जोशना बैनर्जी : ‘ग़ज़ा के पत्र पढ़ने के बाद’ और अन्य कविताएं
जोशना बैनर्जी
समकालीन हिंदी कविता की एक महत्त्वपूर्ण आवाज़ जोशना बैनर्जी की कविताएँ रोज़मर्रा के जीवन, स्त्री-अनुभव, श्रम, प्रकृति, युद्ध और मानवीय करुणा को गहरी संवेदना तथा वैचारिक संयम के साथ अभिव्यक्त करती हैं। उनकी भाषा सहज है, लेकिन उसके भीतर अर्थ की कई परतें खुलती हैं। उनकी कविताएँ मनुष्य के साधारण जीवन में छिपी असाधारण संवेदनाओं को खोजती हैं। वे प्रकृति, श्रम, स्त्री-अनुभव, युद्ध, स्मृति और करुणा जैसे विषयों को बिना किसी वैचारिक शोर के, शांत लेकिन गहरी मानवीय दृष्टि के साथ देखती हैं। उनकी भाषा सहज है, पर उसके भीतर अर्थ की कई परतें खुलती हैं।
इस चयन की कविताओं में कॉल सेंटर की लड़की, चपरासी, नीम, नदी, आकाश, गाज़ा और ताबूत जैसे पात्र व प्रतीक हमारे समय के नैतिक प्रश्नों में बदल जाते हैं। जोशना बैनर्जी की कविता किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचती, बल्कि पाठक को मनुष्य, क्षमा, प्रेम और हिंसा के बारे में नए सिरे से सोचने के लिए विवश करती है। यही उनकी कविता की सबसे बड़ी शक्ति है। शिक्षा और साहित्य, दोनों क्षेत्रों में सक्रिय जोशना आगरा के सेंट ज़ेवियर्स स्कूल की प्रधानाचार्य हैं।
कॉल सेंटर की लड़की
एक गाली सुनने के बाद कहती है
सॉरी सर
चार गाली सुनने के बाद भी यही कहती है
कॉल सेंटर की लड़की
गाली सुनने के बाद ऐसे मुस्कुराती है जैसे गाली एक सुंदर फूल हो
गाली अपने सबसे क्रूरतम रूप में कॉल सेंटर की लड़की के कंठ से क्षमा का सबसे सुंदर राग खींच निकालती है
अहम्मन्यता एक कछुआ है
कछुए की ऊपर की धरती है कॉल सेंटर की लड़की
तुम नाना प्रकार की गालियों और झिड़कियों के साथ जो कॉल सेंटर की लड़की पर टूटते हो
तुमने टूटने की सारी प्रक्रियाएं ही विध्वंस कर दीं है
कितने दुर्भाग्यदार हो तुम कि तुम कभी नहीं देख पाओगे कॉल सेंटर की लड़की का विचलन
पर सोचो किसी दिन यह तुम्हारे सामने आ गयी अचानक
क्या होगा
तुम्हारा जीवन बिना क्षमा के ही समाप्त हो जायेगा।
शिकायतो के इतिहास में तुम कितने बौने लगोगे एक कॉल सेंटर की लड़की के सामने।
नीम
कौन प्रेम करता है तुमसे?
पूछा उसने
सामने से उत्तर मिला, “नीम का पेड़”
क्या कहता है नीम का पेड़?
मेरे अंदर से दुःख खींचता है?
पता कैसे चलता है?
उसे आलिंगन करने पर हथेली में
झनझन होती है, फिर सब ठीक हो जाता है।
और क्या करता है नीम?
उसे उत्सुकता हुई।
अपने नीमफूल झाड़ता है मुझपर,
इस प्रकार छूता है।
प्रेम करना और छूना नीम ने किस प्रकार सीखा?
वैसे ही जैसे हम सीख जाते हैं छल करना।
परंतु नीम तो कड़वा है न?
हाँ कड़वा होना कुरूप होना नहीं।
नीम से जाकर कहो मनबात,
नीम के पास अथाह प्रेम है।
नदी
जन्म, मरण, वेग, सुख, दुःख
सब नदी से मिला,
पिता की नौका, माँ का घाट
नदी ने हीं दिया।
नदी में ही सोया है मेरा मृतक पुत्र
नदी से ही उठा था प्रेयस का कमल।
तुम नदी तक जाकर लौट नहीं पाओगे,
नदी तुम्हें लौटना नहीं सिखायेगी।
रूकी हुई नदी को देखने पर
दिखता है बचपन,
पीछे दिखते पूर्वज सभी।
एक पूरे युद्ध का हाहाकार,
एक पूरी नींद की अर्धमृत्यु नदी के पास सुरक्षित है।
जाओ बंधु, तुम अपनी कला का खनिज खोजो उसमें।
हे नदी, मुझे क्षमा स्वीकार करना सिखाओ।
आकाश
गुलाबी मात्र हल्का लाल है, अपनी तरंग दैर्ध्य छोड़ता हुआ, नीला फैला पड़ा है।
आकाश इस समय गुलाबी है।
गुलाबी आकाश को देर तक देखने से पुतलियाँ गुलाबी हो जाती हैं।
जलभार जितना अंतिम, बीज जितना प्रथम।
तुमने कहा आकाश अंतिम है,
नहीं आकाश कतई अंतिम नहीं।
आकाश का सुंदर मुख लावण्य उजला है,
देखो, खोजो उसमें स्वप्न सभी।
बचाओ अपने संधिपत्र,
जैसे आकाश बचाए रखता है हमारी आँखों में दृश्य,
वृष्टि की छुअन और मृतक माता पिता की छवि।
चपरासी
कितना सूक्ष्मग्राही है वह
गंभीर, झुकी आँखें, पुनः पुनः
नमस्कार करता सबको
निरर्थक, निरर्थकप्राय चपरासी
कितना स्थिरशील है
सबके जाने के बाद शाम चार बजे
कहता है मुझसे,
“चले मैडम, कल आना भी है”
संधि विग्रह रेखा जितनी दुनिया
का मालिक, वह चपरासी
माता पिता जिसे द्वारपाल कहा करते थे,
जिसके पास वाद विवाद, उत्तर, प्रतिउत्तर किसी का भी अधिकार नहीं,
वह चपरासी
हम सब के रहस्य जानता है।
उतना, जितना कि हमारे अपने भी नहीं जानते।
चपरासी,
तुम्हें कभी भी उघाड़ सकता है।
अति
उतनी भी अति नहीं थी कि
मुझे देश निकाला दे दिया जाता।
अति तो उतनी भी नहीं थी कि
मुझसे छिन लिया जाता कागज़ और कलम
परंतु फिर भी ऐसा हुआ
बाल बाल बची थी मैं देश से निकलते निकलते
बच गया था मेरा कागज़, कलम ज़ोर से पकड़ रखी थी मैंने
रसोई में नहीं चल सकी कविता
चौक चौपाल में फिर भी थोड़ी बहुत चल जाती थी
एक सर्ग बनी रह गयी मैं,
मुझपर शासन करने वाले सभी थे चरमबिंदु
जिस घर में रहती हूँ मैं,
वह एक देश ही है।
मैंने देश का नमक खा लिया है,
कविता तक आते आते थोड़ी सी जासूस बन चुकी हूँ, थोड़ी सी विद्रोही।
‘अति’ मैं ही हूँ। मेरा ही नाम अति है।
ग़ज़ा के पत्र पढ़ने के बाद
बहुत कोमल था जीवन
सबकुछ एकदम सही दिशा में चलता हुआ
भी स्थिर था
पेट में रोटी, कंठ में पानी, जूते भीतर मोज़ा,
सबकुछ ठीक समय से चलता हुआ
समय से चलती घड़ी, मिलती तनख़्वाह और आती सांस
सबकुछ एकदम ठीक
भरी हुई पृथ्वी पर अचानक से निकल कर मेरे सामने आ गये ग़ज़ा के पत्र
तब,
तब तलवे हुए सुन्न
दिखा हवा का आकार
पानी का आकार अब पता चल रहा था
ग़ज़ा के पत्र पढ़ने के बाद
अनुपस्तिथि की एक परत ने मुझे घेर रखा था
मैं कुछ भी कर सकने की स्थिति में नहीं थी
मैं कुछ भी न कर सकी
हृदय भरा नहीं, खाली होता चला गया
ग़ज़ा के पत्र पढ़ने के बाद
जैसे वही पत्र एक धारदार हथियार बनकर मेरे अंदर बार बार आ और निकल रहे थे
छिन्न भिन्न,
रक्त और हाहाकार समेत,
अब मैं एक खोल हूं मात्र,
भर दिए गये हैं मेरे अंदर ग़ज़ा के पत्र।
मैं ताबूत बनाती हूँ
मैं हबीब की पत्नी हूँ,
ताबूत बनाने में उसकी मदद करती हूँ,
कभी कभी जब वो थककर सो जाता है,
उससे भी बेहतर और सुंदर ताबूत बनाती हूँ,
इतने बेहतर कि उसमें लेटा कोई भी आराम से सो सकेगा,
इतने सुंदर कि कितना भी कुरूप हो शव,
मेरे बनाये ताबूत में सुंदर ही लगेगा।
मेरी आमदनी बढ़ गयी है
खूब बच्चे आये पिछले दिनों
भूख और युद्ध से मरकर बच्चे मेरी आमदनी बढ़ा रहे हैं,
मुझे सांस लेने की आवाज़ें भी युद्ध लगती हैं
किसी मधुमक्खी की हुं से लगता है
कोई बम गिरा है
मेरे खुद के बच्चों की करवटों से कान सुन्न हो जाते हैं
मेरे लिए जीवन उतना ही है जितना है एक ताबूत
और ताबूत उतना ही जिससे चलता है मेरा जीवन,
हबीब अब ज़्यादा प्यार करने लगा है,
मैं और अधिक रिक्त होने लगी हूँ,
मेरा काम एक अजोत खालीपन है, इसे जोतने का साहस कर रही हूँ।
बीज
कैसे लगते हैं बीज?
सुप्रभात के संदेशों की तरह।
उस एक बीज ने क्या किया?
बीज ने? बीज एक शिशु तरह मुझतक आया,
खाद्य की तरह किया मेरा उपयोग
और अंततः
मेरी आने वाली पीढ़ी के शिशुओं के लिए
पिता बन गया।
बीज के अंदर क्या था?
मेरा प्रेमी।
और बाहर?
जीवन की जुगत।
संसार छले, तो बीज के पास ही जाना।
