जब-जब फूलों से मुलाकात हुई : मेरी स्मृतियों लौटते वृक्ष
सुमन पांडेय
चित्रकार और लेखिका सुमन के लिए वृक्ष केवल प्रकृति का हिस्सा नहीं, बल्कि स्मृतियों, रिश्तों और भावनाओं के जीवित अभिलेख हैं। यह आलेख भारतीय फूलदार वृक्षों की वनस्पति-यात्रा नहीं, बल्कि स्मृति, सौंदर्य और आत्मीयता की एक निजी यात्रा है। अमलतास से लेकर पलाश तक, हर वृक्ष यहाँ जीवन के किसी अनुभव, किसी रिश्ते और किसी रंग को अपने भीतर संजोए हुए उपस्थित है।
सुमन पांडेय चित्रकला और डिज़ाइन की दुनिया से जुड़ी हैं। प्रकृति, स्मृतियों और लोकजीवन के अनुभवों को वे अपने लेखन और चित्रों में संवेदनात्मक रूप से दर्ज करती हैं। उनके लिए पेड़-पौधे केवल दृश्य नहीं, बल्कि जीवन और स्मृति के जीवित पात्र हैं।
“नन्ही कली सोने चली, हवा धीरे आना,
नींद भरे पंख लिए झूला झुलाना…”
यह कितनी प्यारी लोरी है। मेरे दादा जी यह लोरी हम बहनों को सुलाते हुए गाते थे। मेरे लिए भी गाई होगी, क्योंकि मेरी छोटी बहनों को तो मैंने अपनी आँखों से उनकी गोद में यह लोरी सुनते-सुनते सोते देखा है। आज यही गीत मुझे अपनी छोटी बहन को सोते हुए देखकर याद आया। वह आज भी मुझे एक नन्हीं कली ही लगती है।
और एक ही क्षण में कली, दादा जी, उनका स्नेह और फूल सब एक साथ स्मृति में लौट आए। पर इस बार पौधे नहीं, वृक्ष याद आए। ऐसा लगा जैसे भारतीय फूलदार वृक्षों को हवा स्वयं लोरी सुनाती हो, तभी तो उनके फूल इतने शांत झूलते हैं।
यक़ीन न हो तो किसी अमलतास को देखिए। कैसे पीले फूलों की झूमर हवा में धीरे-धीरे डोलती रहती है। मेरे घर के पीछे अमलतास का एक बहुत ऊँचा वृक्ष था। हम लड़कियों की पहुँच से बहुत दूर। मैं उसे केवल देखती रह जाती थी। कभी उसके फूलों तक पहुँच नहीं पाई।
फिर एक दिन हमारे घर काम करने आने वाली चाची की बेटी सोनी मेरे लिए उसके गुच्छे तोड़ लाई। हम दोनों उन फूलों से खेलते थे। वह मुझे सजाती और मैं उसे। किसी स्वर्ण आभूषण से भी अधिक आनंद था उन फूलों से श्रृंगार करने में। वैसे चंपा के फूल तो मैं आज भी कान में फँसाए घूमती हूँ। यह बात मेरे करीबी लोग जानते हैं।
कचनार के वृक्ष से मेरी मुलाकात भी बहुत अलग ढंग से हुई। मेरी माताजी की औषधि का नाम था “कचनार क्वाथ”। वह उपचार के दिनों में उसे पीती थीं। और जब मैंने पहली बार कचनार का वृक्ष देखा तो लगा – मेरी माँ जैसी सुंदर स्त्री को इतना मोहक पुष्प ही स्वस्थ कर सकता है। लोगों को कचनार में कोई युवती दिखाई देती होगी, मुझे उसमें अपनी माँ दिखाई देती हैं।
चंपा में मुझे अपना ननिहाल दिखाई देता है। उसकी डालियाँ कुएँ के ऊपर तक झुकी रहती थीं। हम फूल बीनने जाते और साथ ही कुएँ में झाँकते भी रहते। उसी समय मैंने पहली बार जाना था कि सौंदर्य और भय अक्सर साथ-साथ रहते हैं।
गुलमोहर के फूल मेरी स्केचबुक में इतने खींचे गए हैं कि अब वे किसी चित्र से अधिक आदत लगते हैं। सुबह की वॉक पर यदि आप उन्हें देखें तो ऐसा लगता है मानो कोई सुहागन सारी रात किसी की प्रतीक्षा में जागती रही हो और सुबह थककर अपने सारे फूल धरती पर बिखेर दिए हों।
जरुल, जिसे ‘प्राइड ऑफ इंडिया ट्री’ भी कहते हैं, उसे एक बार देख लीजिए। बैंगनी और गुलाबी फूलों से भरा वह वृक्ष इतना गरिमामय लगता है मानो उसे स्वयं अपने सौंदर्य पर गर्व हो।
रेन ट्री, जिससे मेरी मुलाकात गुजरात के वलसाड में हुई थी, मुझे प्रकृति की छतरी जैसा लगा। इतना घना, इतना छायादार कि लगता था संध्या स्वयं उसके नीचे बैठकर विश्राम करती होगी। वही संध्या जो सूर्य से अपनी पत्नी होने की संज्ञा के लिए जीवन भर व्याकुल रही।
सेमल का वृक्ष तो मुझे जीवन जैसा लगता है। जब उस पर पत्तियाँ होती हैं तब फूल नहीं होते। जब सारी पत्तियाँ झड़ जाती हैं तब फूल आते हैं। और जब फूल भी चले जाते हैं तब फल आते हैं, जो पककर फटते हैं और पूरे आकाश में रुई बिखेर देते हैं। मानो हवा के हाथों बादलों को संदेश भेज रहे हों – “सेज सजा दो, ऋतु आने वाली है।”
आपने नीम और मीठी नीम तो देखी होगी, पर कभी उस आकाश नीम से मिलिए, जिसे इंडियन कार्क ट्री कहते हैं। सफेद फूलों से भरा वह वृक्ष रात में सुगंध के गीत गाता है। उसे देखकर अक्सर लगता है जैसे कोई धीमे स्वर में कह रहा हो – “मैंने तेरे लिए ही सात रंग के सपने बुने…”
पलाश के वृक्ष को कभी बादलों से भरे आकाश के नीचे देखिए। ऐसा लगता है जैसे किसी पेंटर की पैलेट अचानक धरती पर खिल उठी हो। आकाश का नीलापन, बादलों की धुंध और पलाश की अग्नि – यह दृश्य किसी भी चित्रकार को जीवन भर रंगों से प्रेम करना सिखा सकता है।
और फागुन में खिलती बोगनवेलिया, जिसे कहीं-कहीं काइट पेपर ट्री भी कहा जाता है, उसके इतने रंग होते हैं कि लगता है किसी महत्वाकांक्षी कलाकार ने अपनी पैलेट के सारे रंग हवा में उछाल दिए हों।
ये सब खिलते हैं, महकते हैं, झरते हैं और हर दिन मेरी स्मृतियों में कहीं जीवित रहते हैं। मुझे लगता है मेरे भीतर एक जंगल है। आपके भीतर भी है क्या? अगर हाँ, तो कुछ आप भी जोड़ें, ताकि आगे बढ़ सके यह कलियों का साथ।
