सुमन पाण्डेय की कविता ‘दूध का धुला’
मेरा रंग में पढ़िए सुमन पांडेय की कविता। मूलतः वाराणसी (उत्तर प्रदेश) की निवासी सुमन ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से बी.ए. (पेंटिंग ऑनर्स) तथा बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झाँसी से एम.ए. (पेंटिंग) किया है। इसके अतिरिक्त उन्होंने टेक्सटाइल डिज़ाइन में डिप्लोमा और वनस्थली विद्यापीठ से पारंपरिक वस्त्राकल्प विषय में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की है। पिछले कुछ समय में उनके लेख विभिन्न प्रतिष्ठित प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं। प्रस्तुत कविता के साथ चित्र भी सुमन द्वारा बनाया हुआ है।
दूध का धुला
उसने इठलाकर कहा—
“मैं दूध का धुला हुआ हूँ।”
मैंने ठहरकर उत्तर दिया—
“दूध से धुला भी अंततः पानी से ही धुलता है,
सचाई की अंतिम कसौटी तो वही है।”
तब बात केवल शब्दों की थी,
आज वही बात एक दृश्य बनकर सामने है—
कुछ लोग नर्मदा को
दूध की धार से धो रहे हैं,
मानो पवित्रता बाहर से उँडेली जा सकती हो।
पर नदी…
वह तो स्वयं जीवन की धड़कन है,
उसे क्या धोना, किससे धोना?
दूध बहता है—
और साथ बहती है
उस जल में बसती असंख्य साँसें,
जो चुपचाप
हमारी आस्था के बोझ तले
धुँधली पड़ती जाती हैं।

जैसे मेरे हिस्से आया स्पर्श—
जिसने मेरे प्रेम को ही दूषित कर दिया,
धीरे-धीरे भीगती रही
मेरे विश्वास की साँसें,
और एक दिन लगा—
मैं भीतर से खाली हो गई हूँ।
ठीक वैसे ही—
नदी का यह “धुलना”
तोड़ देगा न जाने कितनी
बेज़ुबान जिंदगियों की लय,
जो उसी की गोद में पलती हैं।
जिस शिवलिंग को तुम
दूध की धार से पवित्र कर रहे हो,
उसी शिव की साक्षी है यह नर्मदा—
जिसने अपने गर्भ में
असंख्य नर्मदेश्वर जन्मे हैं,
स्वतः, सहज, शुद्ध।
तो फिर यह कैसी भक्ति है,
जो जीवन को ही आहत कर दे?
यह कैसी पवित्रता है,
जो सांसों का मूल्य भूल जाए?
शायद सच्ची श्रद्धा
दूध की धार में नहीं,
उस जल को बचाने में है—
जहाँ शिव भी हैं,
और जीवन भी।
