घर से खेत तक : महिलाओं का वह श्रम जिसे कभी काम नहीं माना गया
नव्या सिंह
“औरतें काम में कभी पीछे नहीं रहीं, बस उनका काम कभी गिनती में नहीं आया।”
‘महिलाओं को कार्यक्षेत्र में लाना’ – यह वाक्य अपने भीतर एक बड़ी भूल छिपाए हुए है। क्योंकि सच यह है कि महिलाएँ हमेशा से काम करती रही हैं।
आधुनिक दफ़्तरों, कॉरपोरेट नौकरियों और औपचारिक रोजगार व्यवस्था के बनने से बहुत पहले भी महिलाएँ खेतों में काम कर रही थीं, बीज बचा रही थीं, पानी ढो रही थीं, परिवार संभाल रही थीं, वस्तुओं का व्यापार कर रही थीं, कपड़े बुन रही थीं, लोगों का इलाज कर रही थीं और स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को जीवित रखे हुए थीं।
मेसोपोटामिया और सिंधु घाटी जैसी प्राचीन सभ्यताओं से लेकर गाँवों, जंगलों, मछुआरा बस्तियों, फैक्ट्रियों और शहरों के बाज़ारों तक — महिलाएँ हमेशा उन व्यवस्थाओं का हिस्सा रही हैं जिन पर समाज टिका हुआ है। फर्क सिर्फ इतना है कि उनके इस श्रम को कभी ठीक से गिना नहीं गया, बराबरी का मेहनताना नहीं मिला और न ही उसे वह सम्मान मिला जिसका वह हकदार था। लेकिन सदियों से समाज और अर्थव्यवस्था दोनों ही महिलाओं के इसी श्रम पर टिके रहे हैं।
और अगर ध्यान से देखें तो एक और बात साफ दिखाई देती है – महिलाएँ ‘क्लाइमेट वर्क’ यानी जलवायु से जुड़ा काम बहुत पहले से करती रही हैं, तब भी जब दुनिया ने इसे ‘क्लाइमेट एक्शन’ कहना शुरू नहीं किया था। भारत में महिलाएँ लंबे समय से हथकरघा, खाद्य प्रसंस्करण, जंगलों से संसाधन जुटाने, मछली पालन, पशुपालन, मिट्टी के काम और छोटे अनौपचारिक व्यापारों के जरिए अदृश्य आर्थिक व्यवस्था को संभालती रही हैं।
इतिहास के बड़े बदलाव भी महिलाओं के श्रम के बिना संभव नहीं थे।
औद्योगिक क्रांति के दौरान महिलाएँ फैक्ट्रियों और कपड़ा मिलों में काम कर रही थीं, जबकि घर और परिवार की जिम्मेदारियाँ भी उन्हीं के कंधों पर थीं। दोनों विश्व युद्धों के समय महिलाएँ परिवहन, निर्माण, स्वास्थ्य सेवा और सप्लाई सिस्टम का हिस्सा बनीं, क्योंकि अर्थव्यवस्थाएँ उनके बिना चल ही नहीं सकती थीं। लेकिन हर संकट के बाद समाज ने पुनर्निर्माण का जश्न तो मनाया, मगर उन महिलाओं को लगभग भूल गया जिन्होंने उस पुनर्निर्माण को संभव बनाया।
यह पैटर्न आज भी जारी है।
कूड़ा बीनने वाली महिलाएँ चुपचाप हमारे शहरों को साफ रखती हैं। वे उस कचरे को इकट्ठा करती हैं, अलग करती हैं और रिसायकल करती हैं जिसे हम देखना तक नहीं चाहते। शहर जिन चीजों को फेंक देते हैं, वे उन्हीं में से उपयोगी चीजें वापस निकालती हैं। कई विकासशील देशों में कचरा प्रबंधन व्यवस्था उनके बिना चल ही नहीं सकती।
फूल बेचने वाली महिलाएँ, छोटे व्यवसाय चलाने वाली महिलाएँ, किसान महिलाएँ, आशा वर्कर, नर्सें और मछुआरा समुदायों से जुड़ी महिलाएँ – ये सभी अलग-अलग तरह के आर्थिक, सामाजिक और जलवायु संकटों का सामना करती हैं, लेकिन फिर भी समाज के सबसे जरूरी हिस्सों को संभाले रखती हैं।
यही वह अदृश्य श्रम है जो रोजमर्रा के झटकों को अपने भीतर समेट लेता है। यह कोई “दूसरे दर्जे” का काम नहीं है। यही वह काम है जो समाज को चलाए रखता है। लेकिन समस्या यह है कि हमारी अर्थव्यवस्थाएँ अक्सर उसी काम को महत्व देती हैं जिसे औपचारिक रूप से मापा जा सके, जबकि असल में सबसे जरूरी काम वही होते हैं जो अनगिनत और अदृश्य रह जाते हैं।
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) और UN Women जैसी संस्थाओं के अनुसार आज भी दुनिया भर में बिना वेतन वाले देखभाल संबंधी कामों का अधिकांश हिस्सा महिलाएँ ही करती हैं, जबकि यह श्रम समाज और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए बेहद जरूरी है। लेकिन महिलाएँ केवल अर्थव्यवस्था ही नहीं संभालतीं, वे संस्कृति को भी बचाए रखती हैं।
गीत, परंपराएँ, रेसिपी, लोककथाएँ, भाषाएँ, खेती के तरीके और स्थानीय ज्ञान — ये सब इसलिए बचे हुए हैं क्योंकि कोई इन्हें लगातार आगे बढ़ाता रहा है। कोई त्योहार इसलिए जीवित रहता है क्योंकि कोई उसके पीछे की परंपराएँ याद रखता है। कोई रेसिपी इसलिए बची रहती है क्योंकि कोई उसे पीढ़ियों तक बनाता रहता है। कोई लोकगीत इसलिए ज़िंदा रहता है क्योंकि कोई उसे रोजमर्रा की जिंदगी में गाता रहता है।
इतिहास और समाज को देखें तो यह जिम्मेदारी अक्सर महिलाओं ने निभाई है। और यह सिर्फ भावुकता या पुरानी यादों की बात नहीं है। यह भी एक तरह का इंफ्रास्ट्रक्चर है। क्योंकि जब संस्कृति कमजोर पड़ती है तो समुदाय कमजोर पड़ते हैं। और जब समुदाय कमजोर पड़ते हैं तो समाज की मुश्किलों से लड़ने की क्षमता भी कम हो जाती है।
कई शोध बताते हैं कि जिन समुदायों के सामाजिक रिश्ते और सामूहिक यादें मजबूत होती हैं, वे आपदाओं और आर्थिक संकटों से जल्दी उबरते हैं। और इस सामाजिक मजबूती को बनाए रखने का बड़ा हिस्सा महिलाओं के अदृश्य श्रम पर टिका होता है।
जब महंगाई बढ़ती है, बाढ़ आती है या संसाधनों की कमी होती है, तब अक्सर महिलाएँ ही जीवन को दोबारा व्यवस्थित करती हैं ताकि सबकुछ पूरी तरह बिखर न जाए। जब सप्लाई सिस्टम टूटते हैं तो वे भोजन का प्रबंधन करती हैं। पानी की कमी में पानी बचाकर चलाती हैं। जब संस्थाएँ तेजी से मदद नहीं कर पातीं तो वे देखभाल की जिम्मेदारियाँ बाँटती हैं।
आज यही अनुभव और संघर्ष धीरे-धीरे नेतृत्व में भी दिखाई देने लगा है। महिलाएँ अब नेतृत्व, विज्ञान, जलवायु नीति, नवीकरणीय ऊर्जा, परिवहन, वास्तुकला, कृषि और पर्यावरण से जुड़े नवाचारों में अधिक दिखाई दे रही हैं। आज महिलाएँ जलवायु वार्ताओं का नेतृत्व कर रही हैं, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी कंपनियाँ बना रही हैं, सस्टेनेबिलिटी रणनीतियाँ तय कर रही हैं और मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर डिज़ाइन कर रही हैं।
फिर भी जमीन के मालिकाना हक, जलवायु फंडिंग, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और लंबे समय के पर्यावरणीय फैसलों में महिलाओं की भागीदारी अब भी बराबरी की नहीं है। यही वजह है कि बातचीत सिर्फ “महिलाओं को शामिल करने” तक सीमित नहीं रह सकती। क्योंकि “शामिल करना” यह मानकर चलता है कि महिलाएँ पहले मौजूद नहीं थीं। जबकि महिलाएँ कभी अनुपस्थित थीं ही नहीं।
जरूरत है तो केवल उनके काम को पहचानने की।
यह पहचानने की कि अनौपचारिक श्रम भी असली आर्थिक और पर्यावरणीय इंफ्रास्ट्रक्चर है। यह समझने की कि देखभाल, मरम्मत, सामुदायिक सहयोग और मुश्किल परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढाल लेना — ये सब समाज को चलाने वाले बुनियादी काम हैं। और यह स्वीकार करने की कि दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण जलवायु-प्रतिरोधी व्यवस्थाएँ पहले से ही महिलाओं के रोजमर्रा के श्रम में मौजूद हैं।
शायद यही सबसे बड़ा सच है – हम महिलाओं को क्लाइमेट एक्शन में लाने की कोशिश नहीं कर रहे। हम बस अब जाकर उस क्लाइमेट एक्शन को पहचानना शुरू कर रहे हैं जिसे महिलाएँ हमेशा से अपने कंधों पर उठाए हुए थीं।
जलवायु संकट पर बातचीत अक्सर बहुत देर से शुरू होती है। जब तक दुनिया किसी संकट पर चर्चा शुरू करती है, तब तक महिलाएँ उससे जूझना शुरू कर चुकी होती हैं। फिर भी उनके अधिकांश श्रम को ‘क्लाइमेट एक्शन’ नहीं माना जाता।
नव्या सिंह के न्यूजलेटर क्लाइमेट एक्शन, द इंडियन वे से साभार
नव्या सिंह एक क्लाइमेट जर्नलिस्ट, सस्टेनेबिलिटी स्ट्रैटेजिस्ट और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म News with Navya की संस्थापक हैं। वे भारत में पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन और जमीनी स्तर पर हो रहे सकारात्मक बदलावों की कहानियों को सामने लाने का काम करती हैं। उनका फोकस खासतौर पर ग्रामीण भारत, स्थानीय समुदायों, छोटे स्टार्टअप्स और पारंपरिक ज्ञान पर रहता है। अपने काम के जरिए वे लोगों को जलवायु और पर्यावरण से जुड़े मुद्दों के प्रति जागरूक करने और समाधान आधारित सोच को बढ़ावा देने की कोशिश करती हैं।
Climate Action, The Indian Way में नव्या सिंह ऐसी ही कहानियाँ सामने लाती हैं। महिलाओं, श्रम, पर्यावरण, आजीविका, संघर्ष और उन अदृश्य व्यवस्थाओं की कहानियाँ जो समाज को हर दिन चलाए रखती हैं। भारत में क्लाइमेट एक्शन सिर्फ नीति-निर्माण वाली बैठकों या कॉरपोरेट रिपोर्टों में नहीं हो रहा। वह पहले से घरों, खेतों, जंगलों, समुद्री किनारों, स्थानीय बाजारों और समुदायों के भीतर हर दिन घट रहा है।
