बीमार होती है और मृत्यु की कगार पर खड़ी होती है।
न सिर्फ़ इतना ही, एलेक्सी बाद में काउंटेस लीडिया और काउंट बेजुबोव के प्रभाव में आकर अंधविश्वासों की गिरफ़्त में भी आ जाता है और अन्ना से तलाक़ के बारे में अपना आख़िरी निर्णय एक मूर्खतापूर्ण धार्मिक कर्मकांड के सहारे लेता है, जिसकी वजह से अन्ना अंततः आत्महत्या करने को मजबूर होती है।
दूसरी ओर ल्योविन यानी कि स्वयं टॉल्सटॉय भूमि सुधारों पर जो दर्शन बघारता है, उसमें बहुत सी समस्याएँ हैं। उसके जीवन में दो महत्वपूर्ण घटनाएँ होती हैं जिससे वह अनास्था से आस्था की यात्रा पूरी करता है — एक उसके भाई निकोलाई की मृत्यु और दूसरा उसके बेटे का जन्म। तार्किक रूप से यह यात्रा पलायन की यात्रा है — खासकर अन्ना और व्रोंस्की के संबंधों की छाया में। इस यात्रा से यह साबित करने का प्रयत्न किया गया है कि पारंपरिक परिवार में ही जीवन का वास्तविक अर्थ है। यह यात्रा और यह स्वीकृति अनास्था को निरस्त करती है।
लेकिन पाठक इस द्वंद्व में यह पाता है कि अनास्था और स्वतंत्रता को निरस्त करने के लिए लेखक ने परंपरा और धर्म के साथ अतिरिक्त उदारता दिखाई है और इसके विपरीत मूल्यों के प्रति क्रूरता का प्रदर्शन किया है।
किताब इतनी विस्तृत है, चरित्र इतने नैसर्गिक और स्पष्ट हैं, घटनाएँ इतनी जीवंत हैं कि टॉल्सटॉय के वास्तविक उद्देश्य जो भी रहे हों, पाठक उस समय के पारंपरिक रूसी समाज के विरोधाभासों और पाखंडों को देख पाने में सक्षम होता है। जान पड़ता है कि इस किताब में अन्ना टॉल्सटॉय के बरक्स आ खड़ी होती है और उनसे उसके ख़िलाफ होने वाली अतिरेकताओं को चिह्नित करने लगती है।
अन्ना की यातनाओं को स्त्री-अधिकारों के आलोक में देखने पर लगता है कि बस कुछ पारदर्शी नियम-क़ानून होते तो अन्ना एक बेहतर जीवन का रास्ता तलाश पाती।
यह किताब अंततः अन्ना बनाम टॉल्सटॉय की किताब है, जिसमें जीवन का अर्थ कई परतों में खुलकर सामने आता है — कहानी ख़ुद-ब-ख़ुद टॉल्सटॉय की थोपी हुई नैतिकताओं का पर्दाफाश कर देती है और धार्मिक मूल्यों, पाखंड आदि की एक विस्तृत आलोचना प्रस्तुत करती है।
इन सबके साथ यह किताब एक महाकाव्य की तरह है जिसमें जीवन और समाज के सभी पक्षों का विषद, सुंदर और प्रभावशाली विवेचन है। इसमें जीवन के सभी रंग समानता से शामिल हैं — चाहे वह प्रेम हो, मृत्यु हो, जन्म हो, विवाह हो, अभिजात्य समाज की जीवनशैली हो, भूमि सुधार के प्रश्न हों, साहित्य, राजनीति या अर्थशास्त्र के प्रश्न हों, धार्मिक रीति-रिवाज हों, वैवाहिक जीवन के सुख और उसकी विसंगतियाँ हों, अवसाद हो, आम जीवन हो या अन्य ऐसी ही बहुत सी चीज़ें।
आदित्य कवि, कहानीकार और सांस्कृतिक आलोचक हैं। बेंगलुरु में बिज़नेस एनालिस्ट के रूप में कार्यरत आदित्य की रचनाएँ और अनुवाद तद्भव, हंस, आलोचना, बया, कृत्या और समालोचन जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं।
