बबली गुज्जर की ‘प्रेमिकाओं का नाम’ तथा अन्य कविताएं
बबली गुज्जर
बबली गुज्जर की कविताओं का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि वे स्त्री जीवन की पीड़ा को केवल विषय के रूप में नहीं, बल्कि अनुभव के रूप में प्रस्तुत करती हैं। उनकी कविता ‘हम दुख छाती पर लेकर जन्मी’ भारतीय स्त्री के उस सामूहिक इतिहास को स्वर देती है जिसमें जन्म से लेकर विवाह, मातृत्व और वृद्धावस्था तक दुख को नियति की तरह ढोने की अपेक्षा की जाती है। वहीं ‘मैं कहाँ थी बाबा?’ पुत्र-मोह और पितृसत्तात्मक व्यवस्था के बीच उपेक्षित होती लड़की के अस्तित्वगत प्रश्न को अत्यंत मार्मिकता से सामने लाती है। उनकी प्रेम-कविताएँ भी पारंपरिक रूमानी भावभूमि से अलग हैं। ‘रो लेने की जगहें’ और ‘सिर्फ और सिर्फ तुम्हारा प्यार’ में प्रेम किसी उत्सव से अधिक स्मृति, अभाव और आत्मिक संघर्ष का प्रदेश बनकर उभरता है। भाषा उनकी बड़ी शक्ति है। वे लोकजीवन, ग्रामीण बिंबों, घरेलू वस्तुओं और रोज़मर्रा के अनुभवों से ऐसे रूपक रचती हैं जो पाठक के मन में देर तक बने रहते हैं।
दिल्ली में जन्मी बबली गुज्जर जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन में परास्नातक हैं और पेशे से शिक्षिका हैं। उनकी कविताएँ अनेक वेब पोर्टलों, पत्रिकाओं तथा साझा संकलनों में प्रकाशित हो चुकी हैं। वे विभिन्न साहित्यिक मंचों पर कविता-पाठ कर चुकी हैं तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के ‘माँ लक्ष्मी देवी मेमोरियल अवॉर्ड’ से सम्मानित हैं। ॉउनकी कविता में स्त्री की आवाज़ करुणा से भरी है, लेकिन वह असहाय नहीं; वह अपने दुख को पहचानती है, उसका नाम लेती है और उसे कविता में बदल देती है। यही उनकी रचनात्मक पहचान का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है।
हम दुख छाती पर लेकर जन्मी
हम दुख छाती पर लेकर जन्मी
हमें पायल पहनाई गईं
फ्रॉक के रंगीन किनारों पर, बांध दिया गया दुख
और कहा गया घूम कर दिखाओ मेरी जान
हमनें किताबें पढ़ीं
हमारे बस्तों पर टांग दिया गया दुख,
और कहा गया ख़ूब नाम कमाओ मेरी जान
हमनें मांग भरी
सजा दिया गया हमारे माथे पर दुख
और कहा हंसकर दिखाओ मेरी जान
हमने बालक जने
हमनें घरौंदे बुने
हमारे सीने से दूध के साथ दुख बहता रहा
लेकिन हमारे दुख का बोझ कम नहीं हुआ
हमनें भाग कर रोटियां बेली
एक बांह में दुख और दूसरी में बालक थामे रखे
हमें आशीर्वाद में सौभाग्यवती भव कहा
जिनकी मांग उजड़ गई, उन्होंने मनहूस सुनना सहा
ये मनहूस नहीं थी
इन्होंने अपने पतियों को नहीं खाया था
इन्हें घर नहीं मिला दीवारें मिली
इनकी हिम्मत ही इनका आखिरी सरमाया था
ये औरतें रसोई में खप रहीं थी
आधी अधूरी खुद के लिए बच रहीं थी
इनके पसीने की कीमत तो दूर
इनका खून तक हो गया था
आटे के कनस्तर तक से सस्ता
जिनके बिना एक दिन गुजारा नहीं होता
उन्हीं के ससुराल में बीमार पड़ते ही
आराम के बदले दिखाया गया मायके का रस्ता
इनकी मेहनत है दुगनी, दुख चौगुना
और भूख रह गई है आधी
ये जो अपने ही घरों में हारी औरतें थी
ये सुकून ढूंढने कहां जाती???
सलीका
बूंद बूंद ही बरसाता है पानी, कपास सा बादल
पोर पोर कर ही निकालते हैं, डिबिया से काजल
बरस दर बरस ही घटती है, आंखों की रोशनी
मजबूरी में ही बेचते हैं, बाबा गांव की जमीं
कसकर गले लगे बालक को, उसकी मां से
आहिस्ता- आहिस्ता ही किया जाता है अलग
भूख से अधीर नए नए जन्में बछडे के मुख से
हौले हौले से ही छुड़ाया जाता है, गाय का थन
मेरे दोस्त!
क्या तुम इतनी भी दुनियादारी नहीं जानते
कि बिछड़ कर जाने का भी तो
कोई सलीका होता है!
प्रेमिकाओं का नाम
ये उजले दिन के साथी रहे थे
ऐसे शरीफ,
कि मोहल्ले की लड़कियां
उनसे बात करने से हिचकती नहीं थी
इनसे हो जाती अंजाने में भी कोई भूल
तो महादेव को चढ़ाते थे जल भोरे भोरे
किसी को हुई तकलीफ, बिसरती नहीं थी
इन्होंने मौकापरस्त प्रेमिकाओं को किया माफ
कदम पीछे कर किए उनके रास्ते साफ़
और तो और उनके पतियों के प्रति कभी
नहीं भरा अपने मन में किसी तरह का द्वेष
न तेज आवाज में बात की
अपनी ब्याहताओं से
न बच्चों से किया कलेश
यह सबकी पीड़ाओं के सहभागी थे
अपने ईश्वर की रज़ा में राज़ी थे
इन्होंने बाप के संग ढोई गारा मगज पर
मां के अधिकताप पीड़ा में आंगन बुहारा
इन प्रेमियों को कविताएं लिखनी नहीं आती थी
तो इन्होंने अपनी बेटियों को,
अपनी प्रेमिकाओं के नाम से पुकारा!
मैं कहां थी बाबा ??
भरे पूरे एक घर में
एक बच्ची थी डर में
एक बिल्ली, दो गाय, एक बछिया थी
टांड था, दीवार थी, आला था, खटिया थी
मैं कहां थी बाबा?
सरपंचों की टोली में थे मशगूल तुम
कोई हो रहा था कैसे नजरों से गुम
चार दुकान थीं, खेत थे, जमीन थी
मां बेटे को जन्म देकर मुतमईन थी
मैं कहां थी बाबा?
पंडालों से सजा ब्याह वाला घर था,
दुनिया भर के रूठ जाने का आपको डर था
ढोलक की आवाज़, मेहमानों की भीड़ थी
लाल जोड़े में सजी, दुल्हन के मन में पीर थी
मैं कहां थी बाबा?
नगद था, चार पहिए की सवारी थी
सर की पगड़ी किसी के प्यार पर भारी थी
चालीस तोले चांदी, बारह तोले सोना था
फिर किस बात का किसी को रोना था
लेकिन मैं, मैं कहां थी बाबा?
बारह बीघे का मालिक ससुराल था
आंगन बुहारते-बुहारते बुरा हाल था
चार दिन की भूखी मैं, दो दिन रही तीमारदारी
उनके हाथ में था उनका वंश उत्तराधिकारी
मैं कहां थी बाबा?
मैं कहीं नहीं थी बाबा
मैं एक कोने में दुबकी रही
भाई के लाडों को देख कुढ़ती रही
ढोलक की ताल में सिसकी लिए
छाती पर आपकी पगड़ी लिए
अस्पताल के बेड पर मर रही थी
बाबा! मरते मरते भी,
आपको बहुत याद कर रही थी!
रो लेने की जगहें
हम सतजुग में पैदा नहीं हुए थे,
कि तुम उस पार दिए बालते
और मैं उसकी चमक भर से
अँधेरों में खोज लेती कोई
तुम तक आने की सीधी राह
मेरे पुरखों की किसी चूक से
नाराज़ हो गया है नींद का देवता,
मैं रातों को दिन बनाने में पारंगत होकर
ख़ुद को दे रही हूँ एक धीमे ज़हर सी सज़ा
हम धोखा दिए जाने के इस स्वर्णिम युग मे जन्में
जहाँ नाराजगी में पीठ फेर लेने की देर भर से ही
बदल दिए जाते हैं मंज़िल
और हमसफ़र तक भी
हम झूलों की रस्सियों से
फाँसी के फँदे बनाने के दौर में हैं
हम झींगुर की चुप्पी में दबे
कभी गूँगे भिखारी के मन शोर में हैं
और मैं
मैं, ज़ख़्म ठीक हो जाने के बाद
बमरहम के पात्र की तली का
बचा हुआ एक गैर ज़रूरी लेप मात्र हूँ
जिसे अब न तो कोई छूने को राज़ी है
न उसकी किसी को चाह है…
तुम्हारी याद भीड़ में खोए
किसी बालक की तरह गले लगती है
और किसी सर्प की भाँति जकड़ लेती है मेरी छाती
पानी जाने क्यों भूल जाता है,
कि गहरे कुएँ में जाने वाला पात्र
उसके अँधेरों को देखने नहीं,
सिर्फ़ अपनी प्यास बुझाने आता है
मैं जाने क्यों भूल जाती हूँ
कि तृषा से मेरा कितना गहरा नाता है
तुम्हारे आँसुओं ने लेकिन सदा ही
की है तुम्हारी ग़लतियों की वकालत
और हराया है मुझे अनेको बार
कटघरे में फिर तुम्हारी जगह
आ खड़ा होता है, एक अकेला मेरा प्यार
जो सबसे ज़्यादा निर्दोष होते हुए भी
काट रहा है एक लंबी उम्रक़ैद की सज़ा
पीड़ा की बेड़ियाँ मुझे जकड़ कर रखती हैं ज़मीन पर
मेरे पंख तुम्हारे आँचल के मान के वज़न तले दबकर
हुए जा रहें हैं कोई खोई हुई सभ्यता के अवशेष
जब अगली बार हाथ थामों किसी का
तो मेरी ये आख़िरी बात स्मरण कर लेना
किसी को हँसने की वजहें न दे सको…तो न सही
लेकिन रो लेने की जगहें ज़रूर देना!
सिर्फ और सिर्फ तुम्हारा प्यार
उस रोज जब तुमने नज़रें फेर ली थी
सांसों ने भी सीने तक आने में बहुत देर ली थी
ये कोई ज़हनी रुसवाई नहीं थी मेरी जान
न ये कुछ लम्हात की वक़्ती जुदाई थी
हम अख़लाक़ की जर्द चादरों में लिपटे बदन थे
हमारी रूहें तड़प तड़प कर बदन से खुला मांगती रही
मगर हम ज़माने के डर से मरने से बचते हुए जीते गए
हमारा घायल दिल ज़िस्म के भीतर सड़ता रहा
दुख हमारी नसों में ख़ून बन- बन बहता रहा
और तुम्हारा प्यार,
तुम्हारा प्यार बोझिल शामों में
उदास गीत सा बजता रहा,
जिसे जितना सुना, उतना आंखें बहती रहीं,
जितना आंखें रोई उतनी दफा
दिल फिर गीत सुनता रहा
तुम हिचकियों से रो लेने के बाद
सुबकियों में आई वो आखिरी सिसकी थे
जो हमें तीन रातों के रतजगों के बाद कहीं
नींद के आगोश में ले जा सुलाती है कभी
मैं ज़िन्दगी से हारी थी साहेबां
मुहब्बत का मारी थी जानेजां
मेरा मन था पंखें से टकराई
जमीन पर पड़ी साँसों के लिए लड़ी
वो एक नन्हीं… बेसुध… चिड़िया
जिसे तुम दे सकते थे सिर्फ
सूखते कंठ को तर करने लायक
दो अंजुरी भर पानी तो शायद
लेकिन लाख चाहते तो भी
वापस न दे सकते थे प्राण कभी
मरना मेरी नियति था
मैं मरूँगी दोस्त
जितनी दफा जाओगे उतनी दफा मरूँगी
जितनी दफा पूछोगे , उतनी दफा कहूंगी
कहूंगी आखिरी सांस तक ये सत्य बारम्बार
मेरे हॄदय में गति दे सकता था कोई अगर
तो वो था सिर्फ तुम्हारा प्यार,
सिर्फ तुम्हारा प्यार!
