साहित्य

निहाल सिंह की ‘फूलों के मौसम में’ और अन्य प्रेम कविताएं

निहाल सिंह का जन्म 17 फरवरी 1977 को राजस्थान के झुंझुनूं जनपद के दुधवा गाँव में हुआ। वे कृषि कार्य से जुड़े हैं और वर्ष 2005 से लेखन कर रहे हैं। उनकी रचनाएँ अनुनाद, सेतु, कृत्या, समता मार्ग, शब्द बिरादरी, गोल चक्कर, पहली बार, हिन्दी कुंज, साहित्य कुंज, आंच, ईरा, संवाद जान्हवी, छत्तीसगढ़ मित्र आदि पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। ग्रामीण जीवन और पहाड़ी परिवेश, प्रकृति, प्रेम और प्रतीक्षा उनकी कविताओं के प्रमुख संदर्भ हैं। उनकी कविताओं में प्रेम किसी बड़े दार्शनिक विमर्श के बजाय रोजमर्रा के अनुभवों, प्रकृति के दृश्यों और सहज मानवीय संवेदनाओं के बीच आकार लेता है।

निहाल सिंह की प्रस्तुत प्रेम कविताओं में प्रकृति और प्रेम एक-दूसरे से अलग नहीं दिखाई देते। पहाड़, बारिश, बर्फ, परिंदे, झरने, सेबों के पेड़, भेड़ें, बाँसुरी और चाय के बागान प्रेम की अनुभूति को व्यक्त करने वाले सहज बिंब बन जाते हैं। इन कविताओं में प्रेम का एक महत्वपूर्ण स्वर प्रतीक्षा का है। दूर रह रहे प्रिय की चिंता, उसके लौटने की उम्मीद और उससे मिलने की कल्पना बार-बार सामने आती है। कवि की भाषा सरल और बातचीत के करीब है, जबकि ग्रामीण और पहाड़ी परिवेश से आए बिंब कविताओं को उनकी अपनी एक दृश्यात्मकता देते हैं। इन रचनाओं में प्रेम कहीं कोमल और आत्मीय है, तो कहीं देह और स्पर्श की इच्छा को भी बिना किसी जटिलता के व्यक्त करता है। इस तरह ये कविताएँ प्रेम को प्रकृति, स्मृति, प्रतीक्षा और देह की सहज संवेदनाओं के साथ देखने का प्रयास करती हैं।


पहाड़ी के उस पार

पहाड़ी के उस पार कैसा
मौसम है
इस पार तो बारिश हो रही है
सेबों के पेड़ों पर परिंदे बैठे हैं
एक-दूसरे से चिपककर
हौले से बूँदें गिर रही हैं
पत्थरों के अधरों पर
झरनों से नीर निरंतर बह रहा है
बुलबुले उड़ रहे हैं मेघों के
कैमरे में कैद करके ले जा रही हैं
नज़ारों को कुछ युवतियाँ

तुम्हारी बस्ती में भी बारिश हो रही होगी
वहाँ भी परिंदे बैठे होंगे छुपके से
सेबों के पेड़ों पर
लेकिन तुम बाहर मत निकलना
वरना भीग जाओगी
ये बर्फीली बयारें तुम्हारी मुलायम देह को
बीमार कर देंगी

बारिश से पहाड़ सरक गए हैं
जहाँ जम गई है मिट्टी गलियारों में
जो तेरी बस्ती की ओर जाते हैं
मिट्टी हटाते ही बर्फ़ गिरने लग जाएगी
फिर निकलना मुश्किल हो जाएगा
मेरा इस बार भी नहीं होगा
तेरी बस्ती की ओर आना

हाँ, कुछ परिंदे उड़कर आएँगे
जिनके पंखों पर मेरे हाथों की मिट्टी लगी होगी
तुम अपने दुपट्टे पर लगा लेना
कुछ ठंडी हवाएँ उड़कर आएँगी
जिसमें मेरी साँसें घुली होंगी
तुम अपने होंठों पर रख लेना
कुछ बूँदें गिरेंगी हौले से
जो मेरी आँखों से बहकर आएँगी
तुम अपनी पलकों पर रख लेना

किसी ऊँची पहाड़ी

किसी ऊँची पहाड़ी की ओट में
भेड़ों के साथ बाँसुरी बजाते हुए मिल जाऊँगा
मैं तुम्हें
बाँसुरी की धुन सुनकर भेड़ें लौट आती हैं
पथरीली राहों से चरकर

तुम्हें आना हो तो पायल पहनकर आ जाना
पाँव में
ऊँची चोटी वाली पहाड़ी के पीछे
मैं वहीं मिलूँगा अपनी भेड़ों के साथ
होंठों पर बाँसुरी सजाए हुए

अगर वादियों में आँख भी लग जाए तो
तुम मन में व्यग्रता मत लाना अपने
बस मेरे कान के पास हौले से पायल खनका देना
उसकी तान जब किसी पहाड़ी से टकराकर आएगी
मेरे कान के पास
तो मैं जाग जाऊँगा

पथरीली राहों में मोच आ सकती है
तुम्हारी कोमल एड़ियों में
घनघोर झाड़ियों से चिपके काँटे खरोंच कर देंगे
तुम्हारे फूल से चेहरे पर
इसलिए तुम मेरा हाथ थामकर चलना

और फिर मिलाऊँगा तुमको
अपनी भेड़ों से
घाटियों में लथपथ हुए सेबों की झाड़ियों से
बर्फ़ से ढकी ऊँची चोटियों से

साँझ को फिर लौट आएँगे भेड़ों को घेरते हुए
बस्ती की ओर दोनों

तेरे होंठों को

तेरे होंठों को चूमते हुए जो
कॉफी बैठी है काँच के गिलास में
मैं एक बार उसको अपने होंठों से
लगाना चाहता हूँ

जो मिठास तेरे होंठों से कॉफी में उतरी है
वो मिठास इस सादी कॉफी में कहाँ
जो मेरे हाथ में बैठे इस गिलास की
ठंडी पड़ी कॉफी
जिस पर मलाई जम गई है
और मक्खी भी बैठी है पैर पसारे

मैं रखना चाहता हूँ तेरे बदन की
मिठास को अपने होंठों पर

फूलों के मौसम में

फूलों के मौसम में अक्सर
परदेसी चले आते हैं बिन बुलाए
मेहमान की तरह
पहाड़ों की सैर करने

उन परदेसियों पर दिल हार जाती हैं
पहाड़ों की खूबसूरत लड़कियाँ
जिनके गालों पर सेबों की लालिमा
बैठी होती है
जिनकी कमर केले की टहनी की तरह
लचीली होती है
जिनकी आँखें झील में खिले कँवल की तरह होती हैं

ऐसी अप्सराओं का दिल तोड़कर चले जाते हैं
परदेसी अपने देस को
और फिर लौटकर नहीं आते

लड़कियाँ देखती रहती हैं पहाड़ों की
चोटियों की ओर
कहीं वो छुपे तो नहीं उसकी ओट में
और घंटों खड़ी रहती हैं डूबते सूरज के आगे
कहीं उसकी रोशनी को देखने ही
आ जाए वो

आखिर तुम कब आओगे

अब तो डूब गया सूरज पहाड़ों
की ओट में
अब तो छुप गई चाँदनी
देवदार के पत्तों के पीछे
अब तो चली गई रेल भी धुआँ छोड़ते हुए
शहर की ओर
अब तो उड़ गए बादल आसमान से
कहीं दूर

अब तो आ गए परिंदे अपने घोंसलों की ओर
अब तो लौट आईं चाय के बागानों में
दिनभर काम करने वाली महिलाएँ
अपनी झोपड़ी की ओर
अब तो आ गए बोगी वाले लेकर अपने
घोड़ों को

मगर तुम नहीं लौटे अभी तक
आखिर तुम कब आओगे

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