जेंडर विमर्श

भावनात्मक दूरी और घटती नज़दीकियाँ : रिश्तों का अनकहा सच

भारतीय समाज में विवाह, रिश्तों और अंतरंगता को लेकर अनेक धारणाएँ प्रचलित हैं, लेकिन इन विषयों पर खुलकर और संवेदनशीलता के साथ बातचीत अब भी कम होती है।प्रस्तुत लेख इसी जटिल और महत्वपूर्ण प्रश्न पर विचार करता है कि आखिर क्यों कई बार विवाह के बाद महिलाओं की अंतरंगता में रुचि कम होती दिखाई देती है, और क्या इसके पीछे केवल शारीरिक कारण होते हैं या रिश्तों की भावनात्मक सच्चाइयाँ भी जिम्मेदार होती हैं। लेखिका रिश्तों, भावनात्मक श्रम, सम्मान, बराबरी और सहमति जैसे मुद्दों को केंद्र में रखकर इस विषय को समझने का प्रयास करती हैं।

शशि कुशवाहा लखनऊ की निवासी हैं तथा पत्रकारिता और सामाजिक कार्य के क्षेत्र में सक्रिय हैं। पिछले कई वर्षों से वे सामाजिक अन्याय, रूढ़िवादिता और पितृसत्ता जैसे मुद्दों पर बेबाकी से लिखती और बोलती रही हैं। अपने यूट्यूब चैनल और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों के माध्यम से वे गंभीर सामाजिक विषयों पर तथ्य और तर्क के साथ जनजागरूकता का काम करती हैं।

शशि कुशवाहा

भारतीय समाज में एक बात बहुत आम है कि शादी के कुछ साल बाद कई पुरुष शिकायत करते दिखाई देते हैं कि उनकी पत्नी अब सेक्स में रुचि नहीं लेती। वह बार-बार मना करती है, दूरी बनाती है, या संबंध के समय भावनात्मक रूप से अलग लगती है।

कुछ पुरुष यह भी कहते हैं, ‘पहले तो सब ठीक था, अब पता नहीं क्या हो गया है?’, ‘वह हमेशा थकी रहती है’, ‘उसका मन ही नहीं करता’, ‘उसके प्राइवेट पार्ट में ड्राइनेस रहती है।’ लेकिन दुख की बात यह है कि अधिकतर लोग इस समस्या को सिर्फ ‘महिला की कमी’ मान लेते हैं। कोई यह समझने की कोशिश नहीं करता कि आखिर ऐसा हो क्यों रहा है?

सवाल सिर्फ सेक्स का नहीं है। सवाल उस रिश्ते का है, जहाँ महिला भावनात्मक, मानसिक और शारीरिक रूप से कैसा महसूस कर रही है। सेक्स सिर्फ शरीर का नहीं, मानसिक स्थिति का भी मामला है। समाज ने पुरुषों को यह सिखाया है कि सेक्स एक ‘शारीरिक जरूरत’ है। लेकिन महिलाओं के लिए सेक्स सिर्फ शरीर तक सीमित नहीं होता।

कई महिलाओं के लिए भावनात्मक जुड़ाव, सम्मान, सुरक्षा, प्यार और मानसिक शांति इंटीमेसी का बहुत बड़ा हिस्सा होते हैं। अगर कोई महिला दिनभर अपमान झेल रही हो, उस पर घर और बच्चों की पूरी जिम्मेदारी डाल दी गई हो, उसकी भावनाओं को लगातार नजरअंदाज किया जाता हो, तो उसका शरीर धीरे-धीरे सेक्स से दूर होने लगता है। क्योंकि शरीर और दिमाग अलग-अलग नहीं चलते।

जब मन दुखी होता है, तनाव में होता है, लगातार थका हुआ होता है, तो उसका असर सीधे सेक्सुअल इच्छा पर पड़ता है।

घरेलू कामों और मानसिक बोझ का असर

भारतीय घरों में आज भी अधिकतर महिलाओं पर ‘डबल शिफ्ट’ का बोझ होता है। वह नौकरी भी करती है और घर का लगभग पूरा काम भी संभालती है। खाना बनाना, सफाई, बच्चों की देखभाल, बुजुर्गों की जिम्मेदारी, इमोशन मैनेजमेंट — सब कुछ महिला के हिस्से डाल दिया जाता है।

लेकिन उसके बदले उसे क्या मिलता है?

  • ‘तुम करती ही क्या हो?’
  • ‘इतना भी नहीं संभलता?’
  • ‘हर समय थकी क्यों रहती हो?’

यानी महिला से लगातार सेवा की उम्मीद की जाती है, लेकिन उसकी थकान, तनाव और भावनात्मक थकान को गंभीरता से नहीं लिया जाता। और फिर रात में उससे उम्मीद की जाती है कि वह इंटीमेसी, रोमांटिक और सेक्सुअली उपलब्ध भी रहे। यह व्यवहार किसी इंसान के साथ नहीं, बल्कि मशीन के साथ किया जाता है।

सिर्फ पुरुष ऑर्गेज्म महत्वपूर्ण क्यों?

हमारे समाज में सेक्स एजुकेशन की भारी कमी है। अधिकतर पुरुषों को कभी यह सिखाया ही नहीं जाता कि सेक्स सिर्फ उनकी संतुष्टि के लिए नहीं होता। कई महिलाएँ अपनी पूरी शादी में कभी ऑर्गेज्म तक अनुभव नहीं कर पातीं। लेकिन उनसे उम्मीद की जाती है कि वे हमेशा सेक्स के लिए तैयार रहें।

ज्यादातर रिश्तों में महिला की खुशी, आराम और सहमति को लगभग महत्व ही नहीं दिया जाता। यानी पुरुष ऑर्गेज्म लेकर सो जाता है, लेकिन महिला भावनात्मक और शारीरिक रूप से असंतुष्ट रहती है। धीरे-धीरे उसका दिमाग सेक्स को प्लेज़र नहीं, बल्कि तनाव, कर्तव्य और थकान से जोड़ने लगता है। और फिर पुरुष शिकायत करता है कि ‘अब उसे सेक्स में इंटरेस्ट नहीं है।’

‘ड्राइनेस’ शारीरिक नहीं, मानसिक संकेत भी

बहुत से लोग महिलाओं की योनि के सूखेपन को सिर्फ हार्मोनल या मेडिकल इश्यू मानते हैं। लेकिन कई बार यह भावनात्मक अलगाव, तनाव, घबराहट और उत्तेजना की कमी से भी जुड़ा होता है। जब महिला मानसिक रूप से कंफर्टेबल नहीं होती, जब उसे पार्टनर से भावनात्मक सुरक्षा महसूस नहीं होती, जब उसका शरीर सेक्स को प्रेशर की तरह महसूस करता है, तो प्राकृतिक रूप से उत्तेजना प्रभावित होती है। यह शरीर का एक मनोवैज्ञानिक रिस्पॉन्स भी हो सकता है।

लेकिन हमारे समाज में पुरुष अक्सर यह सवाल नहीं पूछते —

  • ‘क्या मेरी पत्नी भावनात्मक रूप से खुश है?’
  • ‘क्या मैं उसे सम्मान देता हूँ?’
  • ‘क्या वह खुद को सुरक्षित और वैल्यूड महसूस करती है?’

बल्कि सीधा निष्कर्ष निकाल लिया जाता है कि ‘समस्या महिला में है।’

भावनात्मक जुड़ाव और इंटीमेसी

मनोविज्ञान में एक शब्द है, डेमी-सेक्सुअलिटी। इसका मतलब है कि व्यक्ति को सेक्सुअल अट्रैक्शन मुख्यतः भावनात्मक जुड़ाव के बाद महसूस होता है। बहुत-सी महिलाएँ इसी तरह इंटीमेसी अनुभव करती हैं। उनके लिए प्यार, सम्मान, इमोशनल बॉन्डिंग और यौन इच्छा में विश्वास का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं।

अगर रिश्ते में लगातार अपमान, उपेक्षा, इमोशनल एब्यूज या दूरी हो, तो उनका शरीर भी इंटीमेसी से दूर होने लगता है। इसका मतलब यह नहीं कि महिला ‘खराब पत्नी’ है। इसका मतलब यह है कि रिश्ता इमोशनली अनहेल्दी हो चुका है।

पति का व्यवहार व सेक्सुअल डिजायर

यह बात कई पुरुषों को कड़वी लग सकती है, लेकिन सच है। अगर आप अपनी पत्नी का लगातार अपमान करते हैं, उसकी भावनाओं की उपेक्षा करते हैं, उसकी मेहनत को नजरअंदाज करते हैं, उसे अकेला छोड़ देते हैं, घर और बच्चों की पूरी जिम्मेदारी उसी पर डाल देते हैं, तो धीरे-धीरे उसका मन आपसे इमोशनली दूर होने लगेगा।

और इमोशनल डिस्टेंस अक्सर फिजिकल डिस्टेंस में बदल जाती है। महिलाएँ रोबोट नहीं हैं कि दिनभर भावनात्मक पीड़ा झेलें और रात में तुरंत रोमांटिक हो जाएँ।

सहमति शादी के बाद भी

भारतीय समाज में आज भी बहुत लोग यह मानते हैं कि शादी के बाद सेक्स ‘पति का अधिकार’ है। लेकिन सच्चाई यह है कि शादी सहमति को खत्म नहीं करती। अगर कोई महिला बार-बार इंटीमेसी इग्नोर कर रही है, तो सिर्फ उसे दोष देने के बजाय यह समझने की जरूरत है कि वह इमोशनली क्या महसूस कर रही है।

उसकी ‘ना’ के पीछे अक्सर कोई गहरा भावनात्मक कारण होता है। लेकिन पितृसत्तात्मक सोच महिलाओं की भावनाओं को समझने के बजाय उन्हें स्वार्थी, कोल्ड या ‘फ्रिजिड’ कहने लगती है।

इंटीमेसी बराबरी और सम्मान से

अच्छा सेक्सुअल रिलेशनशिप सिर्फ शारीरिक आकर्षण से नहीं चलता। उसके लिए जरूरी है भावनात्मक सुरक्षा, बातचीत, आपसी सम्मान, साझा जिम्मेदारियाँ, समझ और दिल से लगाव। जब महिला खुद को मूल्यवान महसूस करती है, जब उसे सिर्फ ‘सेवा करने वाली’ नहीं बल्कि बराबरी का इंसान समझा जाता है, तब इंटीमेसी नेचुरली बेहतर होती है।

पहले पुरुष खुद को देखें

हर बार महिलाओं को दोष देना आसान है। लेकिन अब समय आ गया है कि पुरुष खुद से भी सवाल पूछें —

  • क्या मैं अपनी पत्नी का सम्मान करता हूँ?
  • क्या मैं घर और बच्चों की जिम्मेदारी बराबर बाँटता हूँ?
  • क्या मैं उसकी भावनात्मक जरूरत समझता हूँ?
  • क्या सेक्स में उसकी प्लेज़र और कंफर्ट मेरे लिए मायने रखते हैं?
  • क्या मैं उसे सिर्फ पत्नी नहीं, इंसान की तरह ट्रीट करता हूँ?

क्योंकि कई बार समस्या महिला के शरीर में नहीं होती, समस्या उस रिश्ते में होती है जहाँ महिला धीरे-धीरे इमोशनली टूट चुकी होती है। महिलाओं की सेक्सुअल डिजायर कोई स्विच नहीं है, जिसे जब चाहो ऑन कर दो। उनकी इच्छाएँ, भावनाएँ और शरीर उनके मानसिक अनुभवों से गहराई से जुड़े होते हैं।

अगर समाज और पुरुष सच में हेल्दी रिश्ता चाहते हैं, तो महिलाओं को सिर्फ ‘कर्तव्य निभाने वाली पत्नी’ नहीं, बल्कि भावनाओं, इच्छाओं और सम्मान की जरूरत रखने वाले इंसान के रूप में देखना सीखना होगा।

क्योंकि इंटीमेसी दबाव से नहीं, सम्मान, प्यार और बराबरी से पैदा होती है।

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