साहित्य

पश्चिमी दिल्ली के ईरानी सिख और शिया ब्राह्मण

स्वाति शर्मा

मैं ईरानी सिखों और अफ़ग़ान सिखों के साथ खेलते-कूदते हुए बड़ी हुई हूँ। वे लोग पश्तो-पंजाबी और फ़ारसी-पंजाबी की मिली-जुली बोलियाँ बोलते थे। मेरे बचपन का हिस्सा था काबुल से आए सूखे मेवे और केसर वाला दूध पीना, और तेहरान से आए कालीनों पर बैठना।

मेरी माँ, मैं और मेरा भाई कंधार के एक सिख बच्चे के साथ बैठकर होमवर्क करते थे। अगर हममें से किसी की स्पेलिंग गलत हो जाती या गणित का सवाल गलत निकलता, तो माँ उसे भी उतनी ही आसानी से डाँट देतीं या हल्का-सा थप्पड़ मार देतीं, जैसे हमें मारती थीं।

मेरे दादा, जो पाकिस्तान से आए एक ब्राह्मण शरणार्थी थे, 1984 के दंगों के समय हमारे घर में छिपे हुए मेरे पिता के एक सिख दोस्त की रखवाली करते थे। मेरे बचपन की कई पसंदीदा फ्रॉक और मेरी माँ के सूट अमृतसर से आई एक सिख शरणार्थी आंटी सिलती थीं।

मेरी नानी, जो पाकिस्तान के कंज़रूर से आई थीं, हुसैनी ब्राह्मण या शिया ब्राह्मण नाम के एक छोटे समुदाय से थीं, जो करोल बाग के पास किशनगढ़ में आकर बसा था। वे अक्सर इस बात का दुख जताती थीं कि बँटवारे ने उन्हें कितनी बदहाली में ला खड़ा किया। लेकिन कभी-कभी वे अपने ईरानी-शिया-मोहयाल ब्राह्मण विरसे का भी ज़िक्र करती थीं और यह भी बताती थीं कि वे उन लोगों से अलग थे जिन्होंने बँटवारे के दौरान उनके परिवार के लोगों की हत्या कर दी थी।

पश्चिमी दिल्ली में ईरानी सिखों की एक छोटी आबादी रहती है, जो 1980 और 90 के दशक में यहाँ आकर बस गई थी। इसी समय 1984 के बाद बहुत से पंजाबी सिख शरणार्थियों को तिलक विहार की छोटी-छोटी डीडीए कॉलोनियों में बसाया गया। यही माहौल बाद में 1979 के बाद और पूरे 1990 के दशक में यहाँ आने वाले अफ़ग़ान सिख शरणार्थियों के लिए भी स्वाभाविक रूप से स्वागत करने वाला बन गया।

उत्तर प्रदेश के सिख—खासतौर पर अलीगढ़ के आसपास के—भी विवाह के रिश्तों के ज़रिए इन समुदायों से जुड़ गए और पंजाबी बाग के आसपास बस गए। आज ये लोग मोती नगर, करमपुरा, जनकपुरी और तिलक नगर जैसे इलाकों में फैले हुए हैं।

दिलचस्प बात यह है कि जिन राजनीतिक व्यवस्थाओं के कारण उन्हें अपना देश छोड़कर भारत आना पड़ा, उनसे नाराज़ होने के बावजूद मेरी कॉलोनी के एक अफ़ग़ान-सिख-गुरुद्वारे में शोक सभाओं के दौरान वे लोगों की मौत से ज़्यादा अपने पूर्वजों के घरों पर हुई बमबारी को याद कर दुख व्यक्त करते हैं।

पहचानें कभी सीधी और सरल नहीं होतीं—वे कई परतों वाली, सूक्ष्म और जटिल होती हैं, और शायद इसी कारण इतनी खूबसूरत भी।

स्वाति शर्मा दिल्ली में डिजिटल कम्युनिकेशन्स कंसलटेंट हैं और हिंदी व अंग्रेज़ी में लेखन करती हैं। उनकी कविताएँ, समीक्षाएँ और लेख विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं।

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