साहित्य

पल्लवी विनोद की कविता ‘तुम जाना उस पार लड़कियों’

पल्लवी विनोद

पल्लवी विनोद की रचनाएँ हिंदुस्तान, अमर उजाला, जनसत्ता, परिंदे, वनमाली कथा, अन्विति, कृति बहुमत, वाचन और किस्सा जैसी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी कविताएँ और कहानियाँ हिंदवी, जानकीपुल, बोले भारत और सम्मुख जैसे डिजिटल मंचों पर भी प्रकाशित होती रही हैं। कविता कोश द्वारा आयोजित ‘विटामिन सी’ ज़िंदगी प्रतियोगिता में उन्हें सर्वश्रेष्ठ कहानी का पुरस्कार मिला है। उनका कविता-संग्रह ‘परिधि से बाहर’ दीपक अरोड़ा स्मृति पुरस्कार योजना के अंतर्गत बोधि प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है।

उनकी कविताओं में स्त्री जीवन, स्वतंत्रता, प्रेम, समानता और सामाजिक संरचनाओं के भीतर व्यक्ति की अपनी जगह तलाशने के सवाल प्रमुखता से आते हैं। प्रस्तुत कविता ‘तुम जाना उस पार लड़कियों’ एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को दिया गया ऐसा आत्मीय संबोधन है, जिसमें पिछली पीढ़ी अपनी अधूरी इच्छाओं और सीमाओं को पहचानते हुए अगली पीढ़ी की लड़कियों से उन सीमाओं के पार जाने का आग्रह करती है। कविता का ‘उस पार’ दरअसल उस दुनिया का रूपक है जहाँ पहुँचने की इच्छाएँ पिछली पीढ़ियाँ अपने लिए पूरी नहीं कर सकीं।


तुम जाना उस पार लड़कियों
जहाँ हमारी लालसाएँ गईं हम नहीं

चढ़ना उस पर्वत पर जिसकी दूसरी-तीसरी चढ़ाई से वापस लौट आए थे हम
उस नदी में तैरना जिसके जल को मात्र अँजुरी में ही भर पाए थे हम
देखना दिशा के हर उस आयाम को जिस तरफ़ हमारा देखना भी वर्जित था
अपने भीतर उगाना वो गुलाब जिसके काँटे तुम्हें तोड़ते हर हाथ को चुभें

जिस दुनिया में आते ही तुम्हारी बुलंद किलकारी ने बता दिया था कि बेटी आई है
उस दुनिया में अपने उपस्थित होने की हाज़िरी लगाते रहना
प्रेम में डूबना लेकिन यह हक़ उसे भी मत देना कि वो कर सके तुम्हारी आवाज़ कम…

हम, जो अपने हिस्से की दुनिया भी तुम्हारी आँखों से देख रहे हैं
तुम भी देखना हमारे हिस्से की दुनिया, हिक़ारत से नहीं करुणा से
अपनी कोमलता हर उस माथे पर रखना जो अवहेलना के तनाव से सिकुड़ गई हैं

तुम श्रेष्ठता के बोध से नहीं समानता के बोध से संचालित होना
सत्ता के आगे झुक कर नहीं, आँख मिला अपनी बात रखना
माँगना अपना हक़, पिता से उसकी सत्ता से, समाज से और इसकी संरचना से
तुम्हें घूरती हर आँख से माँगना अपनी स्वतंत्रता
तुम्हें रोकती हर सोच से छीनना अपने रास्ते
प्रेम को भक्ति नहीं शक्ति बनाना

क़ायदों की तयशुदा परिभाषाओं की परिधि से बाहर निकल आना
उस पार जहाँ हम नहीं हमारी इच्छाएँ गईं थी..

How did this make you feel?
🌸
Stay in the loop

Get the latest stories on women's rights in India — straight to your inbox.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Share via
Copy link