स्मृति की रेखाएँ : पीड़ित समुदाय के प्रति संवेदना और आक्रोश की अभिव्यक्ति

पिंकी चौहान :

हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में दो विधाएँ मिलती हैं– एक गद्य और दूसरा पद्य। गद्य में विचार और पद्य में भावों की प्रधानता होती है। महादेवी वर्मा ने दोनों विधाओं में लिखा है, उनकी कविताओं में भाव हैं लेकिन गद्य में विचार और भाव दोनों का समुच्चय है। गद्य में आक्रोश के साथ विरोध के स्वर दिखाई देते हैं; परंतु इसमें कहीं न कहीं काव्यात्मकता, चित्रात्मकता और संवेदनायें भी मौजूद हैं। महादेवी वर्मा ने ‘स्मृति की रेखाएँ’ में स्मृतियों के आधार पर जिन लोगों का रेखांकन किया है, उन लोगों की गहरी संवेदनायें उनसे जुड़ी हुई हैं। संस्मरण और रेखाचित्र के मिले-जुले रूप को आधार बना कर व्यक्ति को चित्रित किया है, जिससे ठोस व्यक्तित्व उभर कर सामने आया है।

आज़ादी से पहले ग्रामीण व शहरी समाज का मज़दूर वर्ग उनके रेखाचित्र में दिखाई पड़ता है, जिसमें भक्तिन, चीनी फेरीवाला, जंगबहादुर, मुन्नू की माँ, ठकुरी बाबा, बिबिया और गुंगिया आदि के माध्यम से समाज की वास्तविक सच्चाई को रेखांकित किया है। जिससे केवल सभी का व्यक्तित्व ही नहीं, बल्कि उनसे जुड़े पूरे समाज की स्थिति का पता चलता है। यही कारण है कि महादेवी वर्मा के गद्य में पीड़ित समुदाय के प्रति सहानुभूति, संवेदना और शोषण का चित्रण बहुत ज्यादा मिलता है साथ ही ऐसी स्थिति में आक्रोश की भी अभिव्यक्ति देखी जा सकती है। यही कारण है कि हिंदी साहित्य में महादेवी वर्मा के रेखाचित्रों का एक ख़ास योगदान व महत्त्व है।

संस्मरण, रेखाचित्र और निबंध में उपेक्षित वर्ग व नारी समुदाय; जो हाशिए पर हैं, उनके संघर्षों तथा कष्टों को महादेवी वर्मा ने उजागर किया है साथ ही उन्होंने उनके कष्टों के निवारण हेतु उपायों को भी इंगित किया है। समाज में— पीड़ित, स्त्री, साहित्यकार तथा मानवेतर पशु-पक्षियों को आधार बनाकर उन्होंने अपने संस्मरण व रेखाचित्र लिखे हैं। ‘डॉ. नगेंद्र’ ने महादेवी वर्मा के व्यक्तित्व के तीन रूप बताए हैं– पहला, ममतामयी भारतीय महिला, दूसरा, राष्ट्र की जागृत मेधावी और तीसरा, रहस्य कल्पनाओं की भावप्रवण कवियत्री। इसी के आधार पर यह कह सकते हैं कि उन्हें कल्पना के क्षणों में पद्य तथा विचारों के क्षणों में गद्य लिखना अच्छा लगता होगा, लेकिन तीनों विशेषताएँ एक साथ कहीं न कहीं गद्य में दिखाई पड़ते हैं।

‘श्रृंखला की कड़ियाँ’ में उन्होंने लिखा है कि ‘गद्य में अपनी अनुभूति ही नहीं बाह्य परिस्थितियों के विश्लेषण के लिए भी पर्याप्त अवकाश रहता है।’ दूसरी तरफ कविताओं में कल्पना की उड़ान नज़र आती है, परन्तु गद्य में उन्होंने यथार्थ के धरातल पर रचनाओं का सृजन किया है। उसके साथ ही बाह्य परिस्थितियों का विश्लेषण करते हुए सामाजिक क्रूरता व उनकी जर्जर मान्यताओं को उखाड़ फेंकना चाहा है।

‘स्मृति की रेखाएँ’ 1943 के आसपास प्रकाशित हुई। इस रचना के माध्यम से उस समय की सामाजिक संरचना तथा सामाजिक जीवन की वास्तविकताओं को प्रस्तुत किया है। इसी रचना की आंशिक रूप भक्तिन है जो महादेवी के घर का हिस्सा है और उनके घर के सभी कार्य करती है। उनका झुकाव भक्तिन के प्रति था जो कभी खत्म न होकर बढ़ता ही गया। भक्तिन द्वारा बताए गए इतिहास को महादेवी वर्मा इस प्रकार प्रस्तुत करती हैं कि जिससे भक्तिन का पूरा व्यक्तित्व सामने आ सके।

भक्तिन का जीवन यह बताता है कि बाल विवाह का क्या परिणाम हो सकता है? जिसका खामियाजा जीवन के लम्बे समय तक भुगतना पड़ता है। भक्तिन के पिता की मृत्यु पर सास अपशगुन समझकर उसे सूचित नहीं करती और उसकी सौतेली माँ उसके घर जाने पर अपमानित करती है– “पर वहाँ न पिता का चिह्न शेष था, न विमाता के व्यवहार में शिष्टाचार का लेश था। दुःख से शिथिल और अपमान से जलती हुई वह उस घर में पानी भी बिना पिए उलटे पैर ससुराल लौट पड़ी। सास को खरी-खोटी सुनाकर उसने विमाता पर आया हुआ क्रोध शांत किया और पति के ऊपर गहने फेंक–फेंक कर उसने पिता के चिर विछोह की मर्माव्यथा व्यक्त की।” इससे ज्यादा स्त्री कर भी क्या सकती है, वह तो युग-युग से तिरस्कृत है। नारी जीवन पर भारतीय व्यवस्थाओं का प्रभाव पड़ा है। आज़ादी से पहले भारत में ब्रिटिश हुकूमत ने एक नई आर्थिक व्यवस्था, विचारधारा और प्रशासनिक व्यवस्था की शुरुआत की। उन्होंने भारतीय संस्कृति को बदलना शुरू कर दिया।

पूँजीवाद और उदारवाद; दोनों ही व्यक्तिगत प्रयास की तार्किकता पर जोर देते हैं और इन विचारधाराओं के प्रयास ने संयुक्त परिवार को बनाए रखने की भावनाओं को चुनौती दी होगी। आर्थिक विकास के साथ-साथ शहरों का विकास हुआ और गाँवों का अलगाव टूटा; इन परिवर्तनों से भी व्यक्तिवाद को बढ़ावा मिला और संयुक्त परिवार में औरतों की नीची हैसियत के खिलाफ विद्रोह पनपना शुरू हुआ। यही कारण है कि संयुक्त परिवार का महत्त्व घटता गया, जिसका परिणाम यह हुआ कि परिवार ज्यादा लंबे समय तक संयुक्त बनकर न रह सका।

भक्तिन का परिवार संयुक्त परिवार था जो कुछ समय बाद टूट गया। संयुक्त परिवार के टूटने से पहले भी भक्तिन की दुर्दशा कुछ कम न थी। जिठानी लड़कों को जन्म देती है और भक्तिन लड़कियों को, जिसका परिणाम भक्तिन को झेलना पड़ा। “जिठानियाँ अपने भात पर सफेद राब रखकर गाढ़ा दूध डालती और अपने लड़कों को औटते हुए दूध से मलाई उतार कर खिलातीं। वह काले गुड़ की डली के साथ कठौती में मट्ठा पाती और उसकी लड़कियाँ चने–बाजरे की घुघरी चबातीं।”** ऐसा व्यवहार खाने के स्तर पर किया जाता है। इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि भक्तिन का बाकी जीवन कैसा रहा होगा? उसे उस घर में क्या नहीं करना पड़ा होगा? उन्होंने अपने जीवन में स्त्री होने के नाते बचपन से लेकर बुढ़ापे तक ना जाने कितने कष्ट सहे होंगे, कह पाना मुश्किल है।

इस रेखाचित्र में जितनी भी स्त्री पात्र सामने आई हैं, उनकी स्थितियाँ कुछ एक जैसी हैं, लेकिन जीवन के अंतिम परिणाम एक दूसरे से भिन्न हैं। भक्तिन अपने जीवन की दरिद्रता को दूर करने के लिए शहर की ओर उन्मुख होती है और महादेवी वर्मा से सेवक-सेविका का संबंध स्थापित करती है। जीवन के प्रति सरलता लिए हुए देहाती स्त्री से महादेवी वर्मा उस सरलता से स्वयं को बचा न सकीं—“इस देहाती वृद्धा ने जीवन की सरलता के प्रति मुझे इतना जाग्रत किया था कि मैं अपनी असुविधाएँ छिपाने लगी, सुविधाओं की चिंता करना तो दूर की बात।” उनका भक्तिन के प्रति रागात्मक संबंध था, जिसके कारण वे गहराई से जुड़ी और उनके यात्राओं की साथी बन गईं। शायद इसी कारण महादेवी वर्मा ने लिखा है– ‘भक्तिन की कहानी अधूरी है; पर उसे खो कर मैं इसे पूरा नहीं करना चाहती।’

भक्तिन की तरह मुन्नू की माँ बूटा जिसका बचपन माता-पिता के न रहने और काका के होने के बावजूद अनाथों जैसा जीवन जीने के लिए मजबूर हुई; मनुष्य के अंदर से मनुष्यता के खत्म होने के परिणाम को झेलती है–“इस अनाथ बालिका के आ जाने से, उन सभी को एक निष्काम सेवक की प्राप्ति हो गई। वह निरीह भाव से घर के सभी काम अपने ऊपर ले रही थी।”

बिबिया का जीवन भी कुछ ऐसा ही रहा, जिसे कैसे भूला जा सकता है? जो ऐसे समाज में जीवन जीने के लिए मजबूर हैं, जहाँ स्त्रियों को दाँव पर लगाए जाने की इच्छा पनपती हो— “हार-जीत की वस्तुएँ भी विचित्र होती थीं। कपड़ा, जूता, रुपया-पैसा, बरतन आदि में से जो हाथ आया, दाँव पर रख दिया जाता था। कोई किसी की घरवाली की हँसुली जीत लेता और कोई किसी की पतोहू के झुमके।” सारांश यह कि जुए के पहले चोरी-डकैती की आवश्यकता भी पड़ जाती थी। एक बार रमई के साथी मियाँ करीम ने कहा– “अरे दोस्त, तुम तो अच्छी छोकरी हथिया लाये हो। उसी को दाँव क्यों नहीं रखते? किस्मतवर होगे, तो तुम्हारे सामने रुपए-पैसे का ढेर लग जायेगा ढेर! इस प्रस्ताव का सबने मुक्तकंठ से समर्थन किया।” यह समाचार पाते ही अभिमानी बिबिया आग के समान हो गई।

सन् 1927 से 1932 के बीच महादेवी वर्मा विद्यार्थी जीवन जी रही थीं, इसी बीच बिबिया से मुलाकात होती है। बिबिया का चरित्र सोचने पर मजबूर कर देता है कि भारत में कानूनी व राजनीतिक स्तर पर बड़ी तेज़ी से बदलाव होते हैं लेकिन समाज में नहीं। सन् 1872 मसविल मैरिज एक्ट अधिनियम के तहत विवाह के लिए लड़कियों की 14 वर्ष की आयु और लड़कों की 18 वर्ष आयु निर्धारित की गई थी। लेकिन, बिबिया का ‘पाँच वर्ष में ब्याह हो गया पर गौने जाने से पहले ही पति की मृत्यु ने उस संबंध को तोड़कर जोड़ने वाले का प्रयत्न निष्क्रिय कर दिया।’ बाल-विवाह रोकने का प्रयास शहरों तथा शिक्षित समाज तक सीमित रहा; कानून कागज़ों का होकर रह गया और भुगतना ऐसे समाज को पड़ा जो पहले से हाशिए पर थे।

समाज द्वारा बनाए गए नियमों का विरोध करने वाली स्त्रियों के साथ ‘साम-दाम-दंड-भेद की नीति’ अपनाते हुए उनको चरित्रहीन साबित कर दंडित किया गया और ऐसी स्त्रियाँ समाज से पराजित होकर एक दिन अंतर्ध्यान हो जाती हैं– जैसे बिबिया हो गई। पंचायत ने पुरुष की गलती को अनदेखा कर उसे ही गलत ठहराया।

निम्न जाति की बिबिया का स्वर शुरू से ही विद्रोही स्वर था और मुन्नू की माँ ब्राह्मण परिवार से थी। स्त्री होने के नाते दोनों अपने-अपने परिस्थितियों से संघर्ष करते हुए जीवन जीने के लिए मजबूर हैं, क्योंकि गाँव में जाति अब भी मजबूत है। उन दोनों ने रूढ़िवादी समाज को चुनौती दी, लेकिन आर्थिक स्थिति से कमजोर होने के नाते बूटा निम्न जाति के मज़दूरों के साथ मिट्टी ढोने का कार्य करने लगी। ब्राह्मण परिवार की होकर मज़दूरी करे, इसी कारण ब्राह्मणवादी समाज के आँखों की किरकिरी बन गई।

एक ऐसी स्त्री जिसका मूल नाम धनपतिया है, लेकिन समाज ने उसके बधिर और गूंगेपन को देखते हुए उसे एक उपनाम दिया ‘गुंगिया’। 1968 में ‘श्रीलाल शुक्ल’ के ‘रागदरबारी’ उपन्यास के ‘लंगड़ा’ पात्र की तरह वह भी अपने समाज और व्यवस्था से अंत तक लड़ती रही। 1960 में धर्मवीर भारती की कहानी ‘गुलकी बन्नो’ लिखी जाती है; गुंगिया और गुलकी में अंतर बस इतना है कि गुंगिया शादी के बाद कभी ससुराल नहीं गई, लेकिन गुलकी नौकरानी बन कर गई। गुंगिया ममतामयी स्त्री होने का ऐसा प्रमाण देती है कि अपने ही पति और अपनी ही बहन के बच्चे को इस तरह पालती-पोसती है कि अंतर कर पाना मुश्किल होगा कि अपना है या पराया? जैसे-जैसे बेटा गुलासी बड़ा होता है, वैसे-वैसे गाँव के लोग अपनी ही माँ के प्रति कटुता भरते जाते हैं। अंत में वह इंतज़ार करते हुए अपनी आखिरी साँस लेती है। शहर से एक अनजान व्यक्ति के द्वारा अपनी माँ समझकर चिट्ठी और कुछ पैसे भेजे जाते हैं, जिसे वह अपने हृदय पर रखकर आँखें मूँद लेती है। इसके एक मास बाद वह मृत पाई गई और रुपए उसके तकिए के नीचे ज्यों-के-त्यों धरे मिले।

चीनी फेरीवाला, जंग बहादुर तथा ठाकुरी बाबा को भी महादेवी वर्मा भूल नहीं पाती हैं। चीनी फेरीवाला की कथा से यह निष्कर्ष निकलता है कि बिना माँ बाप के बच्चों की स्थिति दयनीय होती है। लड़कियों की दशा पर मौन रहना अब सही नहीं है, क्योंकि वे देह व्यापार में धकेल दी जाती हैं। चीनी फेरीवाले ने अपनी देशभक्ति का परिचय तब दिया जब उसने कहा— “हम कब बोला, हमारा चाइना नहीं है? हम कब ऐसा बोला मिस्टर?” भारत छोड़ो आंदोलन (1942) के दौरान विदेशी सामानों के बहिष्कार के समय महादेवी ने उसकी मदद के लिए कपड़े खरीदे थे, जिस पर एक खादी भक्त ने आक्षेप किया था।

भारतीय समाज की दरिद्रता पहाड़ों के कुलियों में भी दिखाई देती है। महादेवी वर्मा बद्रीनाथ व केदारनाथ की यात्रा पर जंग बहादुर और धनसिंह जैसे लोगों को रेखांकित करती हैं। कुली समाज पूरे साल में एक बार अच्छे पैसे की उम्मीद में मेहनत करता है, लेकिन बीमार पड़ने पर उन्हें बीच रास्ते में भाग्य पर छोड़ दिया जाता है। “बीमार कुली भाग्य पर छोड़ दिया जाता है। जीवित रहा, तो लौटकर दूसरा यात्री खोज लेता है, मर गया तो फेंक देने की सुविधा का अभाव नहीं।” यात्री अक्सर पैसे कम करने की सोचते हैं और कुलियों से पशुओं की तरह काम करवाते हैं।

ठाकुरी बाबा ग्रामीण क्षेत्र में कविताएँ गाते थे, लेकिन आधुनिक युग में ऐसे भाट–चारणों के अस्तित्व और उनके कवित्व के मूल्य को कोई नहीं समझता। महादेवी वर्मा का मानना है कि नए कवियों में श्रोताओं को विभोर करने की क्षमता उतनी नहीं थी जितनी ठकुरी बाबा में थी।

यह आलेख पिंकी चौहान ने लिखा है, वे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के भारतीय भाषा केंद्र में शोधार्थी रही हैं। 

संदर्भ

  • स्मृति की रेखाएँ : महादेवी वर्मा, लोकभारती प्रकाशन पेपरबैक्स, पृष्ठ संख्या-10
  • वही, पृष्ठ संख्या-11
  • वही, पृष्ठ सं-14
  • वही, पृष्ठ सं-19
  • वही, पृष्ठ सं-51
  • वही, पृष्ठ सं-87
  • वही, पृष्ठ सं-117
  • वही, पृष्ठ सं-128
  • वही, पृष्ठ सं-27
  • वही, पृष्ठ सं-34
  • वही, पृष्ठ सं-57
  • वही, पृष्ठ सं-62
  • वही, पृष्ठ सं-68

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