लिखना अपना खालीपन भरना है : विनोद कुमार शुक्ल

लेखक विनोद कुमार शुक्ल से संगम पांडेय की यह बातचीत करीब 25 साल पहले जनसत्ता में प्रकाशित हुई थी। इस बातचीत में एक किस्म का अखबारी तेवर और तात्कालिकता भी है, जिन पर दिए गए जवाबों से हमें शायद विनोद कुमार के लेखन और शख़्सियत को समझने के कुछ और सूत्र मिलें। प्रस्तुत है पूरी बातचीत साभार :

कवि-उपन्यासकार विनोद कुमार शुक्ल को ख्याति अपेक्षातकृत विलंब से मिली, मगर जब मिली तो निर्विवाद मिली। ‘लगभग जयहिंद’ और ‘वह चला गया गरम कोट पहन कर विचार की तरह’ जैसे काव्य संग्रहों और ‘नौकर की कमीज’ और ‘टीवार में एक खिड़की रहती थी’ जैसे उपन्यासों से उनकी पहचान एक ऐसे संवेदनशील साहित्यकार के रूप में बनती है जो अपने आसपास की निहायत तुच्छ मान ली गईं, लगभग त्याग दी गई चीजों को बहुत जतन से सहेजता है और रोजमर्रा के नीरस लगने वाले मानवीय व्यवहार के बीच मनुष्य के स्वभाव और विवेक के मार्मिक पक्षों को सहज भाषा में उकेरता है। उनका गद्य जितना सूक्ष्म है उतना ही सरल भी, जितना सटीक है उतना ही तलस्पर्शी भी, जितना आत्मीय है उतना ही अनूठा भी। यह गद्य वह जगह बनाता है जहां कवि और कथाकार मिल जाते हैं और अपने साथ पाठक को भी शामिल कर लेते हैं। कहने की बहीं कि यह निपट आत्मीय अनूठापन गद्य से ज्यादा उस दृष्टि का है जिससे विनोद कुमार की रचना अनुशासित और संभव होती है। ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ पर मिला अकादेमी पुरस्कार लेने के लिए वे इन दिनों दिल्ली में थे। इस अवसर पर उनसे की गई के महत्त्वपूर्ण अंशः

संगम पाण्डेय

आपकी शुरुआती पहचान कवि के रूप में थी, पर अब जिस तरह उपन्यासकार प्रमुखता पा गया है, क्या यह नहीं लगता कि यह वक्त गद्य के ज्यादा अनुकूल है ! या कविता लोगों को कम समझ में आती है?

विनोद कुमार शुक्ल

अभी अकादेमी पुरस्कार के वक्तव्य में मैंने कहा भी है कि कोई भी लेखक इस बात की कोशिश करता है कि वह अपनी रचना को अधिकतम रचना बनाए। इस कोशिश और पाठक के बीच एक संतुलन बनता है। बाद में जो बचा रहता है, जो अपने पाठक होने के विरोध के बाद, दूसरे पाठकों के हिस्से में चला जाता है वह वह बहुत थोड़ा-सा होता है। मेरा मानना है। है कि रचना अपनी अधिकतम दूरी के साथ ही उपस्थित होती है पाठक के लिए। रचना की समीपता कोई भी रचनाकार पाठक के लिए नहीं दे सकता। रचना के लिए समीपता तो पाठक के पास होती है। यह तो उसका ही अधिकार क्षेत्र है। रचनाकार का अधिकार क्षेत्र अपनी रचना करने का है।

समझ में आने या न आने को जो बात है, तो जब रचना लिखी जाती है या जब वह हो जाती है, तो रचनाकार की जिम्मेदारी से अलग हो जाती है। प्रत्येक रचना अपनी घेरेबंदी करती है किसी भी अजनबी के लिए, और खुलती केवल उसी के लिए है जो उसे खोलना चाहता है। रचना तक वही पहुंचता है जो उसे पाना चाहता है, जो उस तक पहुंचना चाहता है। समीपता का मतलब कहीं ‘समझ में आने’ से है, ऐसा मैं नहीं सोचता। आप पाठक की समीपता लाने की कोशिश करेंगे तो अधिकतम रचना जो है थोड़ी सी कम हो जाएगी। फिर कौन है पाठक, कहां है पाठक, कैसा पाठक; जो हमारे भीतर का अपना पाठक है, दरअसल वही पाठकों का औसत पाठक बनाता है। हमारा अपना पाठक होना हो तो एक औसत पाठक की तरह है। हमारा तो साबका रचनाकार की हैसियत से उसी के साथ में होता है, रचना करते समय।

संगम पाण्डेय

‘नौकर की कमीज’ को एक संयोग से और देर से जो चर्चा मिली, उसके बाद आपके दो उपन्यास जल्दी-जल्दी आए। क्या यह तेजी कुछ सायास नहीं थी ?

विनोद कुमार शुक्ल

नहीं। मैंने जो उपन्यास लिखे, उसके पीछे कुछ कारण थे। ‘नौकर की कमीज’ उपन्यास मैंने मुक्तिबोध फेलोशिप मिलने के बाद और एक रचनात्मक दबाव में लिखा। बाद के दोनों उपन्यास मैंने निराला सृजनपीठ में आने के बाद लिखे। लिखने के लिए मुझे अवकाश का खजाना मिल गया था। मुझे लग रहा था में इसका उपयोग कैसे करूं। दूसरा कारण यह कि में किसी विश्वास के कारण वहां गया था। विश्वास की एक जिम्मेदारी होती है। मेरे साथ प्रायः यह हुआ है, किसी विश्वास की जिम्मेदारी से हो मैं लिख पाता हूं। अक्सर किन्हीं और कारणों या जिम्मेदारियों को वजह से मैं लिख पाने की ओर लौट नहीं पाता। उस तक पहुंच पाने में मुझे थोड़ी देर हो जाती है।

संगम पाण्डेय

यानी चर्चा के जरिए मिला स्वीकार, कोई वजह नहीं थी ?

विनोद कुमार शुक्ल

ऐसा कुछ भी नहीं है। लिखना एक ऐसी जिम्मेदारी है कि उसका एहसास तब होता है जब लिखने का थोड़ा मतलब निकल रहा हो। भले थोड़े से लोग हों, उन थोड़े से लोगों को यह अच्छा लग रहा हो। फिर बिना लिखे रहा भी नहीं जाता है। लंबे समय तक न लिखें तो लगता है कहीं कुछ खालीपन जरूर है। न लिखने के खालीपन को आप लिखकर ही भर सकते हैं। और कोई दूसरा तरीका नहीं है भरने का।

संगम पाण्डेय

आपकी किताबों पर जो आलोचनाएं-समीक्षाएं छपीं, क्या उनमें आपको वह चीज मिली, जो आप कहना चाहते हैं?

विनोद कुमार शुक्ल

एक रचना को उसके आसपास के अर्थों के साथ रचनाकार तैयार करता है। कविता में न मालूम कितने अर्थों की गुंजाइश होती है। उन सारी गुंजाइशों पर रचनाकार की भी नजर नहीं पड़ती है। अगर कहीं किसी रचना से किसी दूसरी तरह का अर्थ भी निकलता है, तो दरअसल शायद उसमें ऐसी कोई गुंजाइश रहती हो। लेकिन तब भी अर्थ लगाने की बहुत सी गुंजाइशों को समेटकर रचना तैयार होती है। और इसको जो प्रक्रिया होती है, जैसे रखना को पाने के लिए कोई यस्ता बनता है। पाठक का रचना के साथ संबंध बनाने के लिए ठीक उसी रास्ते पर चलना थोड़ा मुश्किल होता है। मेरा खयाल है कि किसी भी रचना तक शुरू से लेकर आखिर तक पहुंचने के लिए पाठक को शायद उस रास्ते के आसपास भटकना होता होगा।

संगम पाण्डेय

आपके उपन्यासों ने लगता है जैसे औपन्यासिकता का अर्थ ही बदल दिया है। चीजों को देखने के तरीके से लेकर भाषिक विन्यास तक सब कुछ यहां बिल्कुल बदला हुआ और नया है। उसमें भी ‘दीवार में खिड़की….’ तो जैसे एक पूरी बिंबकथा है। यह कैसे करते हैं आप?

विनोद कुमार शुक्ल

यह तो बताना मुश्किल है कि मैं कैसे करता हूं। लेकिन एक चीज यह मैं कह सकता हूं कि मैं, लिखता हूं तो उसकी कोई योजना नहीं बनाता। मैं तय नहीं करता कि मुझे इस तरह से लिख ना है और इतना लिखना है। एक अनिश्चितता में इसकी शुरुआत होती है। जितना अयोजनाबन्द्व डोता हूं उतना मेरे लिए आसान होता है- चीजों को पकड़ने के लिए। असीमित मेरे पास स्वतंत्रता होती है। जहां आप किसी चीज को योजना के अनुसार तय करते हैं तो लगता है कि उस चीज को पाने के लिए आप अपनी सीमाओं को कम कर देते हैं। तो आप यह मानकर चलिए कि बहुत खुले में, बहुत असीम में लिखने की मैं शुरुआत करता हूं, बाद में क्या और कैसा होगा, यह बताना बहुत कठिन है।

संगम पाण्डेय

क्या आप यह मान कर चलते हैं कि आपका हर उपन्यास एक अलग तरह का प्रयोग होगा?

विनोद कुमार शुक्ल

मैं जान-बूझ कर कोई ऐसा सलूक नहीं करता हूं उपन्यास लिखते समय। लिखते समय लगता है कि शायद यही रास्ता होगा। अब इधर मुड़ना होगा, तो उस रास्ते पर मुड़ गए। फिर लगता है कि नहीं अब इधर मुड़ना होगा, तो कहीं और चले गए। प्लॉट मैंने आज तक बनाया नहीं। जैसा मैंने कहा, प्लॉट बनाकर लेखक अपने आप को सीमित करता है। जब आप लिखने का तय करते हैं तो शुरुआत में ही आपको थोड़ी सी ऐसी गुंजाइश मिलने लग जाती है, कि आपको किस तरह लिखना है इसमें रचना भी आपका साथ देती जाती है।

संगम पाण्डेय

यानी माना जाए कि आप उपन्यास को कविता की रचना प्रक्रिया में लिखते हैं?

विनोद कुमार शुक्ल

यह जरूर है कि कविता का रास्ता मुझे कठिन लगता है और गद्य के रास्ते कविता में पहुंचना मेरे लिए बहुत आसान होता है। चार शब्द अगर मुझे गद्य के मिलते हैं तो आगे कविता के असंख्य शब्द मुझे मिले जाते हैं। गद्य के शब्द तो एक चाभी की तरह हैं जिससे कविता के शब्दों का खजाना मुझे मिल जाता है।

संगम पाण्डेय

जब आपका कोई उपन्यास पूरा होता है, तो आपको क्या लगता है कि यह वैसा ही है जैसा इसे होना चाहिए था?

विनोद कुमार शुक्ल

अंत होने में तो बहुत से कारण होते हैं। मुझे लगता है कि चाहे वह कविता हो चाहे उपन्यास हो, आदमी अपनी सारी जिंदगी के एक अनुभव को ही लिखता है। उपन्यास को चाहे आप कविता संग्रह की तरह पढ़ लें या कविता संग्रह को उपन्यास की तरह पढ़ लें। कोई कारण ऐसा लगता नहीं कि विधाओं को इस अंतर के साथ देखना चाहिए। विधा कोई बहुत ज्यादा मायने रखती नहीं है। एक तरीके की तरह उसे मान लें कि आप अपने को अभिव्यक्त करने के लिए किस तरह लिखते हैं। अगर वह कविता की तरह है तो कविता है। उपन्यास या कहानी की तरह है तो उपन्यास या कहानी है।

संगम पाण्डेय

आपने कहा कि रचना में बहुत सारे अर्थ संभावित होते हैं। पर एक अर्थ, या कहना चाहिए कि एक दृष्टि, रचनाकार की अपनी भी होती है। उदाहरण के तौर पर श्याम बेनेगल की फिल्म ‘अंकुर’ को जिस तरह सत्यजीत राय ने देखा, बेनेगल उससे कतई असहमत थे। तो अपनी कृतियों के बारे में आलोचकीय रायों से आपकी असहमति किस हद तक होती है?

विनोद कुमार शुक्ल

कई बार तो मुझे लगता है कि पाठक और लेखक के बीच आलोचक की उपस्थिति अलग से और गैरजरूरी है। रचना को तो उसको टीका की तरह समझने की कोशिश करनी चाहिए। कई बार तो स्थितियां इस तरह से हो जाती हैं, कि कई तरह की आलोचनाओं के कारण लेखक को कई बार लगता है कि जैसे लिखकर उसने कोई गलती कर दी हो। कोई अपराध का काम कर दिया हो और कटघरे में खड़ा कर दिया गया हो। किसी भी रचना को अस्वीकृत करने की गुंजाइश तो होती है। लेकिन इस अस्वीकृति में रचनाकार के लिए अपराध का बोध न बनाया जाए, ऐसा मुझे लगता है।

संगम पाण्डेय

आपकी प्रिय पुस्तक कौन सी है?

विनोद कुमार शुक्ल

रसूल हमजातोव की एक किताब मैंने पढ़ी थी ‘मेरा दागिस्तान’। उस किताब को तो मैं खरीदकर अपने आसपास के लोगों को भेंट में देता भी था। वह किताब मुझे बहुत अच्छी लगी। उसको मैं आज भी पढ़ना चाहता हूं। पर पंद्रह साल पहले पता नहीं किसको मैंने वह किताब दी थी। मैं लेना भूल गया वे देना भूल गए। अब वह किताब कहीं मिलती नहीं है।

संगम पाण्डेय

आपकी आने वाली किताबें ?

विनोद कुमार शुक्ल

एक कविता संग्रह वाणी से आना है। कुछ लंबी कविताओं का संकलन राजकमल वाले चाहते हैं। इसके अलावा छत्तीसगढ़ में नाचा और गम्मत के जो लोक कलाकार हैं उन पर एक उपन्यास को किसी कारणवश शुरुक्षात हो गई है। अब अंत कब होगा, मुझे नहीं मालूम।

जनसत्ता 27 फरवरी, 2000 के अंक से साभार

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