वह मेरे दुख को अपनी गहरी जड़ों में सोखता रहा..
गार्गी मिश्र
नई पीढ़ी की चर्चित कवयित्री, लेखिका और अनुवादक गार्गी मिश्र अपनी गहरी संवेदनशीलता, प्रकृति-बोध और स्त्री-अनुभवों की सूक्ष्म अभिव्यक्ति के लिए जानी जाती हैं। वाराणसी में जन्मी गार्गी कविता, गद्य, शोध और अनुवाद के क्षेत्र में समान रूप से सक्रिय हैं। उनकी रचनाओं में जीवन के साधारण दिखने वाले अनुभव असाधारण भावनात्मक और दार्शनिक अर्थ ग्रहण कर लेते हैं।
प्रस्तुत संस्मरण भी एक ऐसे ही अनुभव की कथा है। यह केवल एक युवा लड़की के अकेलेपन और उसके दुख की कहानी नहीं, बल्कि सुनने, सहने और धीरे-धीरे स्वयं एक आश्रय में बदल जाने की यात्रा है। बरगद के एक पेड़ से शुरू हुई यह आत्मीय बातचीत समय के साथ गार्गी के व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाती है। अपने इस आत्मीय और काव्यात्मक गद्य में वे हमें याद दिलाती हैं कि कभी-कभी सबसे गहरी रचनाएं जीवन की स्मृतियों के माध्यम से हमारे भीतर दर्ज होती हैं।
आज आप से अपनी ज़िंदगी का एक तजुर्बा साझा करती हूँ। मैं अक्सर जयपुर के उन दिनों को याद करती हूँ जब मैं सिर्फ़ बाईस बरस की थी।कोई पंद्रह साल पुरानी बात। आज के हिसाब से अपना दिल और अपनी अक्ल देखूँ तो उस वक़्त एकदम बच्ची थी।
पत्रकारिता की दुनिया में नई-नई उतरी थी। ऐसा लगता था जैसे अपनी उम्र से किसी बड़े का बड़ा सा कोट पहन लिया हो।एक ऐसे अजनबी शहर में खुद को संभालने की जद्दोजहद कर रही थी जो बहुत बड़ा था और अपनी ही धुन में मगन था।
मम्मी-पापा सैकड़ों मील दूर थे। बनारस में। वह दूरी सिर्फ़ फ़ासले की नहीं थी, मेरे सीने के भीतर अनकही फ़िक्रों का एक पूरा समंदर ठाठें मार रहा था। ख़बरों की आपाधापी, दुनिया की कड़वी सच्चाइयों का वो पहला और सीधा सामना और अचानक से बड़ा हो जाने का वो बोझ।इन सबने मिलकर मेरे अंदर एक अजीब सी तकलीफ़, एक रुआंसापन इकट्ठा कर दिया था।
ठीक ठीक याद नहीं है कि बात क्या हुई थी लेकिन एक वह दोपहर का वक़्त था। दफ़्तर में लंच का समय था और मैं उदास थी।मैंने उस वक्त किसी दोस्त या साथ काम करने वाले को आवाज़ नहीं दी।
बाईस साल की उस उम्र में यह संवेदनशीलता या वल्नरेबिलिटी थी कि इंसानों के कान बहुत जल्दी उकता जाते हैं। लोग आपकी उदासी का पूरा हिसाब-किताब चाहते हैं। वे जानना चाहते हैं कि रोने की पुख़्ता वजह क्या है ? आँसुओं का सबब क्या है। और उससे भी बुरा यह कि वे फ़ौरन अपनी अधकचरी सलाहों की पोटली खोलकर आपको ‘ठीक’ करने में जुट जाते हैं।
मुझे याद है दैनिक भास्कर के दफ़्तर के पास वाली बिल्डिंग में कैंसर से पीड़ित व्यक्तियों के लिए संस्था थी और उसमें एक बड़ा सा पार्क था। और उस पार्क में अनगिनत पेड़ थे। मैं अपनी उदासी और उसकी टूट-फूट को समेटकर चुपचाप उस पार्क की ओर बढ़ गई और चलते चलते एक बरगद के पेड़ के पास पहुँच गई।
यह क़बूल करना अपने आप में एक अलग सा तजुर्बा है कि जिस इकलौते वजूद पर मैंने अपने बिखरने के लिए भरोसा किया, वह एक पुराना, खामोश पेड़ था।
हमारे तरफ़ एक शब्द बोलते हैं, ‘हऊहाना’। मैं हऊहा के एक पेड़ से लिपट गई थी। मुझे आज भी याद है, उसकी खुरदरी, झुर्रियों से भरी छाल पर अपना माथा टिकाकर मैं किस कदर फूट-फूट कर रोई थी। घंटों रोती रही थी।
उस बरगद ने वो किया जो कोई इंसान कभी नहीं कर सकता। उसने पूरी तवज्जो से, पूरे दिल से मुझे सुना। उसने मेरे रोने के उस बेतरतीब, पागलों वाले अंदाज़ पर मुझे कतई नहीं परखा। न कोई सवाल किया, न रोने की वजह पूछी। कोई बिन मांगी नसीहत नहीं, कोई खोखला दिलासा नहीं। वह बस चुपचाप अपनी जगह डटा रहा, एक चश्मदीद गवाह की तरह।
वह मेरे दुख को अपनी गहरी जड़ों में सोखता रहा, और मुझे बिना किसी हिचक या शर्म के, छोटा और बेबस होने की पूरी मोहलत दे दी। याद कर रही हूँ तो गला भर आ रहा है। ऐसे कोई रोता है भला? बच्चे रोते होंगे दो तीन बरस वाले। बाहें फैलाए।
उस दिन से आज के दिन में पंद्रह साल गुज़र चुके हैं।
अब, मैं सैंतीस साल की हूँ। तकरीबन डेढ़ दशक उंगलियों के बीच से रेत की तरह बह गए।जयपुर की गलियों में रोने वाली वह लड़की तो कब की पीछे छूट गई लेकिन आज जब मैं खुद को टटोलती हूँ तो लगता है कि एक अजूबा हुआ है। मैं सिर्फ उम्र में बड़ी नहीं हुई हूँ बल्कि मैं खुद उसी बरगद के पेड़ में तब्दील हो पाई हूँ।
आज की ज़िंदगी में जब चलती-फिरती हूँ तो यह बदलाव साफ़ महसूस होता है। मेरे भीतर एक भारी, तजुर्बेकार तना तैयार हो हुआ है। वक़्त के थपेड़ों ने मुझे मजबूती दी है, एक ठहराव दिया है, एक गहरा वजूद दिया है और मेरे सीने में, उसी पेड़ की खोखल जैसा एक कान बन गया है। मैं खुद वो पनाहगाह बन चुकी हूँ जिसकी तलाश में कभी मैं दर-ब-दर थी।
अब मैं लोगों के पास बैठती हूँ, घंटों उनके दिल की बातें सुनती हूँ और बदले में उन्हें सिर्फ़ एक मुकम्मल, बिना किसी कायदे-कानून वाली खामोशी सौंप देती हूँ। मुझमें उन्हें सुधारने की कोई जल्दबाजी नहीं होती न ही कोई मशविरा थोपने की चाह। यह सब हुआ कैसे ? रोने की चाह से और कुछ प्रकृति भी मेहरबान रही। एक दिलदार इंसान की जगह एक दिलदार पेड़ ने मेरी बात सुनी। मेरे पिता ने मुझे याद है पिछले चालीस वर्षों में अनगिनत पौधे रोपे हैं। दुआएँ ऐसे भी फलती हैं।
मगर इस पेड़ का अपना एक मिजाज है। अपनी एक शर्त है। मैं यह छाँव किसी के लिए तभी बिछा सकती हूँ जब उनका आना बिल्कुल सच्चा हो। मैं किसी और की दुनिया का दर्द अपने कांधों पर उठाने का हौसला रखती हूँ, ‘बशर्ते’ उनका गले मिलना गर्मजोशी से भरा हो और उसमें कोई बनावट न हो। बशर्ते वे अपनी चालाकियों और मुखौटों को मेरी जड़ों के पास ही छोड़ आएं। अगर वहाँ कोई शर्म नहीं है, कोई पर्दा नहीं है, तो मेरी यह छाँव सिर्फ़ और सिर्फ़ उनकी है।
कुछ रोज़ पहले एक दोस्त ने पूछा था कि क्या मैंने पेड़ों पर कोई कविता लिखी है ? मैं कहना चाहती हूँ, बहुत सालों पहले एक बहुत बड़े से पेड़ ने मेरे ख़ुश्क गालों पर एक कविता लिखी थी। जब कभी रोती हूँ तो उसके हर्फ़ गालों पर उभर आते हैं।
