जेंडर विमर्श

दूसरों को परखने से पहले उन्हें महसूस करना सीखें

मानसिक स्वास्थ्य और संवेदनशीलता को लेकर हमारा समाज अब भी अनेक पूर्वाग्रहों से घिरा हुआ है। हम अक्सर किसी व्यक्ति के व्यवहार को देखकर तुरंत निर्णय सुना देते हैं, बिना यह समझे कि उसके भीतर कितने संघर्ष, अनुभव और अनकहे घाव छिपे हो सकते हैं। यह लेख इसी प्रवृत्ति पर प्रश्न उठाता है और बताता है कि हर मनुष्य का मन, उसकी सहनशीलता, उसकी भावनात्मक संरचना और जीवन-यात्रा अलग होती है। किसी को बदलने से अधिक आवश्यक है उसे समझना, उसके साथ खड़ा रहना और संवाद की वह जगह बनाना जहाँ मनुष्य स्वयं को अकेला न महसूस करे। संवेदना, स्वीकार और मानवीय उपस्थिति- यही इस लेख का मूल स्वर है।

निष्ठा अभिजित अग्निहोत्री

एक मानसिक रोगी या किसी अति संवेदनशील व्यक्ति को बरतना थोड़ा मुश्किल होता है। हम बहुत आसानी से बिना किसी को अच्छी तरह से जाने (कभी-कभी जानते हुए भी) जज कर लेते हैं, उसको अपनी कसौटी पर खरा उतारने की कोशिश करते हैं। एक-दूसरे से, एक-दूसरे की गॉसिप करते हैं और इसको ही अपना ‘डोपामीन डीटॉक्स’ समझते हैं, जबकि डोपामीन डीटॉक्स करने के बहुत सारे दूसरे रास्ते भी हो सकते हैं… जैसे- किताबें पढ़ना, गाने सुनना, स्केच करना, क्ले आर्ट करना या फिर कुछ भी नया रचनात्मक सीखना।

हमारे समाज में मस्तिष्क पर लगी चोट को कम महत्व दिया जाता है, जबकि कई मनोवैज्ञानिक यह बताते हैं कि शरीर में पनपने वाली बहुत-सी बीमारियों का सीधा संबंध मस्तिष्क से होता है। मानसिक रोगों के विभिन्न स्वरूप हैं। एक मानसिक रोगी अपने मस्तिष्क असंतुलन के प्रथम चरण में पागल नहीं हो जाता, बल्कि बहुत समय तक मन के संभल जाने की गुंजाइश बची रहती है। बस समय रहते इसे समझना और इस पर काम करना आवश्यक है। और इन सभी बातों के बीच अपनों का साथ होना हमेशा आवश्यक होता है।

यदि आप किसी भी व्यक्ति को जज कर रहे हैं, उससे ईर्ष्या रखते हैं, तो एक मिनट के लिए रुककर दुनिया को उसी इंसान के परिप्रेक्ष्य से देखने की कोशिश कीजिए। और यदि ऐसा नहीं कर सकते हैं, तो बहुत अच्छा है कि आप उससे बात ही मत कीजिए। किसी ने नहीं कहा है कि आपको सबसे बनाकर, निभाकर रखना आवश्यक है। लेकिन यदि किसी से बनाकर रखने का फैसला किया है, तो उस व्यक्ति का अच्छा और बुरा—दोनों समय आपके लिए महत्वपूर्ण होना चाहिए।

यहाँ उदाहरण के तौर पर बहुत पहले सुने हुए किस्से का ज़िक्र करना चाहूँगी-

“एक बार की बात है, एक व्यक्ति को अपने गाँव की नदी किनारे बहुत बड़ा-सा घड़ा मिलता है, जिस पर चौड़े मुँह का नलका लगा होता है। उसे लगता है, अवश्य ही इसमें ख़ज़ाना छिपा होगा। वह घड़ा अपने साथ अपने घर ले आता है। घड़ा ऊपर से अभेद्य होता है, लेकिन जब वह नलके का मुँह खोलता है, तो सबसे पहले कंकड़-पत्थर निकलते हैं। व्यक्ति बहुत उदास होता है, लेकिन उम्मीद नहीं छोड़ता। कुछ दिन बाद वह फिर से घड़े का नलका खोलता है। इस बार उसमें से चावल निकलते हैं। व्यक्ति यह सोचकर चैन की साँस लेता है कि चलो, कुछ ज़रूरत का सामान मिला। उस दिन व्यक्ति यह सोचकर प्रसन्न भी होता है कि हो सकता है नीचे कंकड़-पत्थर बैठ गए होंगे, लेकिन अब जितनी बार घड़े का नलका खुलेगा, उसे हर बार चावल ही मिलेंगे। लेकिन अगली बार जब वह नलका खोलता है, तो उसमें से सोने के बहुत सारे सिक्के निकलने लगते हैं। अब तो उसकी खुशी का कोई ठिकाना ही नहीं रहता। वह समझ नहीं पाता कि अचानक हुई आय को कैसे संभाले। वह नया घर खरीदता है, नई गाड़ी खरीदता है। और कुछ ही दिनों में उसके सारे सिक्के समाप्त हो जाते हैं। वह एक बार फिर नलके के पास पहुँचता है, खुशी-खुशी उसको खोलता है, लेकिन इस बार उसे पुनः कंकड़-पत्थर मिलते हैं।

इस घटना के कुछ समय बाद व्यक्ति के मित्र को भी वैसा ही एक घड़ा मिलता है, लेकिन उसको पहली बार में ही सोने के सिक्के प्राप्त हो जाते हैं। तो इस कहानी को कहने का आशय केवल इतना है कि हर व्यक्ति का जीवन अलग है और हर व्यक्ति का कर्म अलग है। सबको अपने कर्म और समय के हिसाब का फल प्राप्त होता है। अतः किसी को भी अपनी कसौटी पर रखकर नहीं तोलना चाहिए।

यहाँ मैं एक बेहद प्रभावशाली व्यक्तित्व की धनी लेखिका सुष्मा गुप्ता की लिखी कुछ बातों को दोहरा रही हूँ…

“हर इंसान का nervous system अलग होता है। हर किसी का pain threshold अलग होता है। हर किसी की processing capacity अलग होती है। कुछ लोग चीज़ों को सतह पर जीते हैं, कुछ लोग उन्हें गहराई में महसूस करते हैं। और गहराई में महसूस करना कोई कमी नहीं है, ये एक अलग तरह की wiring है। लोग ‘प्रैक्टिकल’ होने के नाम पर empathy खो देते हैं, लेकिन बिना संवेदना के प्रैक्टिकल होना सिर्फ ठंडा होना है, समझदार होना नहीं।

किसी struggling इंसान को सलाह नहीं चाहिए होती, analysis नहीं चाहिए होता, comparison नहीं चाहिए होता। उसे जो चाहिए होता है, वह है बिना ‘एहसान’ की presence, एक छोटा-सा validation और एक भरोसेमंद संकेत कि ‘तुम अकेले नहीं हो।’ और उसे चाहिए होता है एक सुनने वाला कान, एक समझने वाली नज़र, एक कंधा, जिस पर वह कुछ देर टिक सके। कई बार सिर्फ इतना कहना—

‘मैं हूँ, और ये वक्त भी निकल जाएगा।’

किसी को टूटने से बचा सकता है।

आप इस शब्द को बहुत आसानी से इस्तेमाल करते हैं—फलाँ तो ‘ओवरथिंकर’ है (या फलाँ में कितनी कमियाँ हैं), जैसे ये कोई हल्की-फुल्की आदत हो, या एक मज़ाक!

लेकिन जिन लोगों के लिए ये शब्द कहा जाता है, उनके लिए ये मज़ाक नहीं होता, ये एक बोझ होता है। क्योंकि ओवरथिंकिंग सिर्फ ‘ज़्यादा सोचना’ नहीं होती, ये उस दिमाग की कोशिश होती है, जो हर स्थिति को समझकर खुद को सुरक्षित रखना चाहता है। ये उस दिल की प्रतिक्रिया होती है, जो हर चीज़ को गहराई से महसूस करता है।

क्या ही विडंबना है—
‘जितनी हल्की ज़ुबान से शब्द निकाले जाते हैं,
वो सामने वाले के दिल पर उतने ही भारी पड़ते हैं।’

हम अक्सर लोगों को उनके एक व्यवहार से परिभाषित कर देते हैं, बिना यह जाने कि उसके पीछे कितनी कहानियाँ छिपी हैं। किसी का शांत रहना, किसी का ज़्यादा सोचना, किसी का जल्दी आहत हो जाना… सबका कुछ-न-कुछ कारण होता है। हर इंसान की अपनी एक पृष्ठभूमि होती है, अपने अनुभव होते हैं, अपने डर और अपने घाव होते हैं।

लेकिन हम क्या करते हैं?
हम जल्दी जज कर देते हैं।

हम अपने ‘प्रैक्टिकल’ होने का तमगा लेकर दूसरों की संवेदनाओं को अस्वीकृत कर देते हैं। हमें लगता है कि हम मजबूत हैं, और सामने वाला कमज़ोर। और समस्या तब शुरू होती है, जब हम किसी को उसकी अपनी ‘प्रकृति’ के लिए छोटा महसूस कराने लगते हैं।

हम अक्सर सोचते हैं कि हमें लोगों को ठीक करना है, उन्हें बदलना है। लेकिन हर बार किसी को ठीक करने की ज़रूरत नहीं होती, कभी-कभी सिर्फ़ उसके साथ खड़े रहने की ज़रूरत होती है।

संवेदनशील और भावुक होना उस इंसान की निशानी है, जो महसूस कर सकता है, जो दूसरों के दर्द को समझ सकता है, और जो इस दुनिया को थोड़ा और मानवीय बना सकता है। यह कोई कमज़ोरी नहीं…”

मैंने बहुत-सी किताबों में पढ़ा है कि हमारा जन्म केवल अपनी बौद्धिक क्षमता का विस्तार और अपनी आत्मा का विकास करने के लिए हुआ है। हम भले अपने दिन का मात्र एक प्रतिशत इस बात को समझने और इसका पालन करने की कोशिश करने के लिए दे रहे हों, बस इसको नियमित रूप से प्रैक्टिस में लाना आवश्यक है। इससे हमको बहुत कुछ नया सीखने को मिलेगा और हम पुराना सीखा हुआ बहुत कुछ unlearn भी कर पाएँगे… जैसे—

हम समझेंगे—“मज़ाक करने और मज़ाक उड़ाने का अंतर।”
हम समझेंगे—“किसी का हाल-चाल पूछने पर सामने वाला ‘मैं ठीक हूँ’ की जगह जब कभी ‘मैं ठीक नहीं हूँ’ कहे, तो उस बात और व्यक्ति को समझने के लिए खुद को तैयार करना।”
हम तोड़ पाएँगे—“स्वयं को सर्वश्रेष्ठ और दूसरे को तुच्छ समझने का भ्रम।”

और अब अंत में इस लिखे को अर्थ देने के एक छोटे-से प्रयास में निर्मल वर्मा के इन कथनों से अपने लिखे को विराम दूँगी…

अर्थपूर्ण संवाद की पहली शर्त है ‘पहचान’, जो प्रेम से उत्पन्न होती है। इसके लिए अनिवार्यतः तीन सीढ़ियाँ पार करनी पड़ती हैं- दुनिया को पहचानना, उस पहचान से अपने को जानना, उस जानने को दूसरों में परखना। इन तीनों सोपानों में मनुष्य का कर्म बराबर मौजूद रहता है, जिसके सहारे मनुष्य अपने को अधिक स्पष्ट रूप से जान सके, अपने आस-पास के सौंदर्य के प्रति कृतज्ञ हो सके, अपने श्रम में अपनी आत्मा की उपलब्धि पा सके। जब मनुष्य और मनुष्य में संवाद की संभावनाएँ झूठ, हिंसा और आतंक के अंधेरे में डूबती हुई-सी जान पड़ती हैं, तब भी मनुष्य का होना एक अकेले दिए-सा टिमटिमाता रहता है। वही दिया कुछ और न होकर मानव कर्म है…
निर्मल वर्मा की कहानी से

मनुष्य के बोध की जो शक्ति है, वह जब तक विकसित नहीं होती, तब तक समुद्र, आकाश, पर्वत आदि के रंगों के बारे में हमारा ज्ञान बहुत ही सीमित होगा। मनुष्य के शरीर का विकास एक जगह रुक जाता है, लेकिन इसके देखने, समझने और अनुभव करने की शक्तियाँ बराबर विकसित होती रहती हैं। साहित्य के भीतर हम इस विकास की प्रक्रिया को जितनी सघनता से देख पाते हैं, उतना कहीं और नहीं।
संकलन ‘संसार में निर्मल वर्मा’ से

मेरा नाम निष्ठा अभिजित अग्निहोत्री है। मैं बनारस से हूँ लेकिन फिलहाल सपनों की नगरी मुंबई में रहती हूँ। और अपने सपनों को पूरा करते हुए थोड़ा बहुत लिखती पढ़ती रहती हूँ । यहाँ बनारस को याद करते हुए 'व्योमेश शुक्ल' जी का लिखा दोहराऊँगी... "बनारस मेरे लिए वह है जो मेरी हड्डियों में बसता है।"

मैंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातक और महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ वाराणसी से मास कम्यूनिकेशन में स्नातकोत्तर की पढ़ाई की है। किताबें मुझे बचपन से आकर्षित किया करती थीं। रस्किन बॉन्ड कृत 'रस्टी के कारनामे' मेरे द्वारा पढ़ी गई पहली किताब थी। मुझे हिन्दी तथा अंग्रेजी भाषाओं की किताबें पढ़ना पसंद है । इसके साथ ही सेल्फ हेल्प की किताबें भी मुझे बेहद आकर्षित करती हैं। मैंने लिखना तीन साल पहले शुरू किया और मेरा मानना है कि लेखन एक ऐसी प्रक्रिया है जो पूरी तरह से आपके पढ़ने और सीखने पर निर्भर करती है। व्यक्ति जितना अधिक समय अपने पठन-पाठन को देता है उतना ही उसके मस्तिष्क का विकास होता है और उसकी लेखनी भी मजबूत होती जाती है ।

How did this make you feel?
🌸
Stay in the loop

Get the latest stories on women's rights in India — straight to your inbox.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Share via
Copy link