अर्चिता :
चित्रकला और साहित्य ख़ास तौर पर हिंदी कविता पर अगर हम ग़ौर करें तो कुछ कवियों के काव्य पर चित्रकला की छाप अनायास ही दिखाई देती है। जितना बड़ा फ़लक चित्रकला का है उसी प्रकार हिंदी काव्य में विस्तार की गुंजाइश रहती है। कवि और कवयित्रियों द्वारा शब्दों के माध्यम से जो दृ्श्य हमारे सामने प्रस्तुत होता है वह चित्रकला का नमूना ही है कि जब कल्पना करते हैं पक्षी उड़ रहा है, तो चित्रकार उस दृश्य को अपनी तूलिका से चत्रित कर साकार रूप प्रदान करते हैं, तो यह कहना अनुचित न होगा कि कविता और चित्रकला दोनों कहीं न कहीं एक भाव से पूरित हैं। बस एक में शब्दों की कल्पना है तो दूसरे में तूलिका के माध्यम से दृश्य का साकार होना।
हिंदी में यूं तो अनेक कवि व कवयित्रियों ने चित्रकला के आधारों को रंगों, ज्यामितीय आकृतियों, अनेक दृश्यों का वर्णन मिलता है। पर ‘महादेवी वर्मा’ (जो ख़ुद बहुत सुंदर चित्रकारी करती थीं) और मुक्तिबोध की कुछ चुनी हुई कविताओं में चित्रकला के समागम से दृश्यों का जो वर्णन हुआ है उनपर दृष्टि डालेंगे कि किस प्रकार दोनों कवि और कवयित्रियों में हमें चित्रकला का सफ़ल प्रयोग देखने को मिलता है। महादेवी वर्मा की कविताओं में प्राप्त होने वाले चित्रकला के तत्वों का उनकी कविताओं में समावेश कितनी ख़ूबसूरती से किया है ये देखेंगे। चित्रकला में अनेक तत्वों का प्रयोग किया जाता है। इन तत्वों के आधार पर ही चित्र को आकार प्रदान किया जाता है।
चित्रकला के अनेक रचनात्मक आधार चित्रकार के पास प्रस्तुत होते हैं जिससे कलाकार का चित्रण का सफ़ल कार्य करता है। चित्र में इन सभी तत्वों का समावेश होना ज़रूरी है ताकि बनाए गए चित्र की सुंदरता देखने में साफ़तौर पर उभर पर आए और वह आकर्षक लगे। किसी भी चित्रकार के लिए यह ज़रूरी है कि वह जो चित्र तैयार कर रहा है उसमें इन सभी तत्वों का समावेश अवश्य हो। चित्रकार चित्र बनाने में जिस कल्पनाशक्ति का प्रयाोग करता है उस कल्पनाशक्ति को सफ़ल बनाने में चित्रतल पर उसे चित्रित करने के लिए इन तत्वों का प्रयोग उचित प्रकार से उसे करना पड़ता है। यह तत्व निम्नवत हैं –
- बिंदु
- रेखा
- रंग
- तान
- रूप
- पोत
- अंतराल आदि
महादेवी की कविताओं में बिंदु का प्रयोग कुछ इस प्रकार से मिलता है। वो कहती हैं कि –
नील नभ का असीम विस्तार
अनल के धूमिल कण दो चार
(दीपशिखा, पृष्ठ: 168-170, भारती भंडार इलाहाबाद,1960)
महादेवी, बिंदु का प्रयोग विस्तार रूप से करती हैं। उनके द्वारा प्रयुक्त बिंदु नभ और अग्नि के केंद्र का प्रतीक बनकर हमारे सम्मुख प्रस्तुत होता है। इस बिंदु के संदर्भ में प्रोफेसर एम। एस। मावड़ी का कहना है, ‘ चित्रकला में बिंदु का महत्वपूर्ण स्थान है। बिंदु से ही किसी की रेखा को खींचा जाता है। कला में बिंदु का स्थान सर्वोच्च है। किसी भी कलाकृति का सृजन बिंदु के बिना असंभव है। पांचों ललित कलाओं में बिंदु का प्रमुख स्थान है’।
चित्रकला में जिस प्रकार बिंदु का महत्व होता है उसी प्रकार रेखा का भी अपना महत्व है। रेखाएं भी कई प्रकार की होती हैं। चाहे रेखा सीधी हो, समानांतर हो, वक्र हो या क्षैतिज आदि सभी का भिन्न-भिन्न प्रकार से चित्रकला के अँर्तगत प्रयोग होता है। महादेवी वर्मा रेखा का प्रयोग भी अपने शब्दों में माध्यम से विता में करती हैं। यथा-
चित्रित तू मैं हूं रेखा - क्रम
मधुर राग तू मैं स्वर संगम
तू असीम मैं सीमा का भ्रम
काया छाया में रहस्यमय
(यामा, पृष्ठ-147, भवति भंडार, इलाहाबाद, 1961)
रेखा के संदर्भ में एम।एस। मावड़ी कहते हैं कि- ‘रेखा कला का प्राचीनतम माध्यम है। रेखा सूक्ष्म गति से निर्देश करती है। कला में रेखा का प्रतीकात्मक महत्व है जो आकार की अभिव्यक्ति एवं गति अंकित करती है’।
चित्रकला में शून्य का अपना महत्व है। भारतीय दर्शन में भी। शून्य का महत्व बताया गया है। इसी प्रकार महादेवी वर्मा शून्य के लिए कहती हैं कि-
नि:स्व होंगे प्राण मेरा
शून्य उर होगा सवेरे;
राख हो उड़ जायगी यह
अग्निमय पहचान!
(दीपशिखा, पृष्ठ-133)
महादेवी वर्मा ने अपने काव्य में तूलिका का प्रयोग करते हुए कहा है कि-
स्निग्ध लौ की तूलिका से
आँक सबकी छाँह उज्ज्वल
(दीपशिखा, पृष्ठ-69-70)
‘तूलिका’ चित्रकारी का प्रमुख साधन है। अलग अलग तूलिका के प्रयोग से भिन्न भिन्न आकृति प्रदान की जाती है। चित्रकला में रंगों का प्रयोग चित्र को सौंदर्य प्रदान करता है। हर रंग का अपना पृथक महत्व है। जिस प्रकार काला रंग डर, अशांति, कालिमा, अंधकार आदि का प्रतीक है, वहीं सफ़ेद रंग शांति का, हरा रंग हरियाली, लाल रंग प्रेम, ओज तथा लाल ख़ून विभत्सता का प्रतीक है। पीला, नीला, गुलाबी आदि अनेक रंगों का अपना महत्व है। रंगो का प्रयोग तो मानव युगों युगों से करता आ रहा है। एम।एस। मावड़ी का मानना है कि- ‘रंग छाया – प्रकार पर निर्भर एक तत्व है। रंग का कोई आयाम भी नहीं है। और ना ही इसका कोई ठोस अस्तित्व है। रंग तो दर्शक के अक्ष-पटल पर पड़ने वाला चमत्कृत प्रभाव है।’
पर महादेवी वर्मा चित्र फलक पर अपने शब्दों के माध्यम से रंगों को बिखेरती हैं। वह कहती हैं कि यथा-
फूलन छिपी आई हंसी
करुण हूँ कि रंग छिपाएं हैं बादर
(यामा, पृष्ठ, 96)
महादेवी वर्मा चित्र के संदर्भ में अपनी बात को प्रस्तुत करती हैं और कहती हैं कि
प्रिय मैं जो चित्र बना पाती
चिरमुक्त तुम्हीं को जीवन के
बंधन हित विकल दिखा जाती
(दीपशिखा पृष्ठ, 137)
एक और उदाहरण प्रस्तुत है –
रंगमय है देवी दूरी
छू तुम्हें रह जाती-
यह चित्रमय क्रीड़ा अधूरी
(यामा, पृष्ठ, 131)
अत: यह कहना सही होगा कि महादेवी वर्मा एक कवयित्री होने के साथ ही एक अच्छी और सफ़ल चित्रकार भी थीं। जिसका सफ़ल उदाहरण उनका काव्य है और उस काव्य में चित्रकला के प्रमुख होने वाले तत्वों का समावेश है। जो यह सिद्ध करता है कि महादेवी वर्मा को चित्रकला का संपूर्ण ज्ञान था पर जिसका उन्होंने अपने काव्यों में प्रयोग किया और कविता और चित्रकला को जोड़ने का सफ़ल प्रयास किया।
मेरा रंग के लिए महादेवी वर्मा पर यह आलेख हिंदी साहित्य की शोध छात्रा अर्चिता ने लिखा है।