फिर छिड़ी रात बात फूलों की
सुमन पाण्डेय
इस आलेख में सुमन पाण्डेय ने फूलों के बहाने अपने बचपन, परिवार, लोक-जीवन और प्रकृति से बने उस गहरे भावनात्मक संबंध को याद किया है, जिसने उनके व्यक्तित्व और संवेदना को आकार दिया। यह केवल फूलों की कथा नहीं, बल्कि स्मृतियों की उस सुगंध का लेखा-जोखा है जो समय बीत जाने के बाद भी मन में बनी रहती है।
वैसे भी सुमन की लेखनी में स्मृतियाँ, प्रकृति और मनुष्य के आत्मीय रिश्ते बार-बार उभरते हैं। वाराणसी की मूल निवासी सुमन ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से पेंटिंग ऑनर्स में स्नातक तथा बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झाँसी से पेंटिंग में परास्नातक की शिक्षा प्राप्त की है। टेक्सटाइल डिज़ाइन में डिप्लोमा और वनस्थली विद्यापीठ से पारंपरिक वस्त्राकल्प विषय में पीएच.डी. करने के बाद वर्तमान में वे कला एवं डिज़ाइन शिक्षा से जुड़ी हैं।
“कौन देता है जान फूलों पर,
कौन करता है बात फूलों की…” मख़दूम मोहिउद्दीन की यह पंक्ति हमेशा मुझे भीतर तक छूती रही है।
और फिर याद आता है—“फिर छिड़ी रात बात फूलों की…”
शायद सचमुच फूलों की बातें रातों में ही शुरू होती हैं। दिन की उपयोगिताएँ समाप्त होने के बाद, जब मनुष्य थोड़ा मनुष्य बचता है, तब उसे फूल याद आते हैं।
मेरे जीवन में फूलों की सबसे पहली स्मृति किसी बगीचे से नहीं, एक टोकरी से जुड़ी है। दादा जी खेत पर इतने सारे फूलों के पौधे लगाए हुए थे कि हर सुबह वे एक टोकरी भरकर फूल तोड़ते थे। पहला फूल हमेशा गुड़हल का होता था, जो माँ को चढ़ाया जाता—सुर्ख लाल। और मेरी हर चीज़ को चखने की आदत ने बहुत पहले ही यह बता दिया था कि गुड़हल के फूल को पीछे से तोड़ो तो उसमें हल्का मीठा रस मिलता है। मैं तो गुड़हल के फूल खा भी जाती थी। जंगल शायद मेरे भीतर ही कहीं था। आज के आधुनिक समय में आकर पता चला कि ‘हिबिस्कस टी’ तो बहुत ट्रेंडिंग है। मुझे हँसी आती है कि मेरे बचपन के सारे प्रयोग कितने स्वाभाविक थे।
हमारे घर में गुड़हल की पाँच प्रजातियाँ थीं। एक पारंपरिक लाल। दूसरी क्रिमसन रेड, इतनी घनी पंखुड़ियों वाली कि बिल्कुल आदमकद गुलाब जैसी लगती। एक हल्की गुलाबी। एक सफेद। और एक ऐसी, जिसके फूल गुलाबी-सफेद थे और पत्तियाँ भी हरी-सफेद। वह उसकी विशेषता थी या किसी बीमारी ने उसे इतना सुंदर बना दिया था, मुझे नहीं पता। पर मेरे लिए वह केवल खुशी थी। उसके बगल में था पीला कनेर।
जिसे तोड़ने पर दूध निकलता था। उसके भीतर एक गाढ़ा, छोटे फल जैसा हिस्सा होता था। दोपहर होते-होते वे फूल स्वयं अपनी शाखाएँ छोड़कर ज़मीन पर गिर जाते थे। मैं उन्हें उँगलियों में पहनकर “क्रूरसिंह” बनने की एक्टिंग किया करती थी। शायद बचपन फूलों और चंद्रकांता- दोनों का सम्मिलित खेल था।
हरसिंगार रात भर महकता और सुबह सूर्य की प्रतीक्षा में पृथ्वी पर बिखर जाता था। मैं और दादी साथ बैठकर उन्हें ज़मीन से बीनते थे। कभी-कभी पेड़ से तोड़ते भी थे ताकि गणेश जी को चढ़ाया जा सके। मुझे हमेशा लगता था कि पारिजात के नीचे सुबह सबसे पहले धूप खिलती है।
देशी गुलाब इतने नाज़ुक थे कि थोड़ा तेज़ी से तोड़ो तो पंखुड़ियाँ हाथों में ही बिखर जातीं। कनेर की भी कई प्रजातियाँ थीं—सफेद और गुलाबी। वे बुके की तरह गुच्छों में खिलते थे। कक्षा पाँच में मेरी एक सहेली थी- स्वाति। मैं उसके लिए रोज़ फूल तोड़कर ले जाती थी।
पूरा एक वर्ष यह क्रम चला। फिर वह किसी दूसरे स्कूल चली गई और उसके बाद मैंने कभी किसी के लिए फूल तोड़ना बंद कर दिया। तभी पहली बार समझ आया कि प्रेम का एक रूप प्रतिदिन किसी के लिए फूल तोड़ना भी होता है। मेरे यह करने के पीछे का कारण यह था कि वह किसी और स्कूल से आई थी और हमारे स्कूल में उसका मन नहीं लगता था, और उसे अच्छा लगे, इस बात से मैं परेशान थी। यह लिखते हुए मुझे खुद पर हँसी आ रही है और इस बात पर यक़ीन भी कि फूलों को किसने खुश किया है; जब तक जीवन है, फूल खुश हैं।
टगर के फूल मुझे हमेशा चकित करते थे। उनकी एक प्रजाति रेडियल बैलेंस का इतना सुंदर उदाहरण थी कि उन्हें देखते ही मेले में बिकने वाले कागज़ के पंखे याद आने लगते। रातरानी और चमेली की लताओं ने हमारे बगीचे का द्वार बनाया हुआ था। पर इन सबमें सबसे सुंदर फूल कपास के पेड़ पर खिलता था—पीला और बैंगनी। वह मुझे इतना लुभाता था कि उसे तोड़ लेने का मन करता, पर उसे छूना भी लगभग वर्जित था।
दादा जी ने धतूरा और मदार के पौधे भी लगाए थे। घर भर की हिदायत थी, “इन दोनों से दूर रहना।”
मदार की मोटी, मखमली पत्तियों पर खिलते फूलों के गुच्छे मुझे रहस्यमय लगते थे। उसका गुझिया जैसा मोटा फल जब तोड़ो तो भीतर की बनावट मछली की त्वचा जैसी प्रतीत होती। और यदि वह स्वयं फट जाए तो उसमें से रुई जैसे असंख्य रेशे हवा में उड़ने लगते। मैं और मेरी बहन उन्हें “हौआ” कहते थे। आज तक नहीं जानती उनका वास्तविक नाम क्या था।
इन सब फूलों में मुझे सबसे प्रिय मधुकामिनी लगती थी। इतनी सुगंध से भरी कि पास खड़े रहो तो लगता था जैसे हवा भी फूल बन गई हो। और उसे तोड़ना इतना कठिन कि ज़रा छुओ और फूल बिखर जाए। जब कभी मैं उसे बिना बिखेरे तोड़ लेती, तो अपने धैर्य पर गर्व होता।
इन सारे फूलों से हम अपने घर के मंदिर और भगवान जी की मूर्तियों को सजाते थे। यदि बहुत सारे फूल इकट्ठे हो जाते, तो दादी मुझे उनकी माला बनाना सिखातीं। उसी बहाने मुझे उनकी सिलाई मशीन और कैंची छूने की अनुमति मिल जाती। मैंने दादी से माला बनाना सीखा और बाबा से फूलों से प्रेम करना।
शायद इसी कारण आज भी मेरे किराए के छोटे-से घर में तीस-चालीस पौधे केवल फूलों के हैं। और मैं बंदरों और गर्मी से उन्हें बचाते हुए हर दिन अपने इस पुष्प-स्नेह को जीती हूँ।
अब सोचती हूँ- शायद फूल केवल पौधों पर नहीं खिलते। वे स्मृतियों में भी खिलते हैं। और कुछ लोग जीवन भर उन्हीं स्मृतियों की सुगंध में धीरे-धीरे जीते रहते हैं।
प्रकृति पर लेखन की शृंखला में सुमन पाण्डेय के पिछले आलेख :
1. कुछ पेड़ मेरे भीतर भी हैं
2. पेड़ों की छाँव में छुपाए रखना
