पेड़ों की छाँव में छुपाए रखना…
सुमन पाण्डेय
इस कलाकार की स्मृतियों में प्रकृति जीवित पात्रों की तरह बसती है। बचपन, पेड़ और लोकजीवन से जुड़े अनुभव सुमन पाण्डेय की लेखनी में बार-बार लौटते हैं। वाराणसी की मूल निवासी सुमन ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से पेंटिंग ऑनर्स में स्नातक तथा बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झाँसी से पेंटिंग में परास्नातक की शिक्षा प्राप्त की है। टेक्सटाइल डिज़ाइन में डिप्लोमा और वनस्थली विद्यापीठ से पारंपरिक वस्त्राकल्प विषय में पीएच.डी. करने वाली सुमन वर्तमान में कला एवं डिज़ाइन शिक्षा से जुड़ी हैं।
प्रस्तुत संस्मरणात्मक लेख में वे पेड़ों के साथ अपने गहरे और आत्मीय संबंध को याद करती हैं। बचपन की स्मृतियों, लोककथाओं, गंधों, ध्वनियों और प्रकृति के सूक्ष्म अनुभवों से बुना यह लेख बताता है कि वृक्ष केवल प्रकृति का हिस्सा नहीं, बल्कि प्रेम, संरक्षण, स्मृति और घर का जीवंत रूप भी हो सकते हैं।
राजश्री बैनर की फिल्मों ने भारतीय समाज की एक ऐसी दुनिया रची थी जिसमें परिवार था, सहयोग था, और सबसे अधिक — एक-दूसरे के लिए छाँव बनने की आकांक्षा थी। उनकी फिल्मों का एक गीत आज भी भीतर कहीं धीरे-धीरे बजता रहता है — “ले तो आए हो हमें सपनों के गाँव में, प्यार की छाँव में छुपाए रखना…”
शायद इसी कारण आज सुबह जब किसी काम से बाहर निकलना हुआ, तो पूरी यात्रा में मैं पेड़ों को ही खोजती रही। “खोजना” इसलिए कह रही हूँ क्योंकि कंक्रीट के जंगल में अब पेड़ों का स्थान बचा ही कहाँ है। और जहाँ कहीं कोई वृक्ष दिखा भी, वहाँ मेरी दृष्टि उसकी ऊँचाई पर नहीं, उसकी छाया की गहराई पर जाकर ठहर गई।
मुझे लगता है किसी भी वृक्ष का सबसे बड़ा सुख उसकी छाया है। एक बर्ड वॉचर के लिए पक्षियों का सबसे सुंदर जमघट अक्सर बरगद की ओट में मिलता है। मैंने बरगद की छाया में इतने पक्षियों को एक साथ देखा है कि कभी-कभी लगता है जैसे वृक्ष केवल पेड़ नहीं, पूरा संसार अपने भीतर बसाए रहते हैं।
एक बार बिहार म्यूज़ियम की यात्रा में मैंने एक इतना ऊँचा और मोटे तने वाला वृक्ष देखा कि उसके पास खड़े होकर पहली बार अपनी नाज़ुकता का एहसास हुआ। मैंने उसे बाँहों में भर लिया। उसे गले लगाते हुए लगा जैसे मुझे जापानी एनीमेशन का टोटोरो किसी वृक्ष के रूप में मिल गया हो।
जब मैं छोटी थी, मेरे दादा जी बहुत पेड़ लगाते थे। वे समय-समय पर उनकी शाखाएँ भी काटते रहते थे। बचपन में मुझे यह बहुत दुख देता था। धीरे-धीरे समझ आया कि वृक्षों के बढ़ने के क्रम में उनकी छँटाई भी उतनी ही आवश्यक होती है। कभी-कभी विकास का अर्थ केवल बढ़ना नहीं, अनुशासन और देखभाल भी होता है। तभी तो वृक्ष अपनी निश्चित ऊँचाई पर पहुँचकर गहरी छाया दे पाते हैं।
मुझे छँटाई के बाद के पेड़-पौधे और सैलून से बाल कटवाकर आए आदमी एक जैसे लगते हैं—सुधरे हुए, पर जो उनका व्यक्तिगत व्यवहार नहीं है। फिर वे मनमाने ढंग से बढ़ेंगे। यानी मेरा पुरुष के प्रति आकर्षण भी उसमें एक पेड़ की पहचान लिए हुए है।
गर्मियों की दोपहरों में मैं अक्सर खेतों पर चली जाती थी। मेरे घर में मुझे शायद ही कभी किसी चीज़ के लिए रोका गया हो, या शायद मैंने अवरोधों की भाषा सुनना ही नहीं सीखा। वहाँ जाकर मैंने पेड़ों से दोस्ती की। मैंने जाना कि मौसंबी के पेड़ के नीचे उगी घास भी हल्की मौसंबी जैसी महकती है।
मुझे सबसे सुंदर वृक्ष शीशम लगता था। मैंने जाना कि शीशम बिना शोर के हवाओं का आनंद लेता है। उसकी कोमल पत्तियाँ हवा के स्पर्श से केवल हिलती नहीं, खिलखिलाती हैं। एक गर्म दोपहर मैंने महसूस किया कि नीम की पत्तियाँ सबसे अधिक शोर करती हैं। मुझे पत्तियों की आवाज़ पहचान में आने लगी थी। मैं अलग-अलग वृक्षों की ध्वनियाँ सुनती थी।
नीम की पत्तियों का शोर मुझे अच्छा नहीं लगता था, इसलिए मैं भागकर शीशम के पेड़ के पास चली गई। पर उस दिन शीशम भी शोर कर रहा था। तब पहली बार समझ आया कि शोर पत्तियों का नहीं, उनकी अवस्था का होता है।
जब मैंने शीशम को पहली बार देखा था, उसकी पत्तियाँ कोमल थीं। पर वृक्ष के बड़े होने के साथ पत्तियों में भी एक सूखापन, एक थकान आ जाती है, जो हवा लगते ही आवाज़ करने लगती है। आम की पत्तियाँ तो इतनी बड़ी होती हैं कि वे अपने बुढ़ापे में मानो ताली बजाकर शोर करती हैं।
यह सब मैं इसलिए जान पाई क्योंकि मेरे दादा जी ने मुझे पेड़ों के बीच रहने का अवसर दिया। मैंने पहली बार सागौन के पत्तों को अपनी हथेलियों में रगड़कर जाना था कि वे लाल रंग छोड़ते हैं। एलोवेरा को तोड़कर उससे निकलने वाला लिसलिसा पदार्थ मुझे आश्चर्य से भर देता था। गर्मी की दोपहरों में चिलबिल के पेड़ की फलदार पत्तियों से चिरौंजी जैसा फल निकालकर खाना मुझे अनोखे आनंद से भर देता था।
हमारे घर में उसका केवल एक ही पेड़ था, पर झाँसी के किले में तो मानो चिलबिल का पूरा संसार बसा है। इस गर्मी मेरा मन फिर झाँसी के किले में जाने का है, केवल चिलबिल खाने के लिए।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि मैंने पेड़ों को केवल देखा नहीं, मैंने उन्हें सुना, सूँघा, अपनी हथेलियों पर रगड़ा, यहाँ तक कि चखकर भी समझना चाहा। मेरी यह आदत मेरी माँ के लिए आफ़त बन चुकी थी। चखने का जो असर था, वह किसी आपदा के ऐलान जैसा होता था। मेरी माँ ने समझाया था — “जिस पेड़ को तोड़ने पर दूध निकले, उसे मत चखना।”
फिर एक दिन नानी के घर मैंने पहली बार कटहल का पेड़ देखा। उसके तने पर लगे फलों को देखकर मैं ठिठक गई थी। पहली बार किसी वृक्ष के तने पर फल उगते देखे थे। कटहल का तना मुझे अनेक वक्षों को धारण किए किसी स्त्री-देह जैसा लगा।
और जब मामा जी ने सब्ज़ी बनाने के लिए कटहल पेड़ से तोड़ा, तो उसमें से इतना दूध निकला कि माँ की सलाह फिर टूटी हुई दिखी। पर अब मैं बड़ी हो रही थी और मेरी समझ पर मेरी जिज्ञासा हावी हो चुकी थी।
इसी क्रम में जंगली जलेबी, अमरूद के पेड़ पर “पत्ती छू” का खेल, कच्चे आम और लाल मेट से बचाव, और गूलर के पेड़ की कहानियाँ भी मेरे भीतर बसती चली गईं। कहा जाता था कि जिसके भाग्य में राजयोग होता है, वही गूलर का फूल देख पाता है। और गूलर के पेड़ पर परियाँ रहती हैं। पर जिसके गर्भ में ही पुष्प हो, उसका दर्शन कोई कैसे करे!
आज ये सारी स्मृतियाँ, लोककथाएँ, गंधें, ध्वनियाँ और वृक्ष मेरे सामने मेज़ पर रखे मनी प्लांट के पौधे में कहीं साँस ले रहे हैं। कभी-कभी लगता है मैंने जीवन में जितना मनुष्यों से नहीं सीखा, उससे कहीं अधिक वृक्षों से सीखा है।
शायद इसी कारण आज भी किसी पेड़ की छाया मुझे केवल छाया नहीं लगती। वह मुझे प्रेम, स्मृति, संरक्षण और घर — चारों का एक साथ अनुभव कराती है।
प्रकृति पर लेखन की इस शृंखला में सुमन पाण्डेय का पिछला आलेख पढ़िए : कुछ पेड़ मेरे भीतर भी हैं
