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अपने मन का ख़याल कैसे रखें: शुरुआती संकेत, सही मदद और सेल्फ-केयर

निष्ठा अभिजित अग्निहोत्री

मानसिक स्वास्थ्य आज भी हमारे समाज में सबसे कम समझे जाने वाले विषयों में से एक है। विशेषकर महिलाओं से जुड़ी भावनात्मक चुनौतियों पर अक्सर खुलकर बात नहीं होती। प्रस्तुत लेख मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े भ्रमों, शुरुआती संकेतों, सहायता लेने की आवश्यकता और स्वयं की देखभाल के महत्व पर सरल और व्यावहारिक ढंग से चर्चा करता है, ताकि इस विषय को लेकर जागरूकता और संवाद बढ़ सके।

इस लेख की लेखिका निष्ठा अभिजित अग्निहोत्री मूलतः बनारस की हैं और वर्तमान में मुंबई में रहकर लेखन करती हैं। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातक और महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से मास कम्युनिकेशन में स्नातकोत्तर निष्ठा अपने लेखन में मानसिक स्वास्थ्य, आत्मस्वीकृति और जीवन के भावनात्मक पक्षों को संवेदनशीलता और सहज भाषा में पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास करती हैं।


हमारे देश में लोग मानसिक स्वास्थ्य को लेकर बहुत कम सजग हैं। मनुष्य जाति में जन्मे अधिकतर लोग अपना जीवन डिनायल (Denial) में जी रहे होते हैं। खास तौर पर महिलाएँ। हमारी अपब्रिंगिंग में भी समस्याओं को लेकर जागरूक होना नहीं सिखाया जाता है।

बहुत-से घरों में तो शरीर के मर्ज़ के लिए भी डॉक्टर के पास जाना टाला जाता रहता है, तो मानसिक स्वास्थ्य के लिए डॉक्टर के पास जाने को परिवार की मान-मर्यादा भंग हो जाने की श्रेणी में गिना जाता है। जिसके चलते हम सब लगभग अपना सारा जीवन लोगों के बारे में सोचते हुए ही गुज़ार देते हैं कि किसी को ख़राब न लग जाए, कोई बुरा मानकर बात करना न बंद कर दे।

लेकिन अब इस सोच को बदलने की आवश्यकता है।

पुराना सीखा हुआ अनलर्न करने की आवश्यकता है।

स्वयं को लगातार सेल्फ-लव की परिभाषा सिखाते रहने की आवश्यकता है।

ख़ुद को हर दिन यह बताना आवश्यक है कि अपने लिए जीना स्वार्थ नहीं होता और यदि होता भी है तो थोड़ा-बहुत स्वार्थी बनना बिल्कुल ग़लत नहीं है।

सबसे पहले अपने डिनायल को डिटॉक्स करने की आवश्यकता है। जितना अधिक अपने आप पर ध्यान दिया जाएगा, उतना अधिक अपने मन को समझने में आसानी होगी।

स्त्रियाँ हों अथवा पुरुष, वर्किंग हों अथवा होममेकर, अपने दिन का कुछ समय केवल अपने ख़ुद के लिए निकालना शुरू कीजिए। इस समय में आपको पूरी दुनिया का तनाव छोड़कर केवल अपने ऊपर ध्यान देना है।

हम सबको बचपन से दबकर जीना सिखाया जाता है। मन के ख़राब होने को कभी महत्व नहीं दिया जाता। यही कारण है कि धीरे-धीरे भावनाएँ दबते रहने से एक समय बाद दिमाग़ पर से अपना नियंत्रण छूटने लगता है और मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ने लगता है।

इसे सही तरह से समझने के लिए सबसे पहले इसकी पागलपन से तुलना बंद करनी होगी। कोई भी मनोरोग अपने शुरुआती चरण में पागलपन तक नहीं पहुँचता। यदि सही समय पर पता लग जाए और उपचार शुरू हो जाए तो यह कभी पागलपन में नहीं बदलता। हाँ, व्यक्ति को ठीक होने में समय लगता है, जिसके लिए बहुत धैर्य और साहस की आवश्यकता होती है।

इसे बेहतर ढंग से समझने के लिए इस विषय से जुड़े लोगों द्वारा पूछे गए कुछ सवाल और उनके जवाब यहाँ अंकित कर रही हूँ।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

  • कैसे पता लगाएँ कि मानसिक स्वास्थ्य ठीक नहीं है?
  • यदि मन परेशान है और अचानक पैनिक अटैक आ जाए तो क्या करें?
  • डॉक्टर मदद कर पाएगा अथवा नहीं, यह दुविधा कैसे शांत करें?
  • सही डॉक्टर कैसे ढूँढें?
  • साइकोलॉजिस्ट और साइकायट्रिस्ट का अंतर कैसे समझें?
  • हम जहाँ रहते हैं वहाँ इस तरह के डॉक्टर नहीं बैठते, तो क्या किया जाए?
  • यदि घरवालों से छिपकर मनोविश्लेषक के पास जाना हो तो क्या करें?
  • कैसे पता लगाएँ कि मानसिक स्वास्थ्य ठीक नहीं है?

यदि मन लगातार परेशान रहता है, हर समय भारीपन और बेचैनी रहती है, रोने का मन होता है, अपने आप पर गुस्सा आता रहता है, अचानक हुई किसी छोटी-सी घटना से भी मन घबरा जाता है और किसी बड़ी घटना का कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, जीवन जीने का महत्व नहीं समझ आता, तो निश्चित तौर पर यह मानसिक स्वास्थ्य ठीक न होने के लक्षण हैं।

यदि अचानक पैनिक अटैक आ जाए तो क्या करें?

अचानक पैनिक की स्थिति में “एक, दो, तीन, चार” गिनने वाली तकनीक बहुत पुरानी है, लेकिन अपने आराध्य का कोई गाना गुनगुनाना भी बहुत मददगार साबित होता है। आप जिस किसी सुप्रीम पावर को मानते हों, आँखें बंद करके उनके किसी भी गाने की जो भी पंक्ति याद आए, उसे रिपीट मोड पर दोहराते रहिए।

इसके साथ, एक बार साँस अंदर लेकर तीन बार ज़ोर से बाहर छोड़ने से भी मदद मिलती है।

अपने रोने को कभी नहीं दबाना चाहिए। जब भी रोना आए, फूट-फूटकर रोना बहुत आवश्यक होता है। इससे हम कभी कमज़ोर नहीं होते, बल्कि भावनाएँ बाहर निकलती हैं और सेरोटोनिन हार्मोन संतुलित होता है।

ख़ुद पर गुस्सा आना भी स्वाभाविक है, लेकिन इसके लिए अपने आप को कोसना बिल्कुल ठीक नहीं है। स्वयं को कोसने से भावनाएँ और दबेंगी तथा अवसाद हावी होता जाएगा।

यह समझना बहुत आवश्यक है कि आपके अंदर अवसाद का अस्तित्व होने में आपका कोई दोष नहीं है। जैसे शरीर पर ताप अपने आप आता है, वैसे ही मन का ख़राब होना भी स्वाभाविक है। बस इसे नियंत्रित करना सीखना होता है, जिससे हमारे कारण हमारे अपने प्रभावित न हों और स्थिति गंभीर होने से भी बची रहे।

मनोरोग विशेषज्ञ कितने प्रकार के होते हैं?

मनोरोग के लिए दो तरह के डॉक्टर होते हैं।

पहले, जो दवा लिखते हैं, उन्हें साइकायट्रिस्ट कहा जाता है।
(यदि स्थिति बहुत गंभीर है, तभी इनसे संपर्क करना चाहिए।)

दूसरे, जो दवा नहीं लिखते, बल्कि काउंसलिंग और थेरेपी के माध्यम से उपचार करते हैं।
(सबसे पहले इनके पास ही जाना चाहिए। यदि मन की स्थिति को ठीक करने के लिए दवाओं की आवश्यकता होगी तो वे स्वयं आपको साइकायट्रिस्ट के पास जाने की सलाह देंगे।)

सही डॉक्टर कैसे ढूँढें?

यदि आप शारीरिक रूप से डॉक्टर के पास जा सकते हैं, तो किसी भी शहर के अच्छे डॉक्टर ढूँढने के लिए Practo ऐप सबसे अधिक अनुशंसित की जाती है।

यदि ऑनलाइन उपचार चाहते हैं, तो नीचे कुछ ऐप के नाम दिए जा रहे हैं :

  • MindPeers : यहाँ थेरेपिस्ट मिलते हैं।
  • Amaha : यहाँ थेरेपिस्ट मिलते हैं।
  • Wysa : यह मानसिक स्वास्थ्य के लिए एआई आधारित चैटबॉट है।
  • Mfine : यहाँ अधिकतर दवा लिखने वाले डॉक्टर मिलते हैं।

इसके अतिरिक्त मेडिटेशन में मदद के लिए :

  • Vipassana Meditation
  • Forest
  • Tide

ये सभी प्ले स्टोर और ऐप स्टोर पर आसानी से उपलब्ध हैं।

मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी कुछ और महत्वपूर्ण बातें जिनका ध्यान आपको रखना चाहिए।

आत्मविश्वास की कमी

व्यक्ति में कॉन्फ़िडेंस की कमी भी कभी-कभी मन को परेशान करती है। इससे स्त्री और पुरुष दोनों ही जूझ रहे हैं। इससे उबरने के लिए अपने आप से एक लड़ाई लड़नी पड़ती है।

स्वयं को भावनात्मक रूप से थकने से बचाइए

बहुत बार एंज़ायटी होने की वजह तुरंत की कोई घटना नहीं होती, बल्कि यह पुरानी किसी बात या अवचेतन मन पर लगी किसी चोट के कारण प्रभावी होती है। यह कैसे, कब और किस रूप में हमारे सामने आएगी, इसका आकलन नहीं किया जा सकता।

इसलिए अपने वर्तमान को ठीक रखना सबसे ज़रूरी है। इसके लिए दिमाग़ में एक कविता हर क्षण गुंजायमान रखिए— “कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती…”

यदि आप चाहें तो काव्याल सेडानी के इंटरव्यू भी सुन सकते हैं। या अपनी पसंद का कोई भी गाना, किताब अथवा पॉडकास्ट सुनिए, जो आपको भावनात्मक रूप से जुड़ा रहने में मदद करे।

कुछ समय के लिए नकारात्मकता से दूरी बनाइए

जब कभी अवसाद हावी होता हुआ लगे तो कुछ दिनों के लिए समाचार और न्यूज़ चैनल देखना बंद कर देना उचित होगा। हो सके तो सोशल प्लेटफ़ॉर्म्स और नकारात्मक लोगों से भी दूरी बना लीजिए। इससे रिकवर होने में मदद मिलती है।

ऐसे समय में केवल अपने आत्म का साथ और थेरेपिस्ट द्वारा मिली मदद ही काम आती है।

लोगों के निर्णयों से ऊपर उठना सीखिए

“कोई क्या कहेगा?”, “कोई क्या सोचेगा?”, “लोग मुझे बुरा समझेंगे तो क्या होगा?”, “मैं परफ़ेक्ट नहीं बन पाऊँगा/पाऊँगी…”

कृपया समझिए, किसी को किसी के जजमेंट या सर्टिफ़िकेट की आवश्यकता नहीं है। आप केवल अपने सही कर्म से मतलब रखिए। दूसरा उसे जो कुछ भी समझे, समझने दीजिए।

संवेदनशील लोगों को किसी की सोच बदलने में अपनी ऊर्जा व्यर्थ नहीं करनी चाहिए, बल्कि उसे केवल अपनी हीलिंग पर खर्च करना चाहिए।

ऐसे लोगों से दूरी बनाना भी ज़रूरी है

“तुम मोटे/मोटी हो गए हो।”

“तुम पतले/पतली हो गए हो।”

“तुम अच्छे/अच्छी नहीं हो।”

“तुम परफ़ेक्ट नहीं हो।”

“तुमने मेरे लिए कभी कुछ नहीं किया।”

“तुम्हारे जीवन का कोई अस्तित्व नहीं है।”

जीवन में ऐसा कहने वाले जो भी लोग मिलें, उन्हें टाटा-बाय कहना ज़रूरी है।

अंत में

मानसिक रोग को नर्क-प्राप्ति की पुनर्सूचना समझना बंद कीजिए और ऐसा समझने वालों से दूरी बनाइए।

यह भी समझिए कि आप अकेले सबको प्रसन्न नहीं रख सकते। इसलिए जब कभी भी मन परेशान हो, तो ख़ुद को समय दीजिए। अपने लिए समय निकालिए।

लगातार जीतते रहने के लिए किसी दौड़ में भागते रहने से कुछ हासिल नहीं होगा। अपने आप को और अपनों को किसी भी बात के लिए अनावश्यक दबाव में मत रखिए। दबाव में मन ठीक होने की जगह और अधिक ख़राब होता है।

यदि ऑफिस या घर में टॉक्सिक अथवा अत्यधिक दबाव का माहौल है, तो थेरेपिस्ट से मिलकर अपना पूरा हाल बताइए और अपने लिए ऐसी वर्कशीट बनवाइए जो केवल आपके व्यक्तित्व और परिस्थितियों के अनुरूप हो।

सबका जीवन अलग है, इसलिए सबके लिए टिप्स और ट्रिक्स भी अलग होती हैं। ज़रूरी नहीं कि उपचार की जो तकनीक किसी दूसरे के लिए उपयोगी रही हो, वह आपके लिए भी कारगर साबित हो।

अतः अपने लिए एक अच्छा थेरेपिस्ट ढूँढिए और अपने बौद्धिक तथा आत्मिक विकास पर निरंतर कार्य करते रहिए।

मेरा नाम निष्ठा अभिजित अग्निहोत्री है। मैं बनारस से हूँ लेकिन फिलहाल सपनों की नगरी मुंबई में रहती हूँ। और अपने सपनों को पूरा करते हुए थोड़ा बहुत लिखती पढ़ती रहती हूँ । यहाँ बनारस को याद करते हुए 'व्योमेश शुक्ल' जी का लिखा दोहराऊँगी... "बनारस मेरे लिए वह है जो मेरी हड्डियों में बसता है।"

मैंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातक और महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ वाराणसी से मास कम्यूनिकेशन में स्नातकोत्तर की पढ़ाई की है। किताबें मुझे बचपन से आकर्षित किया करती थीं। रस्किन बॉन्ड कृत 'रस्टी के कारनामे' मेरे द्वारा पढ़ी गई पहली किताब थी। मुझे हिन्दी तथा अंग्रेजी भाषाओं की किताबें पढ़ना पसंद है । इसके साथ ही सेल्फ हेल्प की किताबें भी मुझे बेहद आकर्षित करती हैं। मैंने लिखना तीन साल पहले शुरू किया और मेरा मानना है कि लेखन एक ऐसी प्रक्रिया है जो पूरी तरह से आपके पढ़ने और सीखने पर निर्भर करती है। व्यक्ति जितना अधिक समय अपने पठन-पाठन को देता है उतना ही उसके मस्तिष्क का विकास होता है और उसकी लेखनी भी मजबूत होती जाती है ।

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