पायल भारद्वाज की ‘छितरा हुआ प्रेम’ और अन्य कविताएं
पायल भारद्वाज
पायल भारद्वाज की कविताएँ हमारे समय की स्त्री-अनुभूतियों, सामाजिक असमानताओं और भीतर दबे प्रतिरोध की कविताएँ हैं। वे बहुत सहज और सीधी भाषा में उन सवालों को सामने लाती हैं जिन पर समाज अक्सर चुप रहना पसंद करता है। ‘दोष’, ‘नाक’ और ‘बेटी का तेरहवाँ साल’ जैसी कविताएँ स्त्री जीवन के भीतर मौजूद भय, नियंत्रण, अपराधबोध और सामाजिक दबावों को बेहद मार्मिक ढंग से उजागर करती हैं।
उनकी कविताओं में प्रतिरोध केवल विचार नहीं, बल्कि जीने की शर्त बनकर उपस्थित होता है। साथ ही ‘छितरा हुआ प्रेम’ जैसी कविताएँ यह भी दिखाती हैं कि पायल भारद्वाज मानवीय संबंधों, प्रेम, अकेलेपन और आत्मिक टूटन को भी गहरी संवेदना के साथ अभिव्यक्त करती हैं। समकालीन हिन्दी कविता में उनकी आवाज़ इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वे जीवन के साधारण अनुभवों से बड़े सामाजिक और मानवीय प्रश्नों को रचती हैं।
दोष
लड़का अन्तर्वासना पढ़ रहा था,
लड़की आसारामायण।
लड़का सीख रहा था संभोग के प्रयोग,
लड़की रोटी के किनारे पतले करने की कला।
लड़का शरीर के सुख का विज्ञान जान रहा था,
और लड़की गर्भ ठहरने, न ठहरने का।
लड़का गुन रहा था ‘ना’ न सुनना,
लड़की ‘ना’ न कहना।
लड़की रोते हुए पूछ रही है-
“शरीर के पश्च भाग से संभोग कौन करता है?”
वह जानना चाहती है-
“यह सामान्य है या असामान्य?”
वह जानना चाहती है-
पति को ख़ुश रखना,
चूंकि पत्नी की सामान्यता है।
और पति की इच्छा में असामान्य कुछ भी नहीं,
सो इस सामान्यता में अक्षम रहना
कहीं उसी का तो दोष नहीं?”
मुझे लड़की से कहना है-
ज़रूरी यह जानना नहीं
कि कौन करता है,
ज़रूरी यह जानना है
कि तुम्हें करना है या नहीं।
मुझे लड़की से कहना है-
अक्षमता दोष नहीं है,
दोष है ज़बरदस्ती की सक्षमता को ढोना।
नाक
वे अब लड़कियों के प्रति थोड़े उदार बन गए थे।
यह थोड़ी उदारता प्रचलन में थी,
आधुनिकता और अभिजात्यता की परिचायक भी।
वे कभी सिर उठाकर कहते,
कभी सिर झुकाकर,
कभी आँखें दिखाकर,
और कभी पनीली आँखें लिए
वे बार-बार कहते-
“देखो, तुम्हें पढ़ा रहे हैं,
मनचाहा सब दिला रहे हैं,
पूरी छूट दे रहे हैं।
ध्यान रखना,
नाक मत कटाना हमारी!”
लड़कियाँ कृतज्ञता के भाव से भर जातीं,
स्वयं को भाग्यशाली मानकर
फूली न समातीं।
वे नाक की रक्षक बन जातीं,
एकदम चुस्त और मुस्तैद।
वे जहाँ जातीं, नाक उनके आगे चलती।
जो करतीं, नाक की उन्नति और बेहतरी के लिए करतीं।
न दाएँ देखतीं, न बाएँ।
वे नाक की सीध में देखतीं।
सोते, जागते, उठते, बैठते
उन्हें केवल नाक दिखाई देती-
चारों ओर दूर-दूर तक फैली
ऑक्टोपस-सी लिजलिजी नाक।
एक दिन लड़कियाँ
नाक के नीचे दबकर मर जातीं,
बिना यह जाने कि किसी की नाक से कहीं अधिक मूल्यवान थे
उनके अपने स्वप्न,
अमूल्य था जीवन।
बिना यह जाने कि स्वतंत्रता नहीं, केवल सुविधानुसार
ढील दी गई थी उन्हें।
बँधी वे खूँटे से ही थीं।
वे रस्सी तोड़ सकती थीं,
खूँटा उखाड़ सकती थीं,
और यह अपराध बिल्कुल नहीं था।
बेटी का तेरहवाँ साल
यह तुम्हारी उम्र का वही साल है
जिसमें छूट जाता है
ज़्यादातर लड़कियों का बचपन।
शुरू होती है जिसमें
असहजता में सहज रहने और दिखने की ट्रेनिंग,
होता है दर्द के साथ गठबंधन।
इसी साल में तो…
एक अजनबी, असह्य पीड़ा
आकर बैठ गई थी
मेरे पेड़ू में,
किराया वसूलने आए
किसी खड़ूस, निर्दयी मकान-मालिक की तरह।
और माँ ने कहा था-
“तारीख़ याद रखना,
यह हर महीने आएगी।”
यह तुम्हारा वही साल है, मेरी बच्ची!
आजकल ज़रा-सी गुड़गुड़ भी होती है तुम्हारे पेट में
तो मेरा दिल बैठ जाता है।
असहजता
जिस वक़्त भी
सहजता से जीने का
निर्णय करने लगती हूँ,
प्रधानमंत्री निर्ममता से हँसने लगता है
देश की बदहाली पर।
मुख्यमंत्री ज़हर उगलता है,
एक महिला मंत्री विद्यार्थियों को कोसती नज़र आ जाती है।
दुनिया की दौड़ में पिछड़कर दम तोड़ देता है
एक थका-माँदा लड़का।
एक नशे का आदी बेरोज़गार
भाँग की हरी पत्तियाँ रगड़ता है
और अपनी पत्नी को पीट देता है।
शराब पीकर घर लौटा पति।
ठीक उसी वक़्त,
जब मैं देखने की कोशिश करती हूँ
सूरज की लालिमा,
बसंत की बयार
और किसी प्रेम कविता का लालित्य,
एक स्त्री का बलात्कार कर दिया जाता है।
एकमात्र उपाय
यह दुनिया तुम्हारे हिसाब से नहीं बनी।
यहाँ कोई देस नहीं तुम्हारे लिए।
जहाँ भी जाओगी, हाँकी जाओगी
भेड़-बकरियों की तरह।
पैरों में बेड़ी, गले में रस्सी डालकर
वे हर संभव कोशिश करेंगे तुम्हें नाथने की।
भागना हल नहीं है।
भागना नहीं है तुम्हें।
घुटने टेककर मिमियाना भी नहीं है।
न मारना है, न मरना है।
मर-मरकर जीना तो बिल्कुल नहीं है।
लड़ना एकमात्र उपाय है
उत्तरजीविता के इस संघर्ष में।
यह याद रखते हुए
कि तुम आधी आबादी हो
और पूरी मनुष्य।
जहाँ हो, वहाँ रहकर लड़ो।
हर व्यवस्था, हर रीत-रिवाज,
हर वाहियात सोच से
सीना ठोककर लड़ो।
लड़ो कि जीवन युद्धक्षेत्र है।
उठो, उठकर नाप लो
अपने हक़ की ज़मीन,
अपने मन की ख़ुशी
और मुट्ठी भर आसमान।
विद्रूपताओं के विरुद्ध
जिन्होंने आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाई,
उनसे रिश्ते निभाने हैं।
जिन्होंने तिरस्कृत किया प्रेम,
उनसे प्रेम करते रहना है।
जिन्होंने छीन लिए सारे राग-रंग,
उनके जीवन को राग-रंगों से भरना है।
जहाँ ठुकरा दी जाती हैं योग्यताएँ,
वहाँ अपने होने का साक्ष्य देते रहना है।
जिनकी अपनी कोई सोच नहीं,
उनके बीच अपनी सोच को ज़िंदा रखना है।
जिन्हें आवाज़ भी नहीं पसंद,
उन्हें देश और दुनिया की अगुआई करते देखना है।
कितनी विद्रूपताओं से भरा है यह जीवन!
ऐसे जीवन को क्या जीना,
और मरने से क्या डरना।
आओ मेरे विरोधियो,
मार डालो मुझे।
मैं तुम सब के
ख़िलाफ़ मोर्चा खोलती हूँ!
छितरा हुआ प्रेम
तुम्हें निपट अकेले आना था,
जैसे आता है एक सद्यजन्मा शिशु।
परन्तु तुम आए दायित्वों और चिंताओं के साथ,
भय, निंदा, अपयश जैसी तमाम दुनियादारियों के
कड़े और भारी लिफाफे में इस तरह पैक्ड,
कि चरमरा गए मुझ तक पहुँचते-पहुँचते।
और मुझे मिले,
जहाँ-तहाँ से फटी केंचुली की भाँति,
केवल तुम्हारे अवशेष।
मुझे मिले छितरे हुए
प, र, ए और म।
जिन्हें जोड़-समेटकर
तुम्हें साकार रूप देने की कोशिश की मैंने।
यह भूलकर कि तर्क और युक्ति
बुद्धि को संतुष्ट कर सकते हैं,
आत्मा को नहीं।
यह भूलकर कि प्रेम बौद्धिकता की नहीं,
आत्मीयता की विषयवस्तु है।
तो आश्चर्य कैसा!
यदि आज पुनः छितरे पड़े हैं तुम्हारे अवशेष,
और तालियाँ बजाकर अट्टहास कर रही है मेरी आत्मा।
पायल भारद्वाज का जन्म 26 अगस्त 1987 को हुआ। उन्होंने वाणिज्य एवं हिन्दी साहित्य में परास्नातक किया है। वर्तमान में वे खुर्जा, उत्तर प्रदेश में निवास करती हैं। उनकी कविताएँ तेरहवें द्वादश में संकलित हैं तथा वागर्थ, समकालीन जनमत, कृति बहुमत, समावर्तन, सदानीरा, हिंदवी, स्त्री दर्पण, अनहद कोलकाता आदि प्रतिष्ठित पत्रिकाओं और वेब पोर्टलों पर प्रकाशित हो चुकी हैं।
सम्पर्क : payalbhardwajsharma1987@gmail.com
