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‘रात में कविता’ : शुचि मिश्रा की कविताएं

हिंदी के समकालीन युवा कवियों में शुचि मिश्रा का स्वर अपनी विशिष्ट संवेदना, वैचारिक सजगता और विषय-विस्तार के कारण अलग पहचान बनाता है। उन्होंने कविता को केवल भावाभिव्यक्ति तक सीमित नहीं रखा है, बल्कि उसमें समाज, स्त्री-अनुभव, स्मृति, श्रम, विज्ञान और बदलते समय की जटिलताओं को भी समान गहराई से दर्ज किया है। उनकी भाषा में एक ओर लोक जीवन की मिट्टी की गंध है, तो दूसरी ओर बौद्धिक प्रश्नाकुलता और आधुनिक दृष्टि भी उपस्थित है। प्रस्तुत पाँच कविताएँ पाठकों को उनके रचना-संसार की विविध छवियों से परिचित कराती हैं।

शुचि मिश्रा

पृथ्वी झुकी है

कितने ही खरबों वर्ष से गतिशील है पृथ्वी
और कितने ही खरबों वर्ष रहेगी अस्तित्व में
अनंत आकाशगंगाओं में उपस्थित एक यह भी
कर रही परिक्रमा सूर्य की और घूम रही अपनी धुरी पर
जैसे घूम रहे अन्य ग्रह और उनके उपग्रह निरंतर
अपनी ही अकड़ में पौरुष वर्चस्व को रेखांकित करते

अकड़ नहीं पृथ्वी में, सहनशील और विनम्र वह
झुकी अपने अक्ष पर साढ़े तेईस अंश अक्षांश
यूँ तो मंगल और यूरेनस भी झुके हैं
किंतु झुकने से मिली ऋतुओं की सौगात सिर्फ पृथ्वी को
जीवन का होना संभव हो सका सिर्फ पृथ्वी पर
घिर-घिर आती बदली, आच्छादित होता है अंबर
ओढ़ लेती है पृथ्वी खुशी-खुशी हरी चूनर
महासागरों का दुपट्टा बना लहराती-इठलाती
हवाओं को साड़ी की तरह तन पर लपेटे रहती
करती विचरण गुप-चुप तीन सौ पैंसठ दिन
क्रोध में उगलती कभी-कभार अनिच्छाओं के ज्वालामुखी
और भूकंप को यथासंभव दबाए रखती रजस्वला होने तक

एकमात्र ‘पृथ्वी’ में ही है स्त्रैण का बोध
शेष सभी तो पुरुषोचित नाम ठहरे सौरमंडल में
सूर्य, बुध, शुक्र, मंगल, बृहस्पति, शनि, अरुण और वरुण
अपने पौरुष के चलते पसंद नहीं झुकना, विनम्र होना
कि पिद्दी प्लूटो को कर दिया गया ग्रहों की बिरादरी से बाहर

सहनशील बनी वह झेलती है भार, बोझ उठाते हुए
पृथ्वी झुकी है अपने अक्ष पर, झुकना सिखाते हुए।

ऋण-बोध

वह कोई महाकाव्य नहीं थी जिसे सस्वर पढ़ा जाता,
वह तो घर के पुराने संदूक में दबी एक मूक वसीयत थी।
विदाई के समय उसकी आँखों से आँसू नहीं, ‘ग्लानि’ बही थी,
क्योंकि उसे घुट्टी में ही मितव्ययिता का पाठ पढ़ाया गया था,
आँखों का पानी हो या पिता की पूँजी, व्यर्थ नहीं बहनी चाहिए।

उसके बटुए में मुद्रा से पहले हमेशा एक संचित संकोच भरा रहा,
उसे पता था कि उसकी हँसी, पिता के सम्मान की दहलीज़ लाँघ सकती है।
उसके कंधों पर उत्तरदायित्व, दुपट्टे की सिलवटों सा अस्थायी नहीं,
बल्कि किसी अदृश्य कूबड़ की तरह उसकी नियति थी।
बाज़ार के कौतुक और स्वप्नों के उत्तुंग बुर्जों के बीच,
उसने सदैव ‘न्यूनतम’ को ही अपना ‘श्रेष्ठतम’ माना।
उसने अपने फटे होंठों की दरारों को कभी किसी रंग से नहीं भरा,
क्योंकि उसे ज्ञात था कि महँगी साड़ियों का मोह और
अत्यधिक दीप्तिमान दिखने का अधिकार उसकी सीमाओं में नहीं था।

उसने कभी किसी रेस्तराँ की मेज़ पर अपनी क्लान्ति नहीं छोड़ी,
ना ही अट्टालिकाओं के काँच में अपने वजूद को ढूँढा।
ना ढेरों सखियाँ थीं, ना रक्ताभ गुलाबों से कोई नाता,
ना प्रेम-पत्र की स्याही में उसने स्वयं को घोला।
उसने हताशा की मूसलाधार वृष्टि में बार-बार भीगना स्वीकार किया,
किंतु ‘विद्रोह’ का सोपान कभी नहीं चढ़ी।
उसने आत्महत्या तक नहीं की, क्योंकि वह जानती थी
कि एक बोझ का मर जाना भी व्यवस्था पर एक नया बोझ ही होगा।

जब अज्ञात रास्तों पर चलने के लिए उसका हाथ सौंपा गया,
तो परंपराओं के सम्मुख वह एक ‘मौन समर्पण’ बनी रही।
आधी उम्र ससुराल की देहलियों को सौंपने के बाद,
जब वह ढलती दोपहर की भस्म जैसी धूप में बैठती है,
तो चाय की प्याली के धुएँ में उसे अपना चेहरा नहीं दिखता।
वहाँ आमोद-प्रमोद के दृश्य नहीं, ना उल्लास की कोई प्रतिध्वनि है,
वहाँ उभरती हैं माँ की घिसी हुई एड़ियाँ और पिता का पुरातन सन्नाटा।

उसने कभी नहीं चाहा कि उसका जन्म-दिवस एक उत्सव बने,
वह अस्तित्व से अधिक घर की ‘अपरिहार्य आवश्यकता’ बनना चाहती थी।
उसकी व्याधि की आहट तब तक किसी को सुनाई न दी,
जब तक कि उसकी देह एक जीर्ण-शीर्ण बिछौना न बन गई,
क्योंकि जिसे ‘भार’ होने का बोध विरासत में मिला हो,
वह अपनी व्यथा से दूसरों के मन को बोझिल कैसे कर सकती थी?

उसने मन के हारे हार मान ली थी,
क्योंकि उसकी विजय की परिभाषा ही स्वयं का ‘विलय’ था।
वे स्त्रियाँ जो आज भी जीवित हैं पर जीती नहीं,
वे उस सामाजिक रिक्तता की ही उपज हैं,
जहाँ एक बेटी को घर का ‘उपहार’ नहीं,
बल्कि एक दीर्घकालिक ‘उधार’ की तरह पाला गया।

आग

बताते थे बुजुर्ग कुछ ऐसे-ऐसे
आग नहीं बुझती थी चूल्हे में
पकती थी रसोई
एक ही चिंगारी से सुलगी
आग से

होलिका दहन के बाद लाई गई आग
बुझती नहीं थी घरों में
महीनों-महीनों और कतिपय वर्षों तक

दोपहर का भोजन बन जाता था
पूर्वाह्न या मध्याह्न तक
फिर दबा दी जाती थी राख में
गोबर के उपलों के संग
यूँ राख भी आग का जीवन जीती

सर्दियों में उबलता रहता चूल्हों पर पानी
रंगरेज उबालते थे कड़ाहों में रंग
हलवाई औंटाते मावा, बतासे का घोल
लोहार की धौंकनी चलती रहती अहर्निश

आग ठंडी नहीं होती किसी भी स्थिति में
गर हो भी जाए किसी घर में तो
बड़े मनुहार से माँगी और दी जाती सम्मान से
सुलगती लकड़ी की कोर पर, छिलपे पर रख
अंगार का टुकड़ा जतन से धर कर दीये में

कथा-भागवत हवन के मौकों पर
जब पात्र में रख लाती कन्याएँ आग
तब जजमान दक्षिणा दे चरण स्पर्श अवश्य करता

आग इन छोटे-छोटे जतनों से चल
जीवन में आ कुछ यूँ समा जाती
कि आँधी-अंधड़, सर्दी-बरसात
ठंडा नहीं कर पाती समयचक्र

आग को जीवन की तरह
अब याद करते हैं बुजुर्ग
और एक ठंडी आह लेकर चुप रह जाते हैं
कि गाँव में नहीं रहा पहले जैसा जीवन
नहीं सहेजी जाती अब चूल्हों में आग
जीवन और प्रतिरोध के लिए
अब कहाँ बची है सीने में भी पहले जैसी वह!

छीज रहे

कोमल हाथों में
दो सलाइयाँ नहीं हैं
खरगोश की तरह
बिदकता ऊन का गोला
दिनचर्या से बाहर हुआ
जैसे हिस्सा ही न था कभी
कलाओं का, स्त्री गुणों का

टूटी हुई बटन
और काँच की प्रतीक्षा
नहीं दीखती ज्यों
दोपहर रीत जाती है
छोटे-छोटे नेह भरे कामों के बगैर
साँझ आती दबे पाँव
बिल्ली सी चपल-चौकन्नी
अपनी चमकदार आँखों से प्रहार करती

थका-हारा लौटता है
एक मन घर की ओर
दूसरा भागता शहर की सड़कों पर
या कि पार्टियों में
और कुछ नहीं तो फेसबुक या वॉट्सऐप की
अलहदा आभासी दुनिया में

दहलीज पर
शाम ढले दस्तक देता है
सास-बहू का बोझिल ख़तरनाक सीरियल

प्रेम और सुख जीवन से
छीज रहे हैं दिन-ब-दिन।

रात में कविता

दीये की तरह रात भर जगमगाती रही कविता – तुम इसे मशाल भी कह सकते हो!
रात के बारे में जितनी भयावह बातें सुनी थीं वे सब झूठ साबित हुईं, सच का चोला न पहन सकीं किंवदंतियाँ कि रात उतनी भारी न थी और अंधेरा भी स्याह।

सन्नाटा नहीं था, स्तब्ध कुछ न कुछ बतियाता था, याद दिलाता था वह भवानी प्रसाद मिश्र की – ‘मैं सन्नाटा हूँ फिर भी बोल रहा हूँ’
एक कविता ही थी संग मेरे कि कब गुज़र गई रात पता ही न चला

अंधेरी रात के बरक्स एक जुगनू ही काफ़ी था
मैंने जुगनू पर लिखी कविता एक भयावह अंधेरी रात में!

जौनपुर, उत्तर प्रदेश के एक कस्बे मितावाँ में 20 अक्टूबर 1995 को जन्म। हिंदी में स्नातकोत्तर डिग्री हासिल की। हिन्दी साहित्य में शोधरत। एक कविता संग्रह 'पृथ्वी झुकी है' तथा विज्ञान कविताओं की पुस्तिका 'प्रिज्म' प्रकाशित। साक्षात्कार, वागर्थ, बहुमत, युग तेवर, अट्टहास, आकंठ, दुनिया इन दिनों, विज्ञान प्रगति, इलेक्ट्रॉनिकी आपके लिए सहित महत्वपूर्ण सभी पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। 'समकालीन हिन्दी विज्ञान कविता संचयन' तथा 'विज्ञान कविता कोश' में रचनाएँ सम्मिलित। 'विश्वरंग' महोत्सव के साथ ही अन्य साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी। साहित्य के अतिरिक्त विज्ञान में गहरी रुचि के चलते अल्बर्ट आइंस्टाइन, जगदीश चंद्र बसु और सत्यनाथ बोस पर लेखन कार्य। 'पृथ्वी झुकी है' कविता पर सिंगापुर स्थित संस्थान का 'कविताई' पुरस्कार और इलेक्ट्रॉनिकी आपके लिए, रवींद्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय का 'युवा विज्ञान कविता पुरस्कार' प्राप्त। उनसे ईमेल shuchimishra205633@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

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