कानूनी अधिकार, जो हर भारतीय महिला को पता होने चाहिए

मेरा रंग डेस्क

भारत में शादी का बहुत महत्व है। ये बात अलग है कि एक शादी में लड़का और लड़की के हिस्से, उसके अलग-अलग ‘कोड ऑफ कंडक्ट’ पहले से ही निर्धारित होते हैं। सरल शब्दों में कहें तो एक शादी में लड़की और लड़के की एक दूसरे के प्रति क्या- क्या जिम्मेदारियां होंगी यह पहले से ही तय होता है। जिसे उन्हें शादी के बंधन में बंधने और बंधे रहने के लिए निभाना होता है ।महिलाओं के लिए इसका मतलब है घर को सभालना और पति उसके घरवालों की सेवा करना। क्योकि लड़कियां तो बड़ा ही ऐसे की जाती हैं।

आपको सुनने में यह बातें गलत लग सकती है पर हमारा समाज की बनावट ही कुछ ऐसी है कि हम अपनी बेटियों की शादी तो करते हैं, पर उस शादी से ‘डील’ कैसे करना है, यह नहीं सिखाते। क्योंकि क्या यह सच नहीं है कि पहनने ओढ़ने में हम भले ही कितने मॉडर्न हो रहे हों या बड़ी-बड़ी बातें कर लें, लेकिन सच तो यही है कि, एक मुश्किल भरे रिश्ते को निभाने के लिए क्या करना चाहिए, यह हम आज भी अपनी बेटियों को नहीं सिखाते। डिवोर्स, सेपेरेशन,आत्महत्या इसी सब का तो नतीजा हैं। लेकिन दूसरी तरफ यह भी कहना गलत नहीं है कि वक्त ने करवट ली है। अब लड़कियां कम से कम जानकारी के लिहाज से तो किसी पर ‘डिपेंडेंट’ या निर्भर नहीं ही हैं।

विवाहिता हों या युवा या जिनकी शादी होने वाली है, हम सभी महिलाओं को अपने कानूनी अधिकारों को जानना चाहिए। महिलाएं विवाह में किसी भी तरह के उत्पीड़न को दंडित कर सकती हैं और गरिमा और मर्यादा में रहते हुए अपने गठबंधन यानी शादी से निकलने का दावा कर सकती हैं, लेकिन यह सब तब, जब वो अपने कानूनी अधिकारों के बारे में जानती हों। यह तो हम सभी जानते हैं कि सरकार ने महिलाओं की शादी की उम्र संशोधित करके 18 के बजाए अब 21 वर्ष कर दी है। तो चलिए यहां पर कुछ ऐसे कानूनी अधिकारों को डिस्कस करते हैं, जो हर भारतीय विवाहित महिला को कानूनन प्राप्त हैं।

वैवाहिक घर पर अधिकार

  1. पति की मृत्यु के बाद भी पत्नी को अपने वैवाहिक घर यानी ससुराल में रहने का कानूनी अधिकार प्राप्त है।
  2. चाहें फिर वह घर उसके पति के नाम पर हो या नहीं, या वो घर उसके पति के माता-पिता के नाम पर हो या वे किराए के अपार्टमेंट में ही क्यों न रहते हों।
  3. अगर पति-पत्नी अलग हो रहे हों तो भी वह अपने वैवाहिक घर पर रह सकती है, जब तक उसके लिए किसी विकल्प की व्यवस्था नहीं हो जाती या वो अपने पिता के घर नहीं चली जाती।
  4. साथ ही, हिंदू विवाह अधिनियम एचएमए, 1955 में ऐसा कोई निर्देश नहीं है कि विवाहित स्त्री अपने माता-पिता के घर पर नहीं रह सकती। वह पूरे कानूनी अधिकार के साथ रह सकती है। जब चाहे, जैसे चाहे और जब तक चाहे।

संपत्ति पर अधिकार

  1. 2005 के हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के अनुसार, एक बेटी, चाहे वह शादीशुदा हों या नहीं, उसे अपने पिता की संपत्ति में अपने भाई के समान ही अधिकार प्राप्त है।
  2. एक महिला को अपने पति की संपत्ति में उसके अन्य उत्तराधिकारियों के रूप में अधिकार प्राप्त करने के समान कानूनी अधिकार प्राप्त हैं। वह इसे तब भी ले सकती है, जब पति ने वसीयत तैयार न की हो, या महिला को वसीयत से बाहर नहीं किया हो।
  3. यदि पति पहली शादी को भंग किए बिना यानी डिवोर्स लिए बिना दोबारा शादी करता है, तब भी संपत्ति का अधिकार पहली पत्नी का ही रहता है।

घरेलू हिंसा के खिलाफ शिकायत का अधिकार

  1. कोई भी महिला घरेलू हिंसा संरक्षण अधिनियम 2005 के तहत घरेलू हिंसा की रिपोर्ट दर्ज करा सकती है।
  2. यह अधिनियम शारीरिक, भावनात्मक, यौन, आर्थिक और अन्य प्रकार के दुर्व्यवहार का अपराधीकारण करता है।
  3. वह संरक्षण, रखरखाव, हिरासत, क्षतिपूर्ति का दावा कर सकती है, साथ ही उसी घर में रह भी सकती है।

एबॉर्शन के अधिकार

  1. मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी एक्ट 1971 एक महिला को पति की अनुमति के बिना गर्भपात कराने की पूर्ण स्वायत्तता देता है।
  2. गर्भपात करवाने की समय सीमा या अवधि को बढ़ाकर 24 सप्ताह की जा चुकी है।

तलाक का अधिकार

  1. एचएमए 1955 की धारा 13 महिलाओं को पति की सहमति के बिना तलाक फाइल करने के कानूनी अधिकार देती है।
  2. तलाक व्याभिचार, क्रूरता, निर्जनता, वैवाहिक घर से बाहर फेंकने या मानसिक विकार आदि में से किसी भी दावे के आधार पर दायर किया जा सकता है।
  3. अधिनियम की धारा 13 बी आपसी सहमति से तलाक की अनुमति देती है।

रखरखाव और गुजारा भत्ता पाने का अधिकार

  1. आईपीसी की धारा 125 एक विवाहित महिला को जीवन भर के लिए अपने पति से भरण पोषण का कानूनी अधिकार देती है।
  2. यदि विवाह असफल रहता है, तो 1955 का एचएमए एक्ट महिला को अपने बच्चों के रखरखाव का दावा करने के लिए कानूनी अधिकार प्रदान करता है। जिसके तहत तलाक की प्रक्रिया के दौरान ‘अंतरिम’ और तलाक के बाद ‘स्थायी रखरखाव’ के तौर पर मिलता है।
  3. कानूनन गुजारे भत्ते की राशि में ‘स्त्री धन’ शामिल नहीं होता है, और यह अदालत द्वारा पति की वित्तीय स्थिति के आधार पर निर्धारित किया गया है। ‘जो कि पति की पूरी कमाई का 25 प्रतिशत तक हो सकती है’
अगर पत्नी कमाती हैः
  1. इस स्थिति में महिला या पत्नी भरण-पोषण की मांग तभी कर सकती है, यदि उसका पति उससे ज्यादा कमाता हो।
  2. अगर दोनों की आमदनी एक समान है, तो पत्नी अपने लिए भरण पोषण की मांग नहीं कर सकती, लेकिन हां, अपने बच्चों के लिए वह इसका दावा कर सकती है।
  3. साथ ही यदि पत्नी पति से ज्यादा कमाती है, तो पति भी भरण पोषण का दावा कर सकता है।

दहेज निषेध और उत्पीड़न

  1. दहेज निषेध अधिनियम 1961 दहेज प्रथा को प्रतिबंधित करता है। एक महिला अपने माता-पिता के परिवार या दहेज के आदान-प्रदान के लिए ससुराल वालों के खिलाफ रिपोर्ट कर सकती है।
  2. दहेज के कारण अपने ससुराल वालों से क्रूरता का कोई भी मामला आईपीसी की धारा 304 बी और 498 ए के अन्र्तगत दर्ज किया जा सकता है, जो दहेज उत्पीड़न मामले का अपराधीकरण करता है।
  3. यह धारा दुल्हन को क्रूरता, घरेलू हिंसा ‘शारीरिक, भावनात्मक या यौन उत्पीड़न’ आत्महत्या के लिए उकसाने और दहेज हत्या के रूप में दहेज उत्पीड़न का अपराधीकरण करती है।
  4. भारत में अभी तक ‘वैवाहिक बलात्कार’ का अपराधीकरण नहीं किया गया है, लेकिन हां, घरेलू हिंसा अधिनियम, दहेज उत्पीड़न और जबरन सेक्स के अन्र्तगत यह दावा किया जा सकता है।

स्त्रीधन का अधिकार

  1. HSA की धारा 14 और HMA की धारा 27, 1955 के अन्र्तगत महिला को अपने स्त्रीधन पर पूरा स्वामित्व प्राप्त है।यदि उसे इस अधिकार से वंचित किया जाता है, तो महिला DV अधिनियम की धारा 19 ए के तहत शिकायत दर्ज करा सकती है।

बच्चे की कस्टडी का अधिकार

  1. ‘1890 का गार्डियन एंड वार्ड्स एक्ट’ माता और पिता दोनों को बच्चे पर समान अधिकार और कर्तव्य देता है। हालांकि, अगर बच्चा पांच साल से कम उम्र का है, तो बच्चे पर मां का अधिकार अधिक होता है।
  2. महिला को बिना किसी अदालती आदेश के वैवाहिक घर से निकलते समय बच्चे को अपने साथ ले जाने का अधिकार प्राप्त है।
  3. महिला तलाक या अलगाव के बाद अपने बच्चों की कस्टडी का दावा कर सकती है, फिर भले वह नौकरी पेशा हो या बेरोजगार। क्योंकि इसके लिए वह गुजारा भत्ते का दावा कर सकती है।

सम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार

  1. एक महिला को स्वतंत्र रहने का पूरा कानूनी हक है। वह भी सर उठा कर रह सकती है। अपने पति की लाइफस्टाइल अपना सकती है। बोलने का भी उसे पूरा कानूनी हक है। वह अपने खिलाफ हो रहे किसी भी तरह के अत्याचार के प्रति आवाज उठा सकती है।
  2. एक औरत भी कानूनी रूप से विवाह में ‘प्रतिबद्ध’ रिश्ते यानी कमिटमेंट की हकदार है। व्यभिचार यानी खराब चाल-चलन और बहुविवाह यानी एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर तलाक के कानूनी आधार हैं। कोई भी कानून किसी विवाहित महिला को शिक्षा प्राप्त करने या अपने पैरों पर खड़े होने या इंडिपेंडेंट होने से नहीं रोकता।

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