साहित्य

रेनू यादव की कहानी ‘इत्वरी’

समकालीन हिंदी लेखन अपनी अलग पहचान बना रही कथाकार रेनू यादव की कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे सामाजिक प्रश्नों को किसी विचारधारा के तहत नहीं, बल्कि मनुष्य के जीवन, उसकी मनःस्थितियों और रिश्तों की जटिलता में देखती हैं। उनके पात्र पूरी तरह सही या ग़लत नहीं होते; वे अपनी परिस्थितियों, विवशताओं और अंतर्द्वंद्वों के साथ पाठक के सामने आते हैं।

प्रस्तुत कहानी ‘इत्वरी’ इसका सशक्त उदाहरण है। यह कहानी केवल एक युवती के आत्मनिर्णय के अधिकार की नहीं, बल्कि परिवार, सामाजिक प्रतिष्ठा, संस्थागत नियमों और मानवीय संवेदना के बीच चल रहे गहरे संघर्ष की कथा है। वार्डेन स्नेहा के माध्यम से लेखिका यह प्रश्न उठाती हैं कि जब नियम और मनुष्यता आमने-सामने खड़े हों, तब सही निर्णय क्या होता है। यही संवेदनात्मक गहराई, मनोवैज्ञानिक सूक्ष्मता और सामाजिक यथार्थ रेनू यादव की कहानियों को विशिष्ट और लंबे समय तक स्मरणीय बनाते हैं। प्रस्तुत है कहानी।


‘शोषण ज्यादातर स्ट्रगलर्स का ही होता है। सफल होने के बाद तो लोग पीछे खड़े होते हैं।’ दृढ़ता से समझाते हुए वार्डेन स्नेहा ने छात्रा पूजा से कहा।

‘अपनी जान की क़ीमत पर शोषण का शिकार भी होना पड़े, तो इस समय वह भी मंजूर है।’ छात्रा पूजा की आँखों में जिजीविषा चमक रही थी।

‘एक समस्या से बचने के लिए दूसरी समस्या में फँस जाना, समस्या का समाधान नहीं हो सकता! आपको समझदारी से काम लेना चाहिए।’ स्नेहा ने समझाया।

‘मैं समझ रही हूँ मैम। मेरा विश्वास कीजिए। मेरे दूर के चाचा जी हैं, वे मेरा भला चाहते हैं। आज मैं उन्हीं की वजह से पढ़ पा रही हूँ।’ पूजा स्नेहा को विश्वास दिलाना चाह रही थी।

‘तुम्हारी बातों पर मैं कैसे विश्वास कर लूँ?’ स्नेहा दाँत भींचते हुए बोली।

‘फिलहाल मेरे पास यही एक रास्ता है। आपको मुझ पर विश्वास करना ही होगा।’ वह दृढ़ थी, पर होठ काँप रहे थे।

‘…….’ स्नेहा बिना कुछ कहे उसकी शुष्क आँखों में देख रही थी।

‘मैं पढ़ना चाहती हूँ, आगे कुछ करना चाहती हूँ। कृपया मुझे जाने दीजिए।’ अचानक से वह लाचार लगने लगी।

‘ठीक है, मेरी उनसे बात करवाओ।’ वार्डेन दृढ़ता से बोली।

पूजा मोबाइल से कॉल लगा ही रही थी कि उसी समय उसकी माँ विमला दौड़कर हॉस्टल की ओर आती हुई दिखाई दे जाती है। पूजा तत्काल कॉल डिस्कनेक्ट कर देती है। विमला की साँसें उखड़ रही थीं। काले-सफेद बाल उनके चेहरे पर पसीने से चिपक गए थे। वे कुछ कहना चाह रही थीं, पर आवाज़ गूँ-गूँ करके निकल रही थी। हॉस्टल की अटेंडेंट ने झट से उन्हें पंखे के नीचे बैठाया और पानी पीने के लिए दिया। विमला पानी गट-गट पीने लगी। जितना वह पानी पी रही थी, उतना ही गिलास से नीचे गिरा रही थी। उसके कपड़े भीग रहे थे। जैसे ही उसकी साँसें थोड़ी सामान्य हुईं, उसने वार्डेन के सामने हाथ जोड़ लिया, ‘मैं हाथ जोड़ रही हूँ मैडम जी, कुछ भी करके मेरी बेटी को मेरे साथ घर भेज दीजिए। पता नहीं वह किसके पास जा रही है। कहीं ग़लत जगह जाकर फँस गई तो मैं क्या करूँगी?’

‘आपको पता है कि वह कहाँ जा रही है?’ स्नेहा ने विमला से पूछा।

‘हाँ मैडम जी, वह दुबई जा रही है।’ विमला की आवाज़ में लाचारी स्पष्ट झलक रही थी।

‘आपको कैसे पता चला कि वह दुबई जा रही है?’

‘पड़ोसी के घर वीज़ा आया था। जब तक यह बात हम लोगों तक पहुँची, तब तक उसने वीज़ा किसी से अपने पास मँगवा लिया। यदि आपने उसे मेरे साथ नहीं भेजा तो वह दुबई भाग जाएगी।’

‘वह अपना घर छोड़कर क्यों भागना चाहती है? क्या बात है?’

‘हमको नहीं पता मैडम जी! भाई-बहन में थोड़ी लड़ाई हो गई है। वह भाई को नीचा दिखाना चाहती है। बाप इस दुनिया में रहे नहीं, सब भाई ही सँभालता है। थोड़ा-बहुत कुछ बोल देता है तो वह दिल पर ले लेती है।’ माँ ने बेबसी दिखाई।

‘थोड़ा या बहुत? थोड़ा-बहुत बोलने पर कोई घर छोड़ता क्या?’ स्नेहा ने प्रश्न किया।

विमला के मोबाइल की घंटी बज उठी। स्क्रीन पर बेटे रमेश का नाम देखकर वह हड़बड़ा गई, ‘मैं हाथ जोड़ती हूँ मैडम जी, मेरे साथ मेरी बेटी को जाने दीजिए।’ वह गिड़गिड़ाने लगी।

विमला का गिड़गिड़ाना देखकर स्नेहा का हृदय पसीज गया। ‘कभी-कभी बच्चों की वजह से माँ-बाप कितने असहाय हो जाते हैं।’ स्नेहा ने मन में सोचा और मन-ही-मन नदी के उफान में डूबने-उतराने लगी।

पूजा के पठार चेहरे पर नदी झरझरा कर बह चली, ‘मैम, यदि मैं घर गई तो ये लोग मुझे मार डालेंगे। यह सब कुछ आपके एक फ़ैसले पर टिका है।’

विमला के फ़ोन की घंटी दोबारा बजने लगी। विमला फ़ोन उठा लेती हैं, ‘हाँ, क्यों जान खा रहे हो। मैं मैडम जी से बात कर रही हूँ न…? वह क्यों नहीं चलेगी, ले आऊँगी उसे… चिल्लाओ नहीं… मैं गेट पर आ रही हूँ… चुप रहो…’

वह फ़ोन डिस्कनेक्ट करती है और वार्डेन की ओर तनिक देखकर कहती है, ‘मैडम जी, उसे मेरे साथ भेज दीजिए, नहीं तो हमारी इज़्ज़त चली जाएगी…’ (फ़ोन की घंटी फिर से बज उठी) ‘अगर मैं उसे साथ नहीं ले जा पाई तो मेरा बेटा मुझे काट…।’ अपनी बात पूरी किए बगैर वह फ़ोन हाथ में लेकर गेट की ओर दौड़ पड़ी। स्नेहा की नज़र विमला के भागते कदमों पर टिक गई।

विमला की बेटी के लिए तड़प और बेटे का कॉल आने पर फ़ोन की घंटी सुनकर बदहवास भागकर उसके पास पहुँचना—दोनों ही स्थितियाँ दो धुरियों पर दिखाई दे रही थीं। थोड़ी देर बाद विमला पुनः लौटकर आई और हॉस्टल के बाहर चबूतरे पर बैठ गई। उसके चेहरे की झुर्रियाँ जल्दी-जल्दी रंग बदल रही थीं। बेटी की तड़प में गीली झुर्रियाँ उसके चेहरे की कठोरता को गीला कर देतीं और बेटे का भय उसकी झुर्रियों को कँपा देता। लेकिन इन सबके बावजूद कभी-कभी उसकी झुर्रियों के बीच कुछ कँटीली झुर्रियाँ चमक उठतीं और वह सीधे स्नेहा की आँखों में चुभतीं। ममता, भय और घृणा का संगम बना उसका चेहरा बार-बार स्नेहा को अतीत में ले जाकर खड़ा कर देता और वह काँप उठती। उसके पैर थरथराने लगते और वह बार-बार अपने केबिन में जाकर बैठ जाती।

ऐसी घटनाएँ तो हॉस्टल में आम बात हैं। अलग-अलग समस्याओं का तत्काल समाधान करते रहने के बाद भी आज न जाने क्यों वह कमज़ोर पड़ रही थी। उसके लिए कभी पूजा, तो कभी उसके सपने, तो कभी माँ… सब एक-एक करके उससे गुहार लगाते। ऐसा लगता कि मानो वह बीच भँवर में फँसकर डूब रही हो। साँसें अफना रही हों।

पूजा का फ़ैसला घर और हॉस्टल, दोनों के लिए मुश्किल पैदा कर रहा था। पूजा अपना फ़ैसला बदलने के लिए तैयार नहीं थी। वह अपना वायवा हॉस्टल में रुककर देना चाहती थी। उसे डर था कि उसके घर वाले उसे अपने साथ ले जाकर या तो जान से मार डालेंगे या जबरदस्ती विवाह करवा देंगे। भारतीय परिवारों में विवाह समस्त समस्याओं का समाधान माना जाता है, भले ही उस विवाह में अनंत समस्याएँ क्यों न विद्यमान हों।

स्नेहा ने पहले ही प्रशासन को पूजा की स्थिति से अवगत करवा दिया था। उसे स्पष्ट निर्देश था कि छात्रा को तत्काल उसके परिवार के साथ भेज दिया जाए। अभिभावक की अनुमति के बगैर किसी भी छात्रा को हॉस्टल में नहीं रखा जा सकता।

अब पूजा और उसका परिवार, दोनों की दलील अपनी-अपनी जगह सही लग रही थी। दोनों पक्षों की बातें सुनकर फ़ैसला लेना मुश्किल हो गया। स्नेहा ने चीफ वार्डेन को फ़ोन लगाया और दोनों ही पक्षों की बातों से अवगत करवाते हुए उनसे पूछा, ‘ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिए?’

‘सीधी-सी बात है कि अभिभावक छात्रा को लेने आए हैं, उसे अभिभावक के साथ भेज देना चाहिए।’

‘पर…’

‘अभिभावक की आज्ञा के बिना उनके बच्चे को हॉस्टल में नहीं रखा जा सकता। आप तुरंत उसका सामान पैक करने के लिए कहिए और उसे उसके अभिभावक के साथ घर भेज दीजिए।’

‘जी मैम।’

स्नेहा जानती थी कि सरकारी तंत्र नियमों पर चलता है। मुसीबत में नियम ही छात्राओं, वार्डेनों और हॉस्टल को बचाते हैं। नियमानुसार न चलने की चूक के कारण नौकरी से हाथ धोना पड़ सकता है। स्नेहा ने स्टाफ से कहकर पूजा को बुलवाया। पूजा के पठार चेहरे पर नदी झरझरा कर बह चली, ‘मैम, यदि मैं घर गई तो ये लोग मुझे मार डालेंगे। यह सब कुछ आपके एक फ़ैसले पर टिका है।’

केबिन में कुछ देर के लिए सन्नाटा छा गया। बंद केबिन में जैसे सारे रास्ते बंद हो गए हों। कुछ परिस्थितियों में मौत कितना आसान है और जीवन कितना मुश्किल! जन्म लेने के बाद जीवन तो मिल जाता है, पर जीवन जीने का अधिकार दूसरों के हाथ में होता है!

‘सामान पैक करो। आपके अभिभावक की आज्ञा के बिना मैं आपको न तो हॉस्टल में रख सकती हूँ और न ही कहीं और जाने की आज्ञा दे सकती हूँ… आप अपनी सुरक्षा के लिए पुलिस से सहायता ले सकती हैं।’ वार्डेन की आँखें शुष्क हो आईं।

‘अपने घर वालों को कैसे पुलिस के हवाले कर दूँ?’ पूजा का परिवार-प्रेम जाग उठा।

‘जब पुलिस से भी सहायता नहीं लेनी है, तो घर जाइए।’ दृढ़ स्वर में स्नेहा ने कहा।

‘क्या यह आपका आख़िरी फ़ैसला है?’ पूजा की आवाज़ काँपी।

‘हाँ।’

स्नेहा की ‘हाँ’ पूजा को बरछे की तरह चुभी।

पूजा ने अपने वार्डेन स्नेहा को कभी इतना कठोर नहीं देखा था। आज के दिन स्नेहा की कठोर ‘हाँ’ ने उसे अंदर से लहू-लुहान कर दिया। वह ठिठक गई, पर विचलित नहीं हुई। कुछ देर तक स्नेहा के कुछ और कहने की प्रतीक्षा करती रही। पर जवाब न पाकर अपने कमरे में चली गई।

पूजा जितनी अधिक व्यथित थी, उससे अधिक स्नेहा तड़फड़ा रही थी। उसे कोई उचित रास्ता नज़र नहीं आ रहा था। वह छात्राओं के सामने कमज़ोर नहीं पड़ सकती थी और न ही वह अपनी दृढ़ता में तनिक भी कमी दिखा सकती थी। उसे पूजा की बातों पर कहीं-न-कहीं विश्वास था, इसलिए वह ‘अभिभावकों के साथ घर भेजने’ जैसा कठोर फ़ैसला नहीं ले पा रही थी। वह अंदर ही अंदर टूट रही थी, पर डर था कि कहीं उसके चेहरे पर दिख रहा रौबदार तेवर दीवार पर लगे पलस्तर की तरह उजड़-उजड़ कर गिर न जाए। इसलिए वह बार-बार टहलने लगती और कभी अँधेरे में तो कभी रौशनी में जाकर अपने आपको सँभालने का प्रयास करती।

सरकारी तंत्र ज़िम्मेदारियाँ देता है, पर स्वयं फ़ैसला लेने की स्वतंत्रता नहीं देता। उसने डीन स्टूडेंट अफेयर्स से लेकर रजिस्ट्रार तक को फ़ोन लगाया। सभी जगह से उसे नियमानुसार चलने का जवाब मिला, ‘हमें छात्रा से पूरी सहानुभूति है। परंतु यहाँ इमोशन की जगह नहीं होती, नियमों का पालन करना होता है। आप छात्रा को तत्काल उसके घर भेजिए।’

कार्यस्थल पर संवेदनशील दिखना पेशे का ही एक हिस्सा होता है। ज़रूरी नहीं है कि जो व्यक्ति सामने से मुस्कराकर, संवेदनशील होकर बात कर रहा है, वह अंदर से भी उतना ही संवेदनशील हो। नियमों में बँधा आदमी संवेदनशील होने के अभिनय में कभी-कभी इतना ढल जाता है कि लोग उसके अभिनय और स्वभाव में अंतर नहीं समझ पाते। आज स्नेहा सभी के अभिनय को देख रही थी और स्वयं भी अभिनय कर रही थी। लेकिन बीच-बीच में उसकी अंतरात्मा उसे धिक्कारने लगती तथा पूजा और उसकी माँ के साथ संवेदना जताते हुए खुद से घृणा महसूस करने लगती। उसे महसूस हो रहा था कि वह मनुष्य होने से अधिक नियम है। वह जानती थी कि संवेदनशील होना उसके लिए घातक है, जिसका खतरा वह कई बार उठा भी चुकी है।

स्नेहा अपने ऑफिस में कुर्सी पर निढाल बैठ गई। एक ओर पूजा की ज़िन्दगी और दूसरी ओर उसकी माँ की लाचारी, भाई का गुस्सा और प्रशासन का नियम। शाम 7 बजे से रात के 9 बज चुके थे, पर न तो पूजा हॉस्टल से जाने के लिए तैयार थी और न ही उसकी माँ और भाई उसे लिए बिना जा रहे थे। पूजा की नकार सुनकर माँ विमला छटपटा-छटपटा कर रह जाती और बार-बार अपनी बच्ची को घर ले जाने की गुहार लगाती।

स्नेहा अपने केबिन के पारदर्शी ग्लास से पूजा के चेहरे पर मौत का भय और भाग जाने का दुस्साहस एक साथ देख पा रही थी। वह माँ से छुपकर जल्दी-जल्दी किसी को मैसेज करती और फ़ोन छुपाकर माँ के पास जाती। माँ विमला पूजा के सामने बेबस और लाचार दिख रही थी। वह पूजा के पैरों पर अपना सिर रख देती, लेकिन पूजा जड़ बनी रही।

यह दृश्य स्नेहा के लिए असहनीय बन गया। उसने पूजा को बैग पैक कर तत्काल हॉस्टल से रवाना होने के लिए कहा। पूजा झनझनाते हुए अपने कमरे में चली गई। स्नेहा का गुस्सा विमला पर फूटना चाह रहा था, लेकिन नियमों में एहतियात बरतना ज़रूरी था।

उसने कुछ देर बाद पूजा की अंतरंग सहेलियों को बुलाया और एकांत में बातचीत की।

‘मैम, यदि पूजा घर गई, तो उसकी शादी कर दी जाएगी। तब भी वह ज़िन्दा होकर ज़िन्दा कहाँ रह सकेगी! और अगर पूजा को लोग जान से मार देते हैं, तब भी पूजा को दुश्चरित्र ही कहा जाएगा। पूजा के घर वालों को हम जानते हैं, उसे पक्का मार देंगे।’ पूजा की एक सहेली ने कहा।

‘इससे अच्छा वह जहाँ जाना चाहती है, प्लीज़ उसे जाने दीजिए। कम-से-कम वह ज़िन्दा तो रहेगी। अपने अच्छे-बुरे की ज़िम्मेदार वह स्वयं होगी।’ पूजा की दूसरी सहेली ने कहा।

केबिन में कुछ देर के लिए सन्नाटा छा गया। बंद केबिन में जैसे सारे रास्ते बंद हो गए हों। कुछ परिस्थितियों में मौत कितना आसान है और जीवन कितना मुश्किल! जन्म लेने के बाद जीवन तो मिल जाता है, पर जीवन जीने का अधिकार दूसरों के हाथ में होता है!

स्नेहा के लिए पूजा की ज़िन्दगी, अभिभावकों की इच्छा और प्रशासन के नियम—तीनों ज़रूरी थे। वह कुछ देर किसी गहरी सोच में डूबे रहने के बाद पूजा की सहेलियों से उसे समझाने के लिए कहा और बैग पैक करके तैयार होने का सख़्त निर्देश दिया। वे सहेलियाँ दुखी मन से पूजा के कमरे में चली गईं।

स्नेहा के चेहरे पर अतीत की रेखाएँ खिंच जाती हैं और उसके सीने में छात्रा को बचा लेने की हूक-सी उठती है। लेकिन अपनी नौकरी को खतरे में डालकर यह कदम उठाना कत्तई सही नहीं। लेकिन क्या किसी की जान से अधिक प्यारी उसकी नौकरी हो सकती है? उसकी आत्मा उसे बार-बार धिक्कारती है और चाहती है कि प्रशासन से छात्रा को बचा लेने की गुहार लगाए। पर वह जानती है कि कोई भी व्यक्ति विश्वविद्यालय के नियमों के खिलाफ जाकर किसी भी विद्यार्थी का साथ नहीं दे सकेगा।

उसके दुश्चरित्र होने पर मोहर उस समय लग गई, जब दी की माहवारी टलती रही। माहवारी तो उसकी हमेशा देर से होती थी, लेकिन इस बार माहवारी न आना उसके चरित्र का प्रमाण बन गया।

छात्रा पुनः एक बार वार्डेन के ऑफिस में प्रवेश करती है, ‘मैम।’

‘बैग पैक कर लिया?’

‘हाँ मैम, पर आप मुझे हॉस्टल से जाने के लिए मत कहिए। आप मेरा विश्वास कीजिए, मैं हॉस्टल से कहीं नहीं भागूँगी। आज मेरी आख़िरी लिखित परीक्षा थी। मैं चाहती तो आज ही चली गई होती, लेकिन मैं रुकी हुई हूँ। क्योंकि दस दिन बाद मेरा वायवा है। वायवा देने तक मुझे रुकने दीजिए।’

‘पर आपके घरवाले नहीं चाहते कि आप हॉस्टल में रहें।’

‘मैं आगे पढ़ना चाहती हूँ, जीवन में कुछ करना चाहती हूँ।’

‘सच-सच बताओ, समस्या क्या है?’

‘मेरे पापा ने एडमिशन करवाया था, अब वे नहीं रहे। पापा के जाने के बाद एक दूर के चाचा जी मुझे पढ़ा रहे हैं। मेरा भाई उनसे मेरा अनैतिक संबंध जोड़कर देखता है, जबकि ऐसा नहीं है। मेरे भाई को लगता है कि मैं हॉस्टल में रहकर बिगड़ गई हूँ। मेरा भाई इन्हीं सब ग़लतफ़हमियों के कारण मेरी शादी करवाना चाहता है। मैं शादी नहीं करना चाहती। मैं पढ़-लिखकर कुछ बनना चाहती हूँ।… मैं शादी से बचने के लिए चाचा जी के पास दुबई जाने की तैयारी कर रही हूँ। जब से इन लोगों को यह बात पता चली है, तब से ये लोग मेरी जान के दुश्मन बन गए हैं।… मेरी बात कोई नहीं समझ रहा।… मुझे नहीं समझ में आ रहा कि मैं क्या करूँ? मुझे बचा लीजिए।’

‘क्या सिर्फ़ यही बात है?’

‘हाँ मैम।’

‘मैं नियम के खिलाफ नहीं जा सकती। दस मिनट में तुम यहाँ से निकल जाओ।’

‘मैं नहीं जाना चाहती। मैम, इस समय आप ही एक हैं जो मेरी रक्षा कर सकती हैं।’

स्नेहा ने स्टाफ को आवाज़ दी और पूजा का बैग उसके कमरे से ले आने का इशारा किया। पूजा जड़वत् खड़ी रही और कुछ देर के बाद रुआँसी होकर केबिन से बाहर निकल गई।

स्नेहा ने केबिन का दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया। उसकी आँखें झरझरा कर बह चलीं। चेहरा निस्तेज होने लगा, गला सूखने लगा, हृदय में तूफ़ान और शरीर पसीने से तर-बतर हो गया। वह काँपने लगी। वह कुर्सी पर सपाट बैठ गई। जैसे बैठी थी वह कभी तीस वर्ष पहले घुप्प अँधेरे कमरे में। वही तूफ़ान आज फिर से उमड़ आया था।

उसकी आँखों के सामने सीना पकड़कर दर्द से कराहती और उल्टियाँ करती हुई चचेरी दी का चेहरा उभर आया। उल्टियाँ करते समय दी की आँखों की पुतलियाँ जैसे बाहर की ओर निकल आएँगी। जीभ होठों से एक ओर बाहर लटक जाती और फिर धीरे-धीरे अंदर वापस जाती। चेहरा नीला पड़ता जा रहा था। कलेजा कट-कट कर खून के साथ निकल रहा था। उसकी तीनों बहनें तुरंत उसके मुँह से गिरती उल्टियों को लपक-लपक कर साफ कर देतीं। पति और बेटी में से किसी एक को चुनने की शर्त पर पति के पक्ष में फ़ैसला ले चुकी उसकी माँ सिरहाने बुत बनी बैठी देख रही थी। वह कभी दी के छटपटाते सिर को अपनी गोदी में रख लेती, तो कभी उसकी छाती को सहलाती, तो कभी बहती आँखों को अपनी ही बेटियों से छुपाने की कोशिश करती। वह अपनी ही बेटी को आँखों के सामने तिल-तिल तड़पकर मरते हुए देख रही थी और अन्य तीन बेटियों के मज़बूत कलेजे को भी।

उस रात आधी रात में जब स्नेहा की आँख खुली और उसने अपने कमरे में दी को नहीं देखा, तब वह अनहोनी की आशंका से डर गई। दी तो बहुत पहले ही पानी पीने गई थी, वह क्यों नहीं लौटी? कहीं आज ही…

दो दिन पहले खाना खाते समय स्नेहा और दी दोनों अकेली थीं। दी खाना नहीं खा रही थी, तब उसने दी के उदास और सफेद चेहरे को हाथों में लेते हुए पूछा। दी फफक-फफक कर रोने लगी, ‘मुझे बचा लोगी न?’

‘हाँ, हाँ, मैं वादा करती हूँ कि तुम्हें बचा लूँगी।’

‘मैं मरना नहीं चाहती।’

दोनों गले लगकर रोने लगीं।

तेरह वर्षीय स्नेहा को उन्नीस वर्षीय दी की बात ठीक से समझ नहीं आ रही थी। स्नेहा को हमेशा घर में अलग-थलग रखा जाता। वह बड़ों की बातों में शामिल नहीं होती। वह शामिल होती भी तो कैसे? बड़े पिता जी का परिवार बिन माँ की बच्ची को पाल रहा था। वह घर में होते हुए भी घरवालों की नज़रों में अदृश्य ही रहती। सबकी तेज़-तर्रार और डाँट-डपट के बीच अनचाही-सी रहने वाली डरी-सहमी स्नेहा, दी को उसके ही परिवार से बचाने का वादा कर रही थी।

दी का दुआह आदमी से ब्याह तय हो गया था। वह उससे ब्याह नहीं करना चाहती थी। उसने ब्याह से बचने के लिए किसी अन्य लड़के से प्रेम करने का दावा किया और उस लड़के से सहायता भी माँगी। लड़का सहायता के लिए तैयार हो गया तथा दोनों ने प्रेम में होने का अभिनय किया। ब्याह तोड़ने का यह तरीका दी के ऊपर उल्टा पड़ गया। वह दुश्चरित्र साबित कर दी गई।

उसके दुश्चरित्र होने पर मोहर उस समय लग गई, जब दी की माहवारी टलती रही। माहवारी तो उसकी हमेशा देर से होती थी, लेकिन इस बार माहवारी न आना उसके चरित्र का प्रमाण बन गया। इसलिए दी रो रही थी।

बहनों का ताना और रोज़ मारपीट करना अब उससे सहन नहीं हो रहा था। उसने माहवारी होने के लिए दवा मँगवाई।

दूसरे दिन स्कूल से वापस आते समय स्नेहा ने मेडिकल शॉप से दवा लाकर दी को दी। दोपहर में खाई एक गोली से शाम तक कोई असर दिखाई नहीं दिया, तो उसने घबराकर शाम में दो गोलियाँ और खा लीं, जिससे उसे उल्टियाँ होने लगीं। दी की बहनों को विश्वास हो चला कि उसके पैर भारी हो चुके हैं। दी उल्टियाँ कर रही थी और उसकी बहनें उसे पानी देने के बजाय पीठ पर मुक्के मार रही थीं।

कड़कती ठंड थी। वह चुपचाप कमरे में आ गई। उसने अपने आपको रज़ाई से ढक लिया और बेआवाज़ घंटों रोती रही। ज़रूरत से अधिक दवा खाने के विषय में पूछने पर उसने बताया, ‘आज वे लोग मुझे ज़हर देकर मारने वाले थे। मैं बहुत डर गई थी। मुझे लगा कि महीना हो जाएगा तो मेरी जान बच जाएगी।’

सुबह तक माहवारी हो गई। दी को राहत मिली। रात में दी खुश होकर दूध-भात और साग खाई। हम दोनों साथ में सोने गए। आधी रात में जब आँख खुली, तब दी को न देखकर मन संशय से भर उठा। सभी कमरों में ढूँढ़ते हुए उस कमरे तक पहुँची, जहाँ दी के आख़िरी साँसों का इंतज़ार किया जा रहा था। दी का चेहरा, उसकी उल्टियाँ और हाँफना… सब कुछ…

जहाँ बोलने की हिम्मत नहीं थी, वहाँ स्नेहा हिम्मत बाँधकर बोली, ‘तुम लोग ग़लत कर रहे हो। मैं जाकर सभी को बताऊँगी।’

उसकी एक बहन ने डाँटना शुरू कर दिया, ‘तुम नमकहराम हो। जिस थाली में खाती हो, उसी में छेद करती हो। जाकर अपने कमरे में चुपचाप सो जाओ।’

उसके बाद स्नेहा दौड़ते हुए दी के भाई के पास गई। उसके सामने हाथ जोड़े, पर उसने कहा, ‘जो हो रहा है, होने दो।’

स्नेहा को कुछ समझ में नहीं आ रहा था। वह रोते-रोते अपने कमरे में गई। जब रोना बंद हुआ, तब दरवाज़ा खोलना चाहा, लेकिन दरवाज़ा बाहर से न जाने कब बंद हो गया था, जो पीटने-खटखटाने पर भी नहीं खुला।

अचानक केबिन का दरवाज़ा किसी ने खटखटाया। स्नेहा अतीत की भयानक गुफा से बाहर निकली। आज किसी ने दरवाज़ा बाहर से बंद नहीं किया है, बल्कि स्नेहा ने स्वयं बंद कर रखा है।

‘जन्म लेना और देना दोनों ही पीड़ादायक होता है। जब बीज को मिट्टी में दबाया जाता है, तब मिट्टी के साथ-साथ बीज को भी संघर्ष करना पड़ता है। जन्म के बाद मनुष्य को विपरीत परिस्थितियों से बार-बार संघर्ष करना पड़ा है और उन परिस्थितियों से बाहर निकल आना भी एक जन्म ही होता है। दी के जाने के बाद उस परिस्थिति से निकलना भी एक जन्म था और आज पूजा का भी इस परिस्थिति से निकलना एक जन्म ही होगा। यदि आज पूजा हार गई, तो मैं खुद हार जाऊँगी। दी को तो नहीं बचा सकी, लेकिन पूजा को…।’ स्नेहा फिर खो गई।

दरवाज़े पर फिर से खट-खट हुई। स्नेहा ने दरवाज़ा खोला तो सीनियर स्टाफ आ चुकी थी, ‘मुझे यहाँ आपके साथ रहने के लिए भेजा गया है। आप अकेली हैं… आप परेशान लग रही हैं।’

‘मुझे लगता है कि इस लड़की को उसके घर नहीं भेजना चाहिए। यदि यह गई तो बचेगी नहीं।’

‘मैम, इतना इमोशनल नहीं होते। उनकी लड़की, वे लोग जो चाहें, वे करें। हमारी जान तो छूटेगी।’

‘ऑनर किलिंग कभी देखी है? मैंने देखी है।’ स्नेहा ने गुस्से से कहा और उसे तत्काल एहसास भी हो गया कि वह अपना संयम खो रही है। उसने स्वयं को सँभाला, ‘सॉरी, प्रशासन का आदेश और नियमों का हमें पालन करना ही होगा। हमारे हाथ में है ही क्या?’

स्टाफ ने छात्रा का बैग हॉस्टल के बाहर रख दिया। उसकी माँ विमला ने बैग उठाया और पूजा को साथ चलने के लिए कहा। पूजा अपनी जगह से नहीं हिली। माँ चिल्लाते हुए तेज़ क़दमों से गेट की ओर बैग लेकर बढ़ती जा रही थी, ‘पता नहीं कहाँ से ये इत्वरी जन्म ले ली। अपने भाई-बाप की नहीं सुन रही। घर नहीं तो कहाँ जाएगी। बाहर कौन है इसका? अपने साथ-साथ हम सबको कटवाएगी…।’

‘लीक से चलने वाली स्त्रियों को समाज इत्वरी ही कहता है।’ स्नेहा ने मन में सोचा और पूजा की रुआँसी और आस-भरी आँखों में देखते हुए कहा, ‘अपने चाचा से बात करवाओ।’

‘फ़ोन और बैग मम्मी-भाई के पास लेकर जा चुके हैं। अब मेरे पास कुछ नहीं बचा है।’

स्नेहा ने गेट पर सिक्योरिटी गार्ड से फ़ोन पर बात करके भाई के हाव-भाव का जायज़ा लिया। वह बेहद शांत दिख रही थी, पर मन में हलचल थी। विमला अपने बेटे को बैग और फ़ोन देकर पूजा को अपने साथ ले जाने के लिए हॉस्टल आ गई। पूजा जाने के लिए तैयार नहीं थी। स्नेहा ने बड़े प्यार से उसके कंधे पर हाथ रखा, ‘जाओ, अपने घर जाओ।’

पूजा की आँखों में रात उतर आई। उसके पास कोई उम्मीद नहीं बची।

स्नेहा ने स्टाफ को आदेश दिया, ‘रात के साढ़े ग्यारह बज चुके हैं। गेट नंबर एक के बजाय गेट नंबर दो पर छोड़ आओ। हॉस्टल की सारी फॉर्मेलिटीज़ पूरी होनी चाहिए और गेट पर आउट रजिस्टर में अपने सामने एंट्री करवाकर वापस लौटना।’

सीनियर-जूनियर दो-तीन स्टाफ पूजा और उसकी माँ को गेट तक छोड़ने गया। उसकी सहेलियों ने पूजा को नम आँखों से विदाई दी। वे दुखी मन से हॉस्टल में बैठी रह गईं। स्नेहा का मन था कि वह भी पूजा को गेट तक छोड़ आए, पर अपने पद की गरिमा के ख़याल से नहीं गई।

विमला ने अपने बेटे को गाड़ी लेकर गेट नंबर दो पर आने के लिए कहा। पूजा ने हॉस्टल के गेट पर रखे रजिस्टर में एंट्री की और अपनी माँ के साथ बाहर चली गई। स्टाफ लौट आया।

स्नेहा उदास मन से घर लौट आई और निढाल होकर कुर्सी पर पसर गई। उसके कानों में लगातार गूँज रहा था—‘मैं मरना नहीं चाहती।’ आँखों के सामने कभी दी तो कभी पूजा घूम रही थी।

तभी फ़ोन की घंटी बजी। सीनियर स्टाफ का फ़ोन था, ‘मैम, गेट पर पूजा का भाई हंगामा कर रहा है।’

‘क्यों?’

‘उसका कहना है कि हमने लड़की को भगा दिया!’

‘क्या?’ स्नेहा हड़बड़ाकर उठी।

‘हाँ, वह भाग गई!’

‘कैसे? आप लोग कहाँ थे?’ स्नेहा हॉस्टल की ओर तेज़ क़दमों से भागी।

‘लड़की और उसकी माँ दोनों ही हमारी आँखों के सामने साथ-साथ निकले थे। हम लोग हॉस्टल के अंदर आ गए। अचानक से एक कार आने की आवाज़ आई। हमने मुड़कर देखा तो उसकी माँ थोड़ी आगे थी, लड़की पीछे। देखते-ही-देखते लड़की दौड़कर कैब में बैठकर भाग गई! जब तक हम कुछ समझ पाते, कैब निकल गई। उसकी माँ ने कहा कि वह कैब से भाग गई।’

‘उसके भाई ने उसे पकड़ा नहीं?’

‘उसे भी अंदाज़ा नहीं रहा होगा। उसने कुछ दूर तक कैब का पीछा किया, लेकिन कैब पता नहीं कहाँ गायब हो गई। अब वह वापस आकर गेट पर हंगामा कर रहा है। उसका कहना है कि हमने लड़की को भगा दिया है।’

‘हमने तो छात्रा को उसके परिवार को सौंप दिया है। अब वह उनके ही सामने से भाग जाती है, तो हम कर ही क्या सकते हैं?’ (एक लंबी साँस लेकर) ‘पूजा ने हॉस्टल की सभी फॉर्मेलिटीज़ पूरी की हैं न?’

‘हाँ मैम, केस संवेदनशील था, इसलिए हमने वीडियो भी बनाए हैं।’

‘अच्छा किया। आप सुपरवाइज़र से कहिए कि गेट पर कुछ और सिक्योरिटी गार्ड्स को भेज दें। मैं वहीं पहुँच रही हूँ।’

‘जी मैम।’

स्नेहा तेज़ क़दमों से गेट नंबर दो की ओर जाने लगी। हॉस्टल के सामने से गुज़रते हुए स्नेहा की नज़रें दूर खड़ी पूजा की अंतरंग दोनों सहेलियों की नज़रों से टकराईं और तीनों की नज़रों में आश्वस्ति और होठों पर एक लंबी मुस्कान खिंच आई।

Renu Yadav

रेनू यादव का जन्म 16 सितम्बर 1984 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में हुआ। वे गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा के भारतीय भाषा एवं साहित्य विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। हिंदी और भोजपुरी की चर्चित युवा कथाकार, कवयित्री तथा आलोचक के रूप में उनकी पहचान है।

उनकी प्रमुख पुस्तकों में खुखड़ी (भोजपुरी कहानी-संग्रह, 2025), काला सोना (कहानी-संग्रह, 2022), कथाओं के आलोक में : सुधा ओम ढींगरा (2023), महादेवी वर्मा के काव्य में वेदना का मनोविश्लेषण (2010) तथा साक्षात्कारों के आईने में : सुधा ओम ढींगरा (संपादित, 2020) शामिल हैं। उनकी कहानियाँ, कविताएँ और स्त्री-विमर्श पर केंद्रित शोध-लेख देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित होते रहते हैं। वे मासिक पत्रिका साहित्य नंदिनी में ‘चर्चा के बहाने’ स्तंभ का नियमित लेखन भी करती हैं।

रेनू यादव को श्रीलाल शुक्ल स्मृति इफको युवा साहित्य सम्मान (2024), अंतर्राष्ट्रीय प्रेमचंद सम्मान (2025), कमला चौधरी सम्मान (2026) और संत ग्लोबल नेक्स्टजेन आइकॉन अवार्ड (2026) सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है। उनकी कहानियों की विशेषता है कि वे स्त्री-जीवन, सामाजिक संबंधों और मानवीय संवेदनाओं को गहरे मनोवैज्ञानिक धरातल पर अत्यंत सहज, विश्वसनीय और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

How did this make you feel?
🌸
Stay in the loop

Get the latest stories on women's rights in India — straight to your inbox.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Share via
Copy link