वंदना मिश्रा की ‘कुछ बेरोजगार लड़के’ तथा अन्य कविताएं
डाॅ. वंदना मिश्रा की कविताएं समकालीन स्त्री-अनुभव, स्मृति, प्रेम, घरेलू जीवन और सामाजिक विडंबनाओं की बेहद संवेदनशील अभिव्यक्ति हैं। उनकी कविता का संसार किसी बड़े शोर या वैचारिक घोषणाओं से नहीं, बल्कि जीवन के छोटे-छोटे दृश्यों, संबंधों की महीन परतों और स्त्री मन की अनकही धड़कनों से निर्मित होता है। वे उन भावों को पकड़ती हैं जिन्हें समाज अक्सर साधारण समझ कर अनदेखा कर देता है। एक लड़की का चुपचाप सुनना, बेरोज़गार युवाओं की बेनाम उपस्थिति, मां के पुराने बक्से में बची हुई गंध, या प्रेम के छोटे-छोटे क्षणों की दीर्घ स्मृति। उनकी कविताओं में भाषा सहज है, लेकिन उसकी मार्मिकता बहुत गहरी है।
प्रस्तुत कविताओं में पाठक एक ऐसी काव्य-दृष्टि से रूबरू होता है जो जीवन की साधारण दिखाई देने वाली स्थितियों में भी असाधारण मानवीय अर्थ खोज लेती है। वंदना मिश्रा की कविताएं पाठक के भीतर धीरे-धीरे उतरती हैं और पढ़े जाने के बाद भी लंबे समय तक स्मृति में बनी रहती हैं।
कुछ सुनती ही नहीं लड़की
लड़के ने फोन उठा रोष में कहा
कैसे किया, क्यों किया
फोन ?
लड़की ने सुना क्यों नहीं किया
इतने दिनों तक ?
अब हमारे रास्ते अलग हैं
बिना पीछे मुड़े लड़के ने कहा,
सुना हवाओं से लड़की ने
हमारी मंज़िल अब भी एक है।
अब कभी नहीं याद करना
भूल जाओ मुझे।
सुना फिर भी उसने
मैं कभी भूल नहीं पाऊंगा
तुम भी कसम खाओ।
मैं आ नहीं सकता तुम तक
लड़के ने ऊब कर कहा ,
हज़ारों कानों से सुना लड़की ने
मैं अभी बिल्कुल अभी
तुम तक आना चाहता हूं
सब कुछ छोड़ कर।
खीझ कर कहा लड़के ने
“पागल हो तुम मूर्ख !”
लड़की को लगा तुम्हारे भोलेपन पर मरता हूं
मैं मेरी सतरंगी चिड़िया !
निभाती है बिना खाई कसम लड़की
हवा में फैली आवाज़ों को
सुनने का प्रयास करती है
और मां कहती है
कुछ सुनती ही नहीं लड़की
आजकल
कुछ बेरोज़गार लड़के
कुछ बेरोज़गार लड़के न हों तो
सूनी रह जाए गलियां,
बिना फुलझड़ियों के रह जाए दीवाली
बिना रंगों के रह जाए होली
बेरौनक रह जाए सड़कें, त्योहारों
का पता न
चल पाए,
बिना इनके हुड़दंग के।
मंदिर सूने रह जाएं,
बिना श्रृंगार के
यदि ये चंदा न उगाहें, फूंके ट्रांसफॉर्मर
दिनों तक न बनें, यदि ये नारे न लगाएं
धरने, प्रदर्शन, तमाशों के लिए
हमेशा
हाज़िर रहती है इनकी ज़मात।
हम बड़े खुश होते हैं जब हमारी
सुविधाओं के लिए ये नारे लगाते हैं,
या पत्थर फेंकते हैं, पर सामने पड़ते ही बिदक
जाता है हमारा अभिजात्य,
हम इन्हें मुंह नहीं लगाते,
इनकी खिलखिलाहट खिजाती है, हमें।
हम बंद कर लेते हैं,
खिड़कियां, दरवाज़े इनकी आवाज़ सुनकर
अजीब तरह से ताली बजाकर
हंसते हैं,
नुक्कड़ पर खड़ा देख कर कोसते हैं हम,
लफंगा समझते हैं हम इन्हें
और ये हमें ?
सचमुच हम चाहते हैं,
ये नज़र न आएं
हमें बिना काम
पर इन्हें कहीं खड़ा रहने की जगह
नहीं दे पा रहे हैं,
हम या हमारी सरकार।
अम्मा का बक्सा
अम्मा का एक बक्सा था।
हरे रंग का।
बचपन से उसे उसी तरह देखा था।
एक पुरानी रेशमी साड़ी का बेठन लगा था
उसके तले में जिसके बचे
आधे हिस्से से ढका रहता था
उसका सब माल-असबाब
कोई किमखाब का लहंगा नहीं
कोई नथ-बेसर नहीं
कोई जड़ाऊ कंगना नहीं
सिर्फ
कुछ साड़ियां
पुरानी एक किताब
पढ़ने के लिए नहीं
रुपयों को महफ़ूज़ रखने के लिए
कुछ पुरानी फ़ोटो।
कोई बड़ा पर्स नहीं था मां के पास
कोई ख़ज़ाना भी नहीं।
पर पता नहीं क्यों वो बॉक्स खुलते ही
हम पहुंच जाते थे
उसके पास।
झांकने लगते थे
कुछ न कुछ तो मिल ही जाता था
एक सोंधी सी महक निकलती थी
उस बॉक्स में से
मां चली गई तो दीदी
उस बॉक्स को पकड़ के बहुत रोई
उस बक्से को चाह कर भी
बॉक्स नहीं कह सकते
जैसे अम्मा को मम्मी
भाई ने कुछ साल पहले खरीद दी थी
एक बड़ी अलमारी मां के लिए
पर वो हरे बक्से जैसा
मोह नहीं जगा पाई
कभी हमारे दिलों में।
मां की गंध बसी है
उस बक्से में।
एक सौ आठ
बार लिखा कागज़ पर
मैंने तुम बेकार हो,
तुम नहीं हो मेरे,
खोज-खोज कर
गिन-गिन कर
कमियां लिखीं
तुम्हारी
फाड़ कर जला दिया
कागज़।
एक सौ नौ बार
दिल ने कहा
मैं नहीं हो सकती
किसी और की
तुम्हारे सिवाय।
कहीं कोई नहीं था…
लड़की के दुपट्टे पर बैठ गया था
कोई कीड़ा
बीच रास्ते में न जाने कब।
लड़की ने दुपट्टा ठीक करने के लिए
हाथ लगाया और कीड़ा,
उफ़…
दुपट्टे को नीचे सड़क पर फेंक दिया
मां ने कीड़ा भी देखा, दुपट्टा भी
पर गुस्से से लड़की को घूरा।
राह चलते उस लड़के ने
झुक कर उठाया दुपट्टा
और झाड़ कर थमा दिया
लड़की के हाथ में
झुकी नज़र से देखा लड़की ने
और…
धंस गई ज़मीन में
पता नहीं वो क्या भाव था
पर दुपट्टा खींचकर
भागने वालों को
कभी नहीं मिल सकता।
चुपचाप पत्तल में एक की जगह
दो पूरी डाल जो मुड़ गया
बिना पीछे देखे
उसकी पीठ बहुत कुछ कह देती है
सब कुछ कह देने वाले क्या जाने
यूं संदेश देना।
ट्रेन में पहली बार चढ़ी लड़की
उतरने की जल्दी में
बढ़ती है बिना ट्रेन पूरी तरह रुके
बढ़ कर बांह थाम लेता है एक हाथ
मखमली आवाज़
“संभल कर, अभी रुकी नहीं ट्रेन “
ट्रेन की धड़धड़
सीने में क्यों होने लगी !
पिता घूर कर देखते हैं
दोनों को,
“तुम हटो,
हम हैं साथ में।”
ये सब याद करने की बात है क्या !
सब भूल जाती लड़की
अगर ये प्रेम जीवन में मिल सकता।
तरस गई…
जीवन बीतने को है।
मन पर मनों मिट्टी के नीचे से
झांकने लगा है
झिलमिल-झिलमिल
दृश्य
प्रेम ऐसे ही टुकड़ों में मिलता है क्या…
जान देने से कठिन है
इज़्ज़त देना
लड़कियां जानती हैं
मर जाती हैं
इज़्ज़त देने वाले पर।
मृत्यु शय्या पर पड़ी
मौत से आंख मिचौली खेलती
दादी से
पत्रकार बनी
ढीठ लड़की
पूछती है प्रेम के बारे में
जीवन दिप-दिप कर
झिलमिलाने लगता है
बूढ़ी आंखों में
कस कर आंख बंद कर
कहती हैं
कहीं कोई नहीं…
पर तुम प्यार का मौका
मिले तो
कभी मत गंवाना बेटी।
जौनपुर, उत्तर प्रदेश में जन्मी डाॅ. वंदना मिश्रा हिंदी की चर्चित कवयित्री, आलोचक और शिक्षिका हैं। उनकी कविताएं देश की अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं तथा कई भारतीय भाषाओं में अनूदित भी हुई हैं। आकाशवाणी और दूरदर्शन से उनकी रचनाओं का प्रसारण हुआ है। ‘कुछ सुनती ही नहीं लड़की’ और ‘कितना जानती है स्त्री अपने बारे में’ जैसे कविता-संग्रहों के माध्यम से उन्होंने स्त्री जीवन, प्रेम, स्मृति और सामाजिक यथार्थ को एक विशिष्ट संवेदनात्मक स्वर दिया है। वर्तमान में वे जी.डी. बिनानी पी.जी. कॉलेज, मिर्जापुर में हिंदी विभागाध्यक्ष के रूप में कार्यरत हैं।
